सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ३६ ]
अत ऊर्ध्व व्यापदो बध्यामः । तत्र नेत्रं विचलितं, विवर्तितं, पाश्चावपीडितम्, अत्युत्क्षिप्तम्, अवसन्नं, तिर्यक्प्रक्षिप्तमिति षट् प्रणिधानदोषाः; अतिस्थूलं, कर्कराशम्, अवनतं, अणुभिन्नं, सन्निष्कृष्टविप्रकृष्टकर्णिकं, सूक्ष्मातिच्छिद्रम्, अतिदोषम्, अतिहृस्वम्, अस्मिन्स्थित्येकादश नेत्रदोषाः, बहलता, अल्पता, सन्निष्ठता, प्रस्तीर्णतः, दुर्बद्धवेति पञ्च बस्तिदोषाः, अतिपीडितता, शिथिलपीडितता, भूयो भूयोऽवपीडनं, कालातिक्रम इति चत्वारः पीडनदोषाः, आमता, हीनता, अतिमात्रता, अतिशीतता, अत्युष्णता, अतितीक्ष्णता, अतिभृदुता, अतिस्निग्धता, अतिरुक्षता, अतिसान्द्रता, अतिद्रवता इत्येकादश द्रव्यदोषाः; अवाक्शोषोन्लोपन्युज्जोत्तानसंकुचितदेहस्थितदक्षिणपार्श्वशायिनः प्रधानमिति सप्त श्रव्यादोषाः; एवमेताश्चतुश्चत्वारिंशदव्यापदो वैद्यनिमित्ताः । आतुरनिमित्ताः पञ्चदश आतुरोपद्रवचिकित्सिते बध्यन्ते । स्नेहस्वष्टमिः कारणैः प्रतिहतो न प्रत्यागच्छति त्रिभिर्दोषैः अगनाभिभूतो मल्लव्यामिश्रो, दूरातुप्रविष्टो, अस्विन्नस्य, अनुष्णो, अल्पस्फुक्तवतो अल्पश्रुति वैद्यातुरनिमित्ता भवन्ति । अयोगस्तूभयोः आध्मानं, परिकर्तिका, परिष्ठावः, प्रवाहिका, हृदयोपसरणम्, अङ्गप्रग्रहो, अतियोगो जीवादानमिति नव व्यापदो वैद्यनिमित्ता भवन्ति ॥३२॥
इसके आगे व्यापद (हानियाँ) कहते हैं। इनमें नेत्र का हिलना, घूम जाना, वाम या दक्षिण पार्श्व में दबना, अतिशय ऊपर को उठना, नीचे को दबना, तिरछा प्रविष्ट करना, ये छेँ दोष नेत्र प्रवेश के हैं। बहुत मोटा, कर्करा, झुका हुआ, बीच से फटा, पास में कर्णिकावाला, सुदूर कर्णिकावाला सूक्ष्ममुख, बृहन्मुख, बहुत लम्बा, बहुत छोटा, अस्मिन्त (टेढ़ा धारवाला) ये ग्यारह नेत्र दोष हैं। मोटा होना, छोटा होना, छेदवाला होना, स्नायु जालयुक्त होना, ठीक प्रकार से न वैधा होना ये पाँच बस्ति के दोष हैं। बहुत जोर से दबाना, धीरे दबाना, बार-बार दबाना, समय के अनुसार जल्दी या देर में देना ये चार पीडन के दोष हैं। स्नेह का कच्चा रहना, कम होना, मात्रा में अधिक होना, बहुत ठण्डा होना, बहुत गरम होना, बहुत तीक्ष्ण होना, बहुत कोमल होना, अतिस्निग्ध होना, बहुत रुक्ष होना, बहुत घट्ट होना, बहुत पतला होना, ये ग्यारह द्रव्य के दोष हैं। सिर को नीचे बहुत रखना, सिर को ऊँचा रखना, रोगी को पेट के भार मुख नीचे रखकर लेटाना, चित्त (पीठ के भार) लेटाना, शरीर को सिकोड़ कर स्थित-खड़ा करके या दक्षिणपार्श्व में लेटाकर बस्ति देना ये सात श्रव्या-लेटने के दोष हैं। ये चवालीस हानियाँ वैद्य की मूल का परिणाम हैं। रोगी की मूल से होनेवाली पन्द्रह हानियों को आतुरोपद्रव चिकित्सा में कहेंगे। दिया हुआ स्नेह आठ कारणों से बापिस नहीं आता। यथा—वातादि तीन
