सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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चिकित्सास्थानम्
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वि० मन्तव्य—हाथ-पाँव के तलुओं तथा स्फिन्चों पर थपथाने तथा शय्या को थोड़ा उठाकर पटकने से अनुवासन का स्नेह तत्काल नहीं निकलता यह स्वभाव है क्योंकि ऐसा करने पर पुरीष का वेग भी कुछ समय के लिये रुक जाता है। बात बहुत छोटी है परन्तु है बड़े महत्त्व की। पाठक इस पर गम्भीर विचार करें और अग्रिम श्लोक ६५ को देखकर समझें ॥५६॥
ततः प्रणिहितेनेह-उत्तानो वाकशतं भवेत् । प्रसारितैः सर्वगात्रैस्तथा वीर्यं विसर्पति ॥६८॥
ताडयेत्तल्योरैन त्रीखीन् वाराच्छनैः शनैः । स्फिन्चोश्चैन ततः शय्यां त्रीन् वारातुक्षिपेततः ॥६९॥ एवं प्रणिहिते बस्ती मन्दायासोऽथ मन्दवाक् ।
स्वास्तीर्णं जयने काममासीताचारिके रतः ॥६९॥
स्नेहवस्ति ले चुकने पर एक सौ मात्रा तक चित्त-पीठ के भार और हाथ-पैर-सब अङ्गों को पसारकर रोगी लेटा रहे। इस प्रकार स्नेह का वीर्य सारे शरीर में फैल जाता है। हाथ-पैर के तलुओं पर धीरे-धीरे तीन-तीन बार थपथपाये। नितम्बों पर भी थपथपाये। शय्या की पांयत को तीन बार ऊँचा उठाकर इस प्रकार से बस्ति के देने पर रोगी थोड़ा परिश्रम करे और थोड़ा बोले। अपने विस्तर पर आराम से पड़ा रहे और नियम पालन में दत्तचित्त रहे ॥६०-६२॥
स तु सैन्यवचूर्णनं शताह्विन च योजितः ।
देयः सुखोष्णश्च तथा निरेति सहसा सुखम् ॥६३॥
यस्यानुवासनो दत्तः सकृदन्वक्षमात्रजेत् ।
अत्यौष्ण्यादतिरैदृण्याद्वा वायुना वा प्रपीडितः ॥६४॥
सवातोऽधिकमात्रो वा गुरुत्वाद्वा सभेषजः ।
तस्यान्योऽल्पतरो देयो न हि स्निह्यत्यतिष्ठति ॥६५॥
विष्टब्धानिलविषमूत्रः स्नेहहीनेऽनुवासने ।
दाहकलमप्रवाहात्तिकरश्चात्यनुवासनः ॥६६॥
स्नेह को सैन्यव नमक और सौफ के साथ मिलाकर सुहाता हुआ गरम देना चाहिये, इससे सहसा सुखपूर्वक बाहर आता है। अति उष्णिमा के कारण, अतितीक्ष्ण होने से, वायु के दबाव के कारण, वायु के साथ जाने से, मात्रा में अधिक होने से, अथवा भारी होने से, औषध का साथ होने से जिस रोगी में दिया हुआ स्नेह एकदम तुरन्त बाहर आ जाता है, उसमें दूसरा स्नेह पहले से थोड़ी मात्रा में देवे, क्योंकि स्नेह यदि नहीं ठहरता तो रोगी स्निग्ध नहीं होता। स्नेह हीन दिया हुआ अनुवासन विष्टब्धता (वायु-मल मूत्र का अवरोध), दाह, कलम, प्रवाहिका, परिकर्त्तिका, उत्पन्न करता है।
वक्तव्य—“चूर्णमात्रः पले स्नेहे सिन्धुजन्मशताह्वयोः ॥”
वि० मन्तव्य—स्नेह का मलाशय में कुछ समय (४-६
घण्टा) रुकना आवश्यक है जिससे उसका वीर्य शरीर में जा सके और उसके पश्चात् बच्चा-लुचा स्नेह निकल जाना भी आवश्यक है, यदि न निकले और कोई हानि भी न करे तो उसकी उपेक्षा कर देवे अर्थात् निकालने का कोई प्रयत्न न करे देखिये श्लोक ६८। परन्तु यथासाध्य अनुवासन के स्नेह में सैन्यव लवण तथा सोया का थोड़ा (२४ मात्रा) चूर्ण अवश्य मिला देना चाहिये और स्नेह को कुछ उष्ण करके प्रयुक्त करना चाहिये। ऐसा करने से वह सुखपूर्वक-किरी उपद्रव के बिना उचित समय पर लौट आता है। जैसे—आहार में लवण मिलाने से समय पर पुरीषोत्सर्ग हो जाता है और लवण एवं सोया से स्नेह का पाचन भी अधिक हो जाता है जैसे आहार का। और यदि स्नेह उक्त कारणों से तत्काल-वस्ति देते ही तुरन्त लौट आवे तो दुबारा थोड़ी मात्रा में स्नेहवस्ति देना चाहिये जो कुछ समय के लिये रुके, क्योंकि यदि स्नेह मलाशय में नहीं रुकता तो स्नेहन भी नहीं होता—अनुवासन का कोई लाभ नहीं होता। स्नेहहीनेऽनुवासने—हीन-न्यून मात्रा में स्नेह की वस्ति देने पर—वायु, पुरीष एवं मूत्र का अवरोध होता है और अत्यनुवासनः—अधिक मात्रा में स्नेह की वस्ति (देने पर)—दाह, कलम, प्रवाहिका एवं अरति को उत्पन्न करती है ॥६३-६६॥
सानिलः सपुरीषश्च स्नेहः प्रत्येति यश्च तु ।
ओषचोषौ बिना ग्रीव स सम्भयगनुवासितः ॥६७॥
जीर्णोन्मथ सायाहे स्नेहे प्रत्यागते पुनः ।
लब्धवन्नं भोजयेत् कामं दीपगनिस्तु नरो यदि ॥६८॥
प्रातरुष्णोदकं देयं धान्यनागरसाधितम् ।
तेनास्य दीप्यते बहिर्भक्ताकाङ्क्षा च जायते ॥६९॥
जिस पुरुष में ओष एवं चोष (जलन और दाह) के बिना, वायु और मल के साथ स्नेह शीघ्र वापिस आ जाता है, उसे भलीप्रकार अनुवासन हुआ जाने। यदि रोगी की अग्नि प्रदीप्त हो ता, स्नेह के वापिस आने पर, पहला भोजन पच जाने पर, सार्यकाल में लघु भोजन यथेच्छ देवे। प्रातःकाल धनिया और सौंठ से सिद्ध गरम पानी देना चाहिये। इससे अग्नि प्रदीप्त होती है, और भोजन में रुचि होती है ॥६७-६९॥
स्नेहवस्तिक्रमेष्वेवं विधिमाहुर्मनीषिणः ।
बुद्धिमानो न स्नेह वस्ति क्रम में यह विधि कही है।
अनेन विधिना पङ्क वा सम वाऽष्टौ नत्रैव वा ॥७०॥
त्रिषेधा वस्तयस्तेषामन्तरा तु निरुद्धणम् ।
इस विधि से छै, सात, आठ या नौ वस्तियाँ (स्नेहवस्तियाँ) देवे, इनके बीच बीच में निरुद्ध वस्ति देवे।
वक्तव्य—“त्रीन् पंचवाऽऽद्विषुनुरोऽथपङ्कवा वातादिकाना- मनुवासनीयान्। स्नेहान् प्रदायाऽथु भिषग्विदध्यात् खोतो-