सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ३० ]
अंगुल, अप्रभाग चमेळी के फूल के वृन्त के समान, छेद सरसों के जाने योग्य होना चाहिये।
वक्तव्य—अंगुल्यान्वय चत्वारि पंच षट् सप्त वा तथा। सप्तगुलं परं नेत्रं प्रणिषेयं भिषग्विदा ॥ हिंस्याद् बस्ति नरं चेह प्रमाणादधिकं ततः ॥
वि० मन्तव्य—उत्तर बस्ति वह है, जो मूत्रमार्ग तथा भग में दी जाती है ॥१००,१०१॥
स्नेहप्रमाणं परमं प्रकुञ्चश्चात्र कीर्तितः।
पञ्चविंशादधो मात्रां विदध्यादुदुद्धिकल्पिताम् ॥१०२॥
उत्तरबस्ति में स्नेह की अधिक से अधिक मात्रा एक प्रकुंच (पल) भर है। यह मात्रा पच्चीस साल के लिये है। इससे छोटी आयु के लिये बुद्धि के अनुसार बना ले। ( एक साल के लिये एक पल का पच्चीसवाँ भाग है ) ॥१०२॥
निविष्टकर्णिकं मध्ये, नारोणां चतुरङ्गुले।
• मूत्रस्रोतः परीणाह् मुदगवाहि दशाङ्गुलम् ॥१०३॥
मेढायामसमं केचिद्विच्छन्ति खलु तद्विदः।
पुरुषों के नेत्र में कर्णिका मध्य भाग में रखनी चाहिये। स्त्रियों में नेत्र कर्णिका चार अंगुल की दूरी पर हो। मूत्र स्रोत के अनुसार मोटा, मूंग के जाने योग्य छिद्रवाला, और दस अंगुल लम्बा होना चाहिए। कई आचार्य मेहन के समान लम्बा नेत्र (कुछ अधिक बड़े छेद का) पसन्द करते हैं ॥१०३॥
तासामपत्यमार्गे तु निदध्याद्यतुरङ्गुलम् ॥१०४॥
द्वयङ्गुलं मूत्रमार्गे तु कन्यानां त्वेकमङ्गुलम्।
विषेयं चाङ्गुलं तासां विधिवद्व्यते यथा ॥१०५॥
स्त्रियों के योनिमार्ग में नेत्र को चार अंगुल प्रविष्ट करे। मूत्र मार्ग में दो अंगुल। कन्याओं के मूत्र मार्ग में एक अंगुल प्रविष्ट करे। यह माप उनकी अपनी अँगुलियों से लेना चाहिये। ( कन्या-अप्राप्त द्वादशवर्षा ) ॥१०४,१०५॥
स्नेहस्य प्रसृतं चित्रं स्वाङ्गुलीमूलसंमितम्।
देयं प्रमाणं परममर्वाणं बुद्धिविकल्पितम् ॥१०६॥
उत्तर बस्ति में स्नेह का प्रसृत अपनी अँगुली मूल से माप कर लेवे। यह स्नेह की उत्तम मात्रा है। ( स्त्रियों की उत्तर बस्ति में )। इससे कम मात्रा अपनी बुद्धि के अनुसार बना ले ॥१०६॥
औरभ्रः शौक्रो वापि बस्तिराजश्व पूजितः।
तदलाभे प्रयुञ्ज्यते गलचर्मं तु पक्षिणाम् ॥१०७॥
मेढा, सुअर या बकरे की बस्ति ( मूत्राशय ) इसमें उत्तम है। इसके अभाव में पक्षियों का गलचर्म बरते। ( इसके अप्राप्य होने पर मशक का पैर, अथवा कोमल चर्म बरते ॥१०७॥ )
अस्यालाभे द्धतः पादो मृदुचर्मं ततोऽपि वा।
अथातुरमुपस्तिग्धं स्वित्मं प्रशिथिळाशयम् ॥१०८॥
यवागं सघृतक्षीरां पीतवन्तं यथाबलम्।
