भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ३० ]

भली प्रकार निरुहण हो जाने पर वातादि दोषों में क्रमशः बिल्वतैल, मुलेहटी के तैल, और मैनफल इनसे सिद्ध किये तैल से अनुवासन दे ॥

वक्तव्य—बिल्वतैल—बिल्वकल्क या कवच से सिद्धतैल अथवा—शाताद्वा फल विल्वाल्यैः तैलं सिद्धसमीरणे । यद्य्याह-तैल—भूतीकादि द्रव्य—जीवनीयगण से कहा हुआ । मैनफल—फलबिल्वत्रिहृक्कृष्णा रास्ता, भूनिम्बदार्चमिः—इनसे सिद्ध किया तैल बरते ॥४६॥

रात्रौ बस्ति न दद्यात्तु दोषोऽक्लेशो हि रात्रिजः ।

स्नेहवीर्ययुतः कुर्याद्वाधमानं गौरवं उवरम् ॥४७॥

रात्रि में बस्ति का प्रयोग न करे । क्योंकि आहार के विदाह से या समय की शीतलता के कारण रात्रि में दोषों का उत्कलेश होता है । वह उत्कलेश स्नेह की शक्ति से युक्त होकर आधमान, भारीपन और उवर उत्पन्न कर देता है ।

वक्तव्य—“अविशुद्धे तु हृदये निधि किलन्नेषु वातुषु । विदग्धेऽन्तरसे खोतः स्रण्डित्पेतु देहिनाम् ॥ व्यापारेभ्यो निह-चानां दोषोऽक्लेशो भवेदिति ॥४७॥

अहि स्थानस्थिते दोषे बह्वी चान्नरसान्विते ।

स्फुटस्त्रोतमुले देहे स्नेहौजः परिसर्पति ॥४८॥

दिन में दोषों के अपने स्थान में स्थित होने पर, अग्नि के रस से युक्त होने पर, शरीर के खोतों के मुख खुले होने से स्नेह का ओज सारे शरीर में फैल जाता है ॥४८॥

पित्तोऽधिके कफे क्षीणे रुक्ते वातस्रगदिते ।

नरे रात्रौ तु दातव्यं काले चोष्णोऽनुवासनम् ॥४९॥

चण्णे पित्ताधिके वाऽपि दिवा दाहादयो गदाः ।

संभवन्ति यतस्तस्मात् प्रदोषे योजयेद्भिषक् ॥५०॥

अपवाद—वात रोग से पीड़ित, रूक्ष शरीर मनुष्य में कफ के क्षीण होने पर और पित्त की अधिकता में प्रीष्म श्रुतु होने पर रात्रि में भी अनुवासन देना चाहिये । प्रीष्म काल में या पित्त की अधिकता में दिन के समय अनुवासन देने पर दाह आदि रोग होते हैं । इसलिये—प्रदोष में रात्रि के प्रथम प्रहर में अनुवासन देवे ॥४९,५०॥

शीते वसन्ते च दिवा प्रीष्मप्रावृद्धघनास्थये ।

स्नेहो दिनान्ते पानोक्तान् दोषान् परिजिहीर्षता ॥५१॥

स्नेह पान में कहे हुए दोषों से बचने की इच्छावाला व्यक्ति शीतकाल और वसन्त में दिन के समय और प्रीष्म, प्रावृद्ध एवं शरद श्रुतु में दिन के अन्त में स्नेहन लेवे । ( अनुवासन बस्ति ले ) ।

वक्तव्य—“शीते वसन्ते च दिवाऽनुवस्यो रात्रौ शरद प्रीष्मघनागमेषु । तानेव दोषान्परिखता ये, स्नेहस्य पाने परि-कीर्तिताः प्राक् ॥ चरक० सि० अ० १।२२ । देखिये—चरक० सूत्र० अ० ११।१६,२१ ॥५१॥

अहोरात्रस्य कालेषु सवज्जेवानिलाधिकम् । तीज्रायां रुजि जीर्णान् भोजयित्वाऽनुवासयेत् ॥५२॥ दिन रात के सब समयों में वायु की अधिकता होने पर तीव्र वेदना होने से, अन्न पच गया हो तो—भोजन कराके अनुवासन देवे ॥५२॥

न चाभुक्तवतः स्नेहः प्रणिधेयः कथञ्चन । शुद्धत्वाच्छून्यकोष्टस्य स्नेह ऊर्ध्वं समुत्पतेत् ॥५३॥ बिना भोजन दिये ( खाली पेट ) स्नेह कभी नहीं देना चाहिये । क्योंकि कोष्ठ के शुद्ध एवं खाली होने से स्नेह ऊपर की ओर जा सकता है ॥५३॥

सदाऽनुवासयेद्यापि भोजयित्वाऽऽर्द्रपाणिनम् । उवरं विदग्धमुक्तस्य कुर्यात् स्नेहः प्रयोजितः ॥५४॥ न चातिस्निग्धमशनं भोजयित्वाऽनुवासयेत् । मर्दं मूर्च्छां च जनयेद् द्विधा स्नेहः प्रयोजितः ॥५५॥ रूक्षं भुक्तवतो ह्यन्नं बलं वर्णं च हापयेत् । युक्तस्नेहमतो जन्तुं भोजयित्वाऽनुवासयेत् ॥५६॥ यूषक्षीररसैस्तस्माद्यथाव्याधि समीद्वय वा । यथोचितान् पादहीनं भोजयित्वाऽनुवासयेत् ॥५७॥

भोजन कराके हाथ घुलाते ही, रोगी को अनुवासन सदा देवे । अन्न की विदग्धवास्था में दिया गया स्नेह उवर कर देता है । अतिस्निग्ध भोजन खिलाकर अनुवासन न देवे । दो प्रकार से दिया हुआ स्नेह मर्द और मूर्च्छा को उत्पन्न करता है । रूक्ष अन्न खाने पर बल और वर्ण घटता है । इसलिये थोड़े परिमाण में ( मात्रा में ) स्नेहभोजन में देकर अनुवासन देवे । मूंग आदि का यूष, दूध या मांसरस—जो रोग के अनुकूल हों, जो सत्यम्य हों, उनको प्रतिदिन की भोजन की मात्रा से चतुर्थीय कम मात्रा में खिलाकर अनुवासन दे ।

वक्तव्य—“पादहीनमुत्तममध्यममन्दगनिविशेषेण पादेन, पादाभ्यां पादेर्वादीनम् इति ज्ञेयम् । अर्धहीनं त्रिभागं वा भोजयित्वाऽनुवासयेत् । इत्थङ्ग—दो तरह के दिये स्नेह की हानि—“स्नेहं पीत्वा नरः स्नेहं प्रति भुञ्जान एव च । स्नेह-मिथ्योपचारादि जायन्ते दाक्षणा गदाः ॥५४-५७॥

अथानुवास्यं स्वभ्यक्तमुष्णाम्बुभेदितं शनैः । भोजयित्वा यथाशास्त्रं कृतचक्रकर्मणं ततः ॥५८॥ त्रिसृज्य च शकुन्मूर्त्रं योजयेत् स्नेहबस्तिना । प्रणिधानविधानं तु निरुह्ने संप्रवद्वयेत् ॥५९॥

जिसको अनुवासन देना हो—उस रोगी को भली प्रकार स्नेह से अर्थग्य देकर, धीरे-धीरे गरम पानी से स्वेदन देवे । फिर शास्त्र विधि से भोजन कराके कुछ घुमाये । मल मूत्र का त्याग कर चुकने पर स्नेहबस्ति देवे । बस्ति की प्रणिधानविधि निरुह्ने में कहेंगे ।