भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ३८ ]

के शूल को, बस्ति जन्म अन्य भयानक रोगों को प्रमेहों को छोड़कर उत्तरबस्ति नष्ट करती है।

वि० मन्तव्य—जो बस्ति कषाय, क्षार एवं स्नेह मिलाकर दी जाती है वह निरुहण और जो केवल स्नेह (एरण्ड तैल आदि) से दी जाती है वह अनुवासन कहलाती है और उत्तर बस्ति निरुहण भी होती है और अनुवासन भी। उत्तरबस्ति प्रमेह रोग में नहीं दी जाती शेष-शुक्रदोष एवं रजोविकार आदि, मूत्राशय एवं गर्भाशय के सभी विकारों में दी जाती है ॥

सम्यग्दत्तस्य लिङ्गानि व्यापदः क्रम एव च ।

बस्तेरुत्तरसंज्ञस्य समानं स्नेहवस्तिना ॥१२०॥

उत्तरबस्ति के सम्यग् योग के लक्षण, हानियाँ और उनकी चिकित्सा सब स्नेहबस्ति के समान है ॥१२०॥

इति श्री सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थानेऽनुवासनोत्तरबस्ति-चिकित्सितं नाम सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥१३॥

अष्टत्रिंशतमोऽध्यायः

अथातो निरुहक्रमचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अत्र इसके आगे निरुह क्रम चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था।

वि० मन्तव्य—निरुहण बस्तियों द्वारा मलाशय का शोधन किया जाता है परन्तु उसके जो योग इस अध्याय में लिखे गये हैं उनके द्वारा वे सब कार्य होते हैं जो मुखमार्ग से औषध देने पर होते हैं। सच यह है कि शरीर में सर्वत्र वात, पित्त एवं कफ अपना २ कार्य सर्वदा करते हैं इसलिये मलाशय में भी पहुँचाई गई औषधियों का पाचन हो जाता है। यही नहीं, त्वचा पर लेपन, अम्लक आदि के रूप में लगाई गई औषधियों का भी पाचन होता है इसलिये बस्तियों तथा लेप आदि में वे ही द्रव्य प्रयुक्त होते हैं जो खाने की औषधों—आहारों में प्रयुक्त होते हैं ॥१,२॥

अथानुवासितमास्थापयेत् ; स्वभ्यं कश्चिन्नशरीरमुत्सृष्टवहिर्वेगमवाते शुचौ वेदमनि मध्याह्ने प्रततायां शय्यां-यामधःसुपरिग्रहायां श्रोणिप्रदेशप्रतिन्युहायामनुपधानायां वामपार्श्वशायिनमाकुञ्जोतदक्षिणसकथितरप्रसारितस-कियं सुमनसं जीर्णोन्नं वायव्यं सुनिषण्णदेहं विदित्वा, ततो वामपादस्योपरि नेत्रं कृत्वेतरपादाकुष्ठाकुलिभ्यां कर्णिकासुपरि निष्पीड्य, सज्यपाणि कनिष्ठिकानामिकाभ्यां बस्तेर्मुखार्धं सङ्कोच्य, मध्यमाप्रदेशिन्यकुष्ठैरधं तु विवृता-स्यं कृत्वा, बस्तावौषधं प्रक्षिप्य, दक्षिणहस्ताङ्गुष्ठेन प्रदे-जिनीमध्यमाभ्यां चानुसिक्तमनायतमबुद्धुदुदमसंकुचित-मवातमौषधासन्नमुपसंगृह्य, पुनरुपरि तदितरेण गृहीत्वा

दक्षिणेनावसिञ्चेत्, ततः सूर्येणैवौषधान्ते द्विखिर्वाससे-ष्ट्य बन्धीयात्, अथ दक्षिणेनोत्तानेन पाणिना बस्ति गृहीत्वा वामहस्तमध्यमांगुलिप्रदेशिनीभ्यां नेत्रमुपसंगृ-ह्णाङ्गुष्ठेन नेत्रद्वारं पिधाय, घृताभ्यक्तामनेत्रं घृताक्तगुदाय प्रयच्छेदनुपुष्टवृंशं सममुन्मुखमाकर्णिकं नेत्रं प्रणिधत्स्वेति ब्रूयात् ॥२॥

बस्ति सन्धे करे कृत्वा दक्षिणेनावषोडयेत्।

एकेनैवावषोडेन न दुतं न विलम्बितम् ॥४॥

ततो नेत्रमपनीय त्रिगन्मात्राः पीडनकालादुपेक्ष्योत्ति-ष्टेत्यातुरं ब्रूयात्। अथातुरमुपवेशयेदुत्कुरुकं बस्त्यागम-नार्थाम्। निरुहप्रत्यागमनकालस्तु मुहूर्तां भवति ॥५॥

अनेन विधिना बस्तिं दद्याद् बस्तिविशारदः।

द्वितीयं वा तृतीयं वा चतुर्थं वा यथार्थतः ॥६॥

अनुवासन दिये हुए व्यक्ति को आस्थापना (निरुह) बस्ति देनी चाहिये। इसके लिये रोगी को भली प्रकार स्नेहन और स्वेदन कराके, मलमूत्र का त्याग कराके, वायुरहित, पवित्र घर में मध्याह्न समय में-विस्तृत चौड़ी बिछाई नीचे (पैरों की ओर) भली प्रकार पकड़ने योग्य, कटि प्रदेश की ओर ऊँची बिना सिरहाने की शय्या पर रोगी को वामपार्श्व से लेटायें। रोगी की दक्षिण टांग सिकोड़कर वाम टांग फैलाकर—प्रबल मन, अब्र जीर्ण होने पर, मौन रखकर, शिथिल शरीर हुआ जान-कर, बायें पैर के ऊपर बस्तिनेत्र को करके, दूसरे दक्षिण पैर के अँगूठे और अँगुली से बस्ति को कर्णिका के ऊपर दबाकर बायें हाथ को कनिष्ठका और अनामिका से बस्ति के मुख के आधे भाग को दबाकर, मध्यमा, प्रदेशिनी और अङ्गुठे से आधेमुख को खुला रखकर, बस्ति में औषध डालें। दक्षिण हाथ के अँगूठे से, प्रदेशिनी और मध्यमांगुली से, ठीक प्रकार से (ऊपर से न बहे ऐसा करे) रखते हुए, बहुत फैलाकर नहीं, बुलबुले रहित, बिना सिकोड़े, वायु के बिना (औषध डालकर वायु निकाले), औषधि के पास पकड़े। फिर वाम हाथ से इस को पकड़कर, दक्षिण हाथ से इसमें से थोड़