भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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अ० ३७ ]

चिकित्सास्थानम्

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शलाक्यान्विष्य गतिं यथेप्रतिहता ब्रजेत् । ततः शेषः प्रमाणेन पुष्पनेत्रं प्रवेशयेत् ॥ गुदवन्मूत्रमार्गेषु प्रणयेदनुसेवनीम् । हिंस्याद् बस्तिगतं बस्तिमूने स्नेहो न गच्छति ॥ सुखं प्रपीड्य निष्कर्म्य निष्कर्म्यन्नेत्रमेव च । प्रत्यागते द्वितीयं च तृतीयं च प्रदापयेत् । अनागच्छन्नुपेक्ष्यस्तु रजनीव्युषितस्य च ॥

चरक० सि० अ० ६ । ५०-५७ ॥ १०८-११३ ॥

ऊर्ध्वजान्वै क्षियै दद्यादुत्तानायै विचक्षणः ॥ ११४ ॥

सम्यक् प्रपीडयेद्यो न दद्यात् सुभृदुपीडितम् ।

त्रिकर्णिकेन नेत्रेण दद्याद्योनिमुखं प्रति ॥ ११५ ॥

स्त्री में उत्तर बस्ति देने के लिये उसे पीठ के भार उत्तान लेटाकर घुटनों को मोड़कर ऊँचा कराये । धीरे से बस्ति को दबाकर उत्तर बस्ति देते समय योनि को भली प्रकार दबाये । इसमें तीन कर्णिकावाले नेत्र को योनिमुख की ओर रखकर बस्ति देवे ।

वि० मन्तव्य—विचक्षणः—“विचक्षणः” इत्यत्र केचित्

‘समाहितः’ इति पठन्ति कामसंकल्लरहितेन अचलितचित्तप्रकृतिना इत्यर्थः—अर्थात् वैद्य विचक्षण-समाहित अर्थात् सावधान होकर बस्ति देवे, योनि दर्शन से कामातुर—विचलित चित्त न हो जाय । यह श्री डल्हण ने अर्थ किया है परन्तु हमारा विचार है कि स्त्रियों में बस्तिकर्म स्त्री-चिकित्सिका ही करे पुरुष नहीं । प्रतीत होता है कि डल्हण जी के समय में कोई नारी चिकित्सिका नहीं होती थी । सुश्रुत एवं पुनर्वसु के समय में प्रसव के लिये जब कि नारियों का अधिकार माना है तब बस्तिकर्म के लिये भी नारियों का अधिकार मानना उचित है । ११४, ११५।

गर्भाशयविशुद्धयर्थं स्नेहेन द्विगुणेन तु ।

गर्भाशय के शोधन के लिये स्नेह की मात्रा दो गुनी (दो प्रसृत) लेनी चाहिये ।

क्वाथप्रमाणं प्रसृतं, क्षिया द्विप्रसृतं भवेत् ॥ ११६ ॥

कन्येतरस्याः, कन्यायास्तद्वद्वस्तिप्रमाणकम् ।

पुरुषों में क्वाथ की मात्र एक प्रसृत, प्रसूता या प्रसवरहित बड़ी आयु की स्त्री में दो प्रसृत मात्रा, अप्रसूता या गर्भग्रहण के अयोग्य एवं कन्या में (बारह वर्ष से कम) पुरुष के समान स्नेह की मात्रा अपने हाथ के माप से एक प्रसृत, बस्ति के शोधन के लिये लेनी चाहिये ॥ ११६ ॥

