भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ३७ ]

विशुद्धयर्मतो निरूहान् ॥ च० सि० अ० १-४६ ॥७०॥

दत्तस्तु प्रथमो बस्तिः स्नेहयेद्वस्तिवृद्धक्षणी ॥७१॥

सम्यग्दत्तो द्वितीयस्तु मूर्धस्थमनिलं जयेत् ।

जनयेद्वलवर्णो च तृतीयस्तु प्रयोजितः ॥७२॥

रसं चतुर्थो रक्तं तु पञ्चमः स्नेहयेत्तथा ।

षष्ठस्तु स्नेहेनर्मांसं मेदः सप्तम एव च ॥७३॥

अष्टमो नवमश्चास्थि मज्जानं च यथाक्रमम् ।

एवं शुक्रगतान् दोषान् द्विगुणः साधु साधयेत् ॥७४॥

भली प्रकार दी हुई प्रथम बस्ति वंक्षण और बस्ति का स्नेहन करती है। द्वितीयबस्ति ऊपर के शरीर की (पक्वाशय से ऊपर की) वायु को शान्त करती है। तृतीय बस्ति बल और वर्ण को उत्पन्न करती है। चौथी बस्ति रस का और पाँचवी रक्त का स्नेहन करती है। छठी बस्ति मांस का और सातवी मेद का स्नेहन करती है। आठवीं अस्थि का नवीं मज्जा का स्नेहन करती है। इस प्रकार अठारह बस्तियाँ शुक्रगत रोगों को भली प्रकार से अच्छा करती हैं ॥

वक्तव्य—नौ स्नेहबस्ति, नौ निरूह बस्ति इस प्रकार अठारह। "एक त्रीन् वा बलासे स्नेहवस्तीन् प्रकल्पयेत्। पंच वा सप्त वा पित्तै नैकादश वाडनिले ॥ वारभटः ॥ विश्रमताः कर्मसु वस्तयो हि, कालस्ततोऽर्धेन ततश्च योगः। सान्वासना द्वादश वै निरूहाः प्राक्स्नेह एकः परतश्च पंच ॥ काले त्रयोऽन्ते पुरतस्तथैकः स्नेहा निरूहान्तरितश्च षट् स्युः। योगे निरूहाश्चय एव देशः स्नेहाश्च पञ्चैव परादिमध्याः ॥

च० सि० अ० १ ४८ ॥७१-७४॥

अष्टादशाष्टदशकान् वस्तीनां यो निषेधते ।

यथोक्तं विधानेन परिहारक्रमेण च ॥७५॥

स कुञ्जरवल्लोऽश्वस्य जवैस्तुल्योऽमरप्रभः ।

वीतपाप्मा श्रुतधरः सहस्रायुर्नरो भवेत् ॥७६॥

जो मनुष्य यथोक्त विधि से और परहेजी को पालते हुए अठारह निरूह और अठारह स्नेहबस्तियों को (परिवर्तन से) सेवन करता है, वह बल में हाथी के समान, वेग में घोड़े के समान, कान्ति में देवताओं के समान, पाप रहित, सुनते ही धारण करनेवाला, हजार वर्ष की आयुवाला होता है ॥७५ ७६॥

स्नेहबस्ति निरूहं वा नैकमेवातिशीलयेत् ।

स्नेहादग्निनवधोत्कलेशौ निरूहात् पवनाद्भयम् ॥७७॥

तस्मान्निरूहोऽनुवास्यो निरूहश्चानुवासितः ।

नैवं पित्तकफोत्कलेशौ स्यातां न पवनाद्भयम् ॥७८॥

स्नेहबस्ति और निरूहबस्ति अकेली ही का सेवन न करे ।

स्नेह से अग्नि का नाश और उत्कलेश (मिचली) और निरूह से वायु के कुपित होने का भय है। इसलिये निरूह देने के पीछे अनुवासन और अनुवासन के पीछे निरूह देवे (दो निरूह

या दो अनुवासन एक साथ न दे) इस प्रकार करने से न तो पित्त या कफ का उत्कलेश होने का डर रहता है, और न वातकोप की आशंका रहती है।

चरक—“स्नेहवस्ति निरूहं वा नैकमेवातिशीलयेत्। उत्कलेशाग्निनवधौ स्नेहात् निरूहात्पवनाद्भयम् ॥ तस्मात् निरूहः स्नेहाः स्याद् निरूहश्चानुवासितः। स्नेहशोधनयुक्त्यैवं बस्तिकर्मदोषन्तु ।

वि० मन्तव्य—यद्यपि अकेली स्नेहबस्ति अथवा अकेली निरूहण बस्ति का ही सेवन करना निषिद्ध-हानिकारक है, परन्तु रुक्ष के लिये अल्पमात्रा में स्नेहबस्ति तथा स्निग्ध के लिये अल्पमात्रा में निरूहणबस्ति हानिकारक नहीं होती। देखिये श्लो० ८०। सत्र यह है, कि—जैसे स्नेहयुक्त आहार के साथ २ रुक्ष आहार स्वास्थ्य के आवश्यक है, वैसे ही बस्ति कर्म में भी स्नेह के लिये साथ २ रुक्षण करना आवश्यक है ॥७७,७८॥

रूक्षाय बहुवाताय स्नेहबस्ति दिने दिने ।

दद्याद्वैद्यस्ततोऽन्येषामन्यावाभयान्त्रयहान् ॥७९॥

रूक्ष एवं बहुत वायुवाले व्यक्ति को वैद्य प्रतिदिन स्नेहबस्ति देवे। अन्य पुरुषों में अग्निमान्ध के भय से तीन दिन के अन्तर से देवे ॥७९॥

स्नेहोऽल्पमात्रो रूक्षाणां दीर्घकालमन्तययः ।

तथा निरूहः स्निग्धानामल्पमात्रः प्रशस्यते ॥८०॥

रूक्ष पुरुषों में दीर्घकाल तक दिया अल्प स्नेह किसी प्रकार की हानि नहीं करता। इसी प्रकार स्निग्ध पुरुषों में थोड़ी मात्रा से दिया निरूह कोई हानि नहीं करता ॥८०॥

अत ऊर्ध्वं प्रवृद्ध्यामि व्यापदः स्नेहबस्तिजाः ।

बल्वन्तो यदा दोषाः कोष्ठे स्युरतिछादयः ॥८१॥

अल्पवोयं तदा स्नेहमभिभूय पृथग्विधान् ।

कुर्वन्त्युपद्रवान् स्नेहः, स चापि न निवर्तते ॥८२॥

तत्र वाताभिभूते तु स्नेहे मुखकषायता ।

जूर्भा वातरुजस्तास्ता वेपथुर्विषमञ्जरः ॥८३॥

पित्ताभिभूते स्नेहे तु मुखस्य कटुता भवेत् ।

दाहस्तृष्णा ज्वरः स्वेदो नेत्रमूत्राङ्गपीतता ॥८४॥

श्लेष्माभिभूते स्नेहे तु प्रसेको मधुरास्यता ।

गौरवं छर्दिरुच्छवासः कुरुच्छाच्छीतज्वरोऽरुचिः ॥८५॥

स्नेहबस्तिजन्म हानियों को इसके आगे कईगा। जब कोई में वायु आदि दोष बलवान् रहते हैं, तब अल्पवीर्यस्नेह को पराजित करके पृथग् २ उपद्रवों को स्नेह उत्पन्न करते हैं और वह स्नेह वापिस भी नहीं आता। इनमें वायु से स्नेह के पराजित होने पर मुख में कषाय रस, जम्भाई, वायु जनित मिश्र-मिश्र प्रकार की वेदनायें, कम्पन, विषमज्वर हो जाता है। स्नेहके

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