सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 585, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ेंक*- ३६ | &७ऽ
इस जान नेवाला व्यक्ति नेत्र को सीधा रखकर प्रविष्ट करे ॥
अतिस्थूञे कके च नेत्रेऽसिमति घषंणात् । गुदे भवेत् क्षतं रक् च साधनं तस्य पूववत् ।६॥
आसन्नरकर्णिके नेत्रे भिन्नेऽणौ वाऽप्यपाथेकः। अवसेको भवेद्रस्तेश्तस्माहोषान् विवजयेत् ॥७॥
्रहृष्टकर्णिके रक्तं गुदममंप्रपीडनात् । क्षरव्यत्रापि पित्त्नो विधिवंस्तिश्च पिच्छिरः ।८॥ हस्वे खणुसख्रोतसि च क्डेशो बस्तिश्च पूवेवत्।
्रस्यागच्छंस्ततः ङयाद्रोगान् बस्तिविघातजान् ॥€॥ दीघं महासख्रोतसि च ज्ञेयमत्यवपीडवत् ।
नेत्र के अति मोटा, ककश या धारवाला होने के कारण रगड़ लगने से गुदा मे क्षत ओर वेदनाहो जाती दहै, इसमे
सद्यक्चषत के समान उपचार करे। नेत्रम कर्णिका के बरहत
पसं होनेसे बस्ति देना निरथकर दै। ओर बस्तिके फथ
(नीरा) होने से बस्ति चूती है, इसङिए इन दोषों को रोड देवे। कीकाके दूर होने पर गुदा ममंके दवने से रक्त आता दै।
इसमें पित्तध्न विधि करे ओर पिच्छल ब्ि देवे। प्रमाणसे
हीन एवं सूदमदधेद होने से क्टेय हाता दै ओर बस्ति निरथक
रहती है । वापरिख आती हई बस्ति के सकने से मूत्राघात आदि
रोगों को उत्पन्न करती है । नेत्रके लम्बाया बडे खोतवाला
होने से अतिशय जोर से दबाने की भांति लक्षण (नासामुख से
वस्ति का आना एवं गल पीडन आदि उपचार) तथा उपचार
जानने चाहिये ॥६-६॥ प्रस्तीणं बहछे चापि बस्तौ दुबेद्धदोषवत् ॥१०॥ वस्तावस्पेऽल्पता वाऽपि द्रभ्यस्याल्पा गुणा मताः। दुबेद्धे चाणुभिन्ने च विज्ञेयं भिन्ननेत्रवत् ॥११॥
बस्तिके स्नायु जाल से आद्रत या मोगा होने पर ठीक प्रकारसेन बंषे इए के समान दोष दहते द। वस्तिकेशछोया हेन से द्रव्य थोड़ा आता है, ओर गुण भी कम होता है । ठीक
तरह न॒रवँधने पर-सूद्धम रूप मे फटी होने से-फटे हए नेत्र क समान बस्ति चूती दै ॥१०,११॥ ध
अतिपीडितो वस्तिः प्रयाव्यामाश्ञयं ततः । वातेरितो नासिकाभ्यां सुखतो वा प्रपद्यते ॥१२॥ तत्र तृण गखापीडं कयोच्चाप्यवधूननम् । शिरःकायविरेको च तीदणौ सेकस शीताय ।॥१२॥
शनः प्रपीडितो बस्तिः पक्वाधानं न गच्छति ।
मच संपादयत्यथ तस्मादुक्त प्रपीडयेत ॥१४॥ भूयो भूयोऽवपीडेन वायुरन्तः प्रपीड्यते ।
नाधमानं सुजश्चोभ्रा यथास्वं तत्र बस्तयः ॥९५॥ काडातिक्रमणात क्टेशो ग्याधिश्चाभिप्रवधेते ।
तत्र ज्याधिबलघ्नं तु भूयो बस्ति निधापयेत् ॥१६॥
॥ शय
चिकित्सास्थानम्
अतिशय जोर से दबाई बस्ति वायु से प्रेरित होकर आमा- | क -जओर जाकर यख एवं नासा से बाहर आती दै (यह