अप्रत्यागच्छति भिषगं बस्तावुत्तरसंज्ञिते ॥ ११७ ॥

भूयो बस्तिं निदध्यात् संयुक्तं शोधनेर्गुणेः ।

गुदे वर्ति निदध्याद्वा शोधनद्वयसंभूताम् ॥ ११८ ॥

प्रवेशयेद्वा मतिमान् बस्तिद्वारमर्थेषणीम् ।

पीडयेद्वाऽप्यधो नामर्बलेनोत्तरमुष्टिना ॥ ११९ ॥

आरुणवधस्य पत्रेस्तु निर्गुण्ड्याः स्वरसेन च ।

कुर्याद्गोमूत्रपिष्टेषु वर्तौर्षोपि ससैन्यवाः ॥ १२० ॥

सुदुर्गौलासर्वपसमाः प्रविभज्य वर्यासि तु ।

बस्तेरागमनार्थाय ता निदध्याच्छलाकया ॥ १२१ ॥

आगारभूमबृहतीपिप्पलीफळसैन्यवैः ।

कृता वा शुक्तगोमूत्रसुरापिष्टैः सनतारैः ॥ १२२ ॥

अनुवासनसिद्धिं च बोध्यं कर्म प्रयोजयेत् ।

उत्तर बस्ति के बापिस न आने पर वैद्य त्रिवृत्त आदि संशोधनीय द्रव्यों से मिली बस्ति को देवे । अथवा शोधन द्रव्यों से बनी गुद में बस्ति बरते । अथवा बस्तिद्वार (मूत्र मार्ग में) ऐषणी प्रविष्ट करे । अँगूठे को अन्दर रखकर बाँधी मुड़ी से नामि के नीचे जोर से दबाये । अमलतास के पत्ते, सम्भाळु का स्वरस, गोमूत्र और सैन्य इनको पीसकर-वय के अनुसार मूंग, इलायची का दाना, सरसों के बराबर बस्ति बनाकर शलाका की सहायता से मूत्र मार्ग में रखे, जिससे बस्ति आ जाये । घर का धुंवासा, कटेरी, पिप्पली, मेनफल, सैन्य, इनसे शुक्त, गोमूत्र और सुरा में पीसकर बनाई बस्ति बरते । अनु-वासन चिकित्सा में जो बस्ति लौटाने के विधान आदि कहा है, वह भी करे ।

वक्तव्य—बस्तिमार्गशतादूर्ध्वं प्रत्यागच्छति । अनागच्छति वर्ति पायो नाले निदध्यात् ॥ मूत्रमार्ग में बस्ति या मूत्र को लाने के लिये कर्पूर का कण भी रखते हैं । बस्ति को छाया में सुखाकर घी से चिकना करके मूत्रमार्ग में रखना चाहिये ॥

शर्करामधुमिश्रेण शीतेन मधुकाश्चुनूना ॥ १२३ ॥

दह्यमाने तदा बस्ती दद्याद्वस्ति विचक्षणः ।

क्षीरवृक्षकषायेण पयसा शीतलेन च ॥ १२४ ॥

बस्ति में यदि जलन होती हो तो, मुलेहटी के शीतल कषाय में शर्करा और मधु मिलाकर बस्ति देवे । अथवा त्र्यघ्रोषादि-गण के शीतल कषाय में दूध मिलाकर बस्ति देवे ।

वि० मन्तव्य—यह बस्ति—मूत्रकच्छ, मूत्राघात (सुजाक-गनोरिया में भी बहुत लाभ करती है बहुशोऽनुभूत है । २ तोला मुलेहटी को ४० तोला जल में अधोविशिष्ट क्वाथ करे और स्वच्छ खण्ड या मिशरी २ तोला, मधु २ तोला मिलाकर उत्तर बस्ति देवे । प्रदर रोग में इसी को बस्ति भग में देवे ॥

शुक्तं दुष्टं शोणितं चाङ्गानानां

पुष्पोद्भेकं तस्य नाशं च कष्टम् ।

मूत्राघातान्मूत्रदोषान् प्रवृद्धान्

योन्तव्याधि संस्थितिं चापरायाः ॥ १२५ ॥

शुक्रोत्सेकं शक्रारामरमरीं च

शूलं वस्तीं वृद्धिं मेहेने च ।

घोरानन्थान् बस्तिजर्त्राधि रोगान्

हिंत्वा मेहानुत्तरो हन्ति बस्तिः ॥ १२६ ॥

दूषित शुक्र को, स्त्रियों के दूषित आर्त्तव को, रज की अधिकता को, रजोताश को, रजः कष्ट को, मूत्रघात को, बड़े हुए मूत्र दोषों को, योनिव्याधि को, अपरा की रक्तावट को, शुक्र के उत्सेक को, शर्करा को, अश्रमी को बस्ति-वंक्षण, मेहन