दोषों के कारण, भोजन से रुका, मल से मिला, दूर पहुँचा हुआ, विना स्वेद दिये, ठण्डा दिया स्नेह, थोड़ा भोजन करने पर, और मात्रा में थोड़ा होने से बापिस नहीं आता। ये हानियाँ वैद्य और रोगी दोनों के कारण होती हैं। निरुद्ध और अनुवासन दोनों का अयोग-आध्मान, परिकर्तिका, परिष्ठाव, प्रवाहिका, हृदयोपसरण, अंगप्रग्रह, अतियोग और जीवादान—ये नौ हानियाँ वैद्य के कारण से होती हैं ॥३२॥
भवति चात्र—
षट्सम्रतिः समासेन व्यापदः परिकीर्तिताः । तासां बध्यामि विज्ञानं सिद्धिं च तदनन्तरम् ॥३३॥
कहा भी है—ये जो छिहत्तर हानियाँ संक्षेप में कही हैं, उनके लक्षण कहकर पीछे से उनकी चिकित्सा कहूँगा।
चरक में “विषममांसलच्छिद्रस्थूलजालकवातलाः। स्निग्धः किलञ्च तानश्चै बस्तीन्कर्मसु वर्जयेत् ॥ गतिवैषम्यविस्त्वस्त्रावदौर्भाहनिस्त्रावः। फेनिल्लच्युत्युष्णार्थत्वं वस्तेः स्फुर्वस्तिदोषतः ॥ सवातादिदुतोत्क्षिप्ततिर्यगुत्क्षिप्तकम्पिताः। अतिवाह्यगमन्दातिवेगदोषाः प्रणेतुतः। चरक सि० अ० ५।६, ७-८ ॥३३॥
इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने नेत्रबस्तिप्रमाणं प्रविभागचिकित्सतं नाम पञ्चविंशोऽध्यायः ॥३५॥
षट्त्रिंशत्तमोऽध्यायः
अथातो नेत्रबस्तिव्यापच्चिकित्सतं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
अब इसके आगे नेत्र बस्ति व्याप्त चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था।
वि० मन्तव्य—इस अध्याय में बस्ति देने में उत्पन्न व्यापदों का वर्णन किया गया है। ये व्यापद नेत्र आदि के दोषों से उत्पन्न होती हैं। देखिये अध्याय ३५ का सू० ३२ ॥१, २॥
अथ नेत्रे विचलिते तथा चैव विवर्तिते । गुदे क्षतं रुजा वा स्यात्तत्र सद्यःक्षतक्रियाः ॥३॥
अत्युत्क्षिप्तोऽवसन्नने च नेत्रं पायी भवेदुजा । विधिरत्रापि पित्तघ्नः कार्यः स्नेहैश्च सेचनम् ॥४॥
निर्यक्प्रणिहिते नेत्रे तथा पाश्चावपीडिते । मुखम्यावरणद्रास्तिनं सम्यक् प्रतिपद्यते ॥
ऋजु नेत्रं विधेयस्यात्तत्र सम्यग्विजानाता ॥५॥
नेत्र के हिल जाने से या घूम जाने से गुदा में क्षत और वेदना होती है। इसमें सद्यः क्षत की चिकित्सा करे। नेत्र उपर को उठ जाने या नीचे हो जाने से गुदा में वेदना होती है। इसमें पित्तनाशक उपचार और स्नेहों से परिषेक करना चाहिए। नेत्र के तिरछा प्रविष्ट होने पर या पार्श्व में दब जाने से मुख के बन्द होने के कारण बस्ति भली प्रकार नहीं जाती।