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असम्भव सा दै-विचारणीय है) । इस तुस्त गे को दवाये,
रोगी को दहिलाये, (क्षकोरे) । तीद्ण शिरोविरेचन „ तीण कायविरेचन, शीतल परिषेक करे । धीरे से दवाई बस्ति पक्वा्य तक नदीं जाती । ओर इच्छित फल नदीं करती, इसलिये ठीक प्रकारसे दवाये। बार~बार (ख्क--खककर) दव्राने से वायु
अन्द्र जाकर पीडा उत्पन्न करती दै, इससे रोगी को आध्मान,
तीव्र वेदना होती दै, यहाँ पर उनको अपने योग्य वस्तियां
देवे। समय के ब्रीत जानेपर वस्ति देने से क्टेश ओर रोग
दोनों बद़ जाते दै । इसमें व्याधि बर को नष्ट करनेवाली वस्ति
फिर से देवे ।१२--१६॥
गुदोपदेदओोपफौ तु स्नेहोऽपकः करोति हि ।
` तत्र संओोधनो बसतिर्हितं चापि विरेचनम् ॥१७॥ हीनमात्रावुभौ बस्ती नातिकायंकरौ मतौ । अतिमात्रौ तथाऽऽनाहक्छमातीसारकारको ॥१८
मृच्छ दाहमतीसारं पित्तं चाव्युष्णतीच्णको ।
मृदुशीतावुभौ बातविबन्धाभ्मानकारको ॥१€॥
तत्र हीनादिषु दितः प्रव्यनीकः क्रियाविधिः।
गुदवस्दयु पदे तु कुयीत् सान्द्रो निरूदणः ॥२०॥
प्रवाहिकां वा जनयेत्तनुरल्पगुणावहः। तत्र सान्द्रे ततुं बसि तनो सान्द्रं च दापयेत् ॥२९॥
स्िग्धोऽतिजाञ्यक्दर षः स्तम्भाभ्मानश्ृदुच्यते । बसति रुक्षमतिरिनग्धे स्निग्धं रक्ते च दापयेत् ॥२२॥ `
अपक्व स्तेह गुदा मे मल्ड्द्धि, शोफ उदःन्न करता हे ।
इसमे संशोधन वस्ति ओर विरेचन शरेष्ठ है । दीन माराम दी
गई स्नेहवस्ति भोर निरूहबस्ति दोनों बहुत काय. नहीं करती।
अतिमत्रामे दी गई ये बस्तियां आनाह, क्लम, अतीषार
उन्न करती दै । अतिउष्ण, अतितीदण बस्ति-मूच्छी, दाह;
अतिसार ओर पित्त को करती है । मृदु ओर शीतल बस्ति वायु -
का विबन्ध ओर आध्मान करती हँ । इनमें हीन आदि दोषों
मं विरोधि चिकित्सा उत्तम रै । यह सादर निरूह-कौ बस्ति गुदा
ते मल बृद्धि करती दै या प्रवाहिका उत्पन्न कर देती हे । पतली
बस्ति थोडा गुण करती है । इसमें सान्द्र बस्ति के दोष मं तनु-
बस्ति, तदुब्रस्ति ॐ दोष में सदर बस्ति देबे । लिग्ध बस्ति अति-
शय जडता करती है । रुकषबस्ति, स्तम्भ ओर आध्मान करती
है । अति स्निग्ध में रूक्षबस्ति ओर रूश्च मे स्निग्ध बस्त देवे |
वक्तव्य्-- प्रत्यनीक, हीनमात्रा मे अधिक-मात्रा; अधिक्र- मात्रा मे दीनमना, तीच्तण जे मृदु, मड मे तीकूण, थीत मे उष्ण ओर उष्ण मे शीत बस्ति देवे ।१७--२२॥ | अतिपीडितवहोषान् विद्धि चाप्यवशीषेके । उच्छीषके समुन्नाहं बस्तिः कयो मेहनम् ॥२३॥
तन्नोत्तरो हितो बस्तिः सुखिन्नस्य सुखावहः `` _ नयुम्जस्य बस्तिनाप्तोति पकाधानं विमागगः॥२४॥
दल = ~ । १ (५ जव + न, 1 व.
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