निषण्णमाजानुसमे पीठे सोपाश्रये समम् ॥१०९॥
स्वभ्यक्तवस्तिमूर्धानं तैलेनोष्णेन मानवम्।
ततः समं स्थापयित्वा नालमस्थं प्रहर्षितम् ॥११०॥
पूर्वं शलाकयाऽन्विष्य ततो नेत्रमनन्तरम्।
शनेः शनेर्धृताभ्यरुं विदध्यादङ्गुलानि षट् ॥१११॥
मेढयामसमं केचिद्विच्छन्ति प्रणिधानकम्।
ततोऽपवीडयेद्वस्ति शनैर्नत्रं च निर्हरेत् ॥११२॥
ततः प्रत्यागतस्नेहमपराह्ने विचक्षणः।
भोजयेत् पयसा मात्रां यूषेणथ रसेन वा ॥११३॥
अनेन विधिना दद्याद्वास्तींश्रीश्चतुरोऽपि वा।
विधि—रोग को स्नेहन और स्वेदन देकर—वायु-मूत्र-मल
के त्याग करने से आशय के टीला होने पर, घृत और दूध मिलित यवाग को यथाशक्ति पिलाकर; घुटनों के बराबर ऊँची चौकी पर, सहारा ( तकिया ) लगाकर बिठाये। गरम तेल से बस्ति शिर को भली प्रकार मलकर, इसके मूत्र नाल को प्रहर्षित ( उत्तेजित ) करके समान रूप में रखकर—प्रथम शलाका से मार्ग की परीक्षा करके, पीछे से घी से स्निग्ध किये नेत्र को धीरे-धीरे छे अंगुल प्रविष्ट करे। कई आचार्य मेहन के बराबर प्रविष्ट करने के लिये कहते हैं। फिर बस्ति को दबाये और धीरे से नेत्र को निकाल ले। फिर रनेह के वापिस आने पर सार्यकाल में बुद्धिमान् वैद्य दूध से, यूष से या मांस रस से मात्रा में भोजन देवे। इस विधि से तीन या चार बस्ति देवे।
वि० मन्तव्य—प्रहर्षितम्—( सुश्रुत ), हृष्टे मेढू ( चरक ) हृष्टे इति स्तन्धे ( चक्रपाणि ) तथा हृष्टे मेढू स्थिते च ऋजौ ( वाग्भट सू० अ० १६ ) इन तीनों आचार्यों के कथनानुसार प्रहर्षित अर्थात् हृष्टमृजु संधे स्थित—खड़े मेढू—शिरन में शलाका तथा उत्तर बस्ति का नेत्र देने का विधान किया गया है परन्तु हमारा विचार है कि इन प्रहर्षित आदि शब्दों के साथ “नृज” होना चाहिये अर्थात् शिथिल मेढू में शलाका देवें क्योंकि प्रहर्षित मेढू की दण्डिका फूल जाने के कारण शलाका प्रवेश नहीं हो सकता। यहाँ तक कि इस दशा में मूत्र भी नहीं उतरता और क्रियात्मक रूप में भी देखा जाता है कि शिथिल शिरन में ही शलाका प्रवेश आदि क्रिया की जाती है। पाठक गम्भीर विचार करें ॥
चरक-पुष्पनेत्रं तु हैमं स्याच्छूलरूपमोत्तरबस्तिकम्। जालीपुष्पस्य वृन्तेन समं गोपुच्छसंस्थितम् ॥ रौप्यं वा सर्पः चिह्नं द्विकर्णं द्वादशांगुलम्। तेनाजबस्तिमुक्तेन स्नेहस्यार्धपलं नयेत् ॥ यथावयोविशेषेण स्नेहमात्रां विकल्प्य वा। स्नातस्य मुक्तभक्तस्य रसेन पयसाऽपि वा ॥ सृष्टविष्णुमूत्रवेगस्य पीठे जातु समे मृदौ। ऋजोः सुखोपविष्टस्य हृष्टे मेढू धृतान्विते ॥