भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

पृष्ठ 587, कुल 872 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 587

अ० ३७ ]

चिकित्सास्थानम्

६३१

जिससे गुदा में दाह होता है। इसमें पिच्छा बस्ति या दूध से बनाये घी की बस्ति दे। तीक्ष्ण निरुह या अनुवासन से प्रवाहिका होती है। दाह और शुल्क के साथ कठिनाई से कफ मिश्रित रक्त मल में आता है। इसमें पिच्छाबस्ति उत्तम है, दूध से भोजन देवे। काकोल्पादि से सिद्ध घृत एवं तैल का अनुवासन दे। अति तीक्ष्ण निरुह या अनुवासन देते हुए वायु के अन्दर चले जाने पर वायु हृदय में पहुँचकर अंगों में पीड़ा करती है, दोषों के कारण भिन्न-भिन्न प्रकार की वेदनायें, मद, मूच्छा, अंगों में भारीपन होता है। इसमें सब दोषों को नाश करनेवाली शोधन बस्ति देवे। रूक्ष मनुष्य में बहुत वायुवाले, एवं ठीक प्रकार न लेटे हुए पुरुष में दी गई बस्ति अंगग्रह (अंगों का पकड़ना) कर देती है। मनु-अल्प औषधवाली बस्ति अंगों की शियिलता, जड़ता, जम्भाई, ऐंठन, कम्पन, पर्वमेद करती है। इसमें स्वेद, अभ्यंग और बस्ति देवे—अतिउष्ण, अतितीक्ष्ण, अतिशय अधिक, अतिशय स्वेद दिये हुए पुरुष को, अधिक औषधवाली, या अल्पदोषवाले को दी गई बस्ति अतियोग उत्पन्न करती है। इसके लक्षण विरेचन के अतियोग के समान हैं। इसमें पिच्छाबस्ति का प्रयोग क्षीतल वस्तु सुखदायक है। अतियोग से विरेचन के अतियोग की भाँति रक्त आने लगे तब पिच्छा बस्ति में रक्त मिलाकर देना चाहिये। ये नौ हानियाँ जो निरुह के लिये कही हैं, उनको कुशल वैद्य स्नेह बस्ति में भी समझे। सब हानियाँ लक्षण और चिकित्सा के साथ कह दी हैं। वैद्य को ऐसा यत्न करना चाहिये कि जिससे ये हानियाँ न हों ॥३६-५०॥

पश्चाद्विरेको वान्तस्य ततश्चापि निरुहणम् ।

सद्यो निरोहोऽनुवास्यः समरात्राद्विरेचितः ॥५१॥

भली प्रकार वमन होने के पन्द्रह दिन पीछे विरेचन देवे। विरेचन के सात दिन पीछे निरुहण देवे, निरुहण के तुरन्त पीछे अनुवासन दे ॥५२॥

चरक में—“संशुद्धभक्तं नवमेऽह्विसर्पिः तं पाययेताप्यनुदास-येदा । दद्यान्त्यहान्ना निबुभुक्षिताय तैलात्काग्राय ततो निरुहम् ॥ शय्या-वामाश्रये हि ग्रहणीगुदे च, तत्पार्वर्यस्यस्य सुलोपलब्धिः ॥ लीयन्त एवं वलयश्च तस्मात्सव्यं शयानोऽर्हति बस्तिदानम् ॥ उत्तानदेहश्च कृतोपधानः स्याद्वीर्यमाप्नोति तथास्य देहम् ॥ दत्वा स्फिचो पाणितलेन हन्यास्तेहस्य शीघ्रगमरक्षणार्थम् । ईषत्पदांगुष्ठयुगं च कर्वेदुत्तानदेहस्य तलौ प्रमुच्यात् ॥ स्नेहेन पाण्यगुलिपिण्डकाश्रये चास्य गात्रावयवाग्राताः ॥ तांश्चावमृज्यासमुखं ततश्च निद्रामुपसीत कृतोपधानः ॥ चरक० सि० अ० ३-२४ २९॥५१॥

इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने नेत्रबस्तिध्यापत्ति-किसित्तं नाम षड्विंशोऽध्यायः ॥३६॥

सप्तविंशतमोऽध्यायः

अथातोऽनुवासनोत्तरबस्तिचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अब इसके आगे अनुवासन उत्तर बस्ति चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था।

वि० मन्तव्य—इस अध्याय में अनुवासन बस्ति का विधान बतलाया गया है ॥१,२॥

विरेचनात् समरात्रे गते जातबलाय वै ।

कृतान्नायानुवास्याय सम्यग्देयोऽनुवासनः ॥३॥

विरेचन के सात दिन पीछे रोगी में बल आ जाने पर अन्न का भोजन लेने पर अनुवासन के योग्य हो जाने पर अनुवासन भली प्रकार देना चाहिये।

वक्तव्य—“अथ ऊर्ध्वमन्तगुणान् क्रमेणोपभुञ्जानः सप्त-रात्रेण प्रकृतिभोजनमागच्छेत् ॥ चरक० सू० अ० १५१०—सात दिन के पीछे रोगी स्वाभाविक भोजन पर आये ॥३॥

यथावयो निरुहणां या मात्राः परिकीर्तिताः ।

पादावकृष्टास्ताः कार्याः स्नेहबस्तिषु देहिनाम् ॥४॥

वय के अनुपात से निरुहों की जो मात्रा कही है, उसकी चौथाई मात्रा मनुष्यों के लिये स्नेह बस्ति में बरते।

वक्तव्य—षट्पली तु भवेच्छेष्टा त्रिपली मध्यमा भवेत् । कनीयस्यर्धपलिका विषा मात्राऽनुवासने ॥ (२) निरुह पादांघ्रसमेन तैलेनाम्बालिलन्धोपवसाधितेन ॥ (३) निरुहमात्राप्रसुतार्धमात्रे वर्षं ततोऽर्धप्रसुताभिबृद्धिः । आद्वादशाल्यात् प्रसुताभिबृद्धिद्वादशद्वादशतः परं स्युः ॥ आसप्ततेऽर्कमिदं प्रमाणमतः परं षोडशवद्विषेयम् ॥ चरक० सि० अ० ३१२-३२॥४॥

उत्सृष्टानिलविण्मूत्रे नरे बस्ति विधापयेत् ।

एतैर्हि विहतः स्नेहो नैवान्तः प्रतिपद्यते ॥५॥

स्नेहबस्तिविषेयस्तु नाविगुह्मस्य देहिनः ।

स्नेहवीर्यं तथा दत्ते देहं चानुविसर्पति ॥६॥

वायु, मल, मूत्र का त्याग किये हुए पुरुष में बस्ति देनी चाहिये। क्योंकि इनसे रक्ता स्नेह अन्तर प्रविष्ट नहीं होता। बिना शोधन किये हुए पुरुष में स्नेह बस्ति नहीं देनी चाहिये। शुद्ध शरीर में स्नेहबस्ति स्नेह के वीर्य को देती है और सारे शरीर में फैलती है ॥५,६॥

अत ऊर्ध्वं प्रवर्चयामि तैलानीह यथाक्रमम् ।

पानान्वासननस्येषु यानि हन्युर्गदान् बहुन् ॥७॥

इसके आगे उन तैलों को कहेंगे, जो उचित रूप में पान, नस्य, अनुवासन में बरतने से बहुत से रोगों को नष्ट करते हैं ॥७॥

अटीपुष्करकृष्णाहामदनामरदासुभिः ।

शताह्नाकुष्ठयष्ट्याह्वचचिब्रवहुतामनैः ॥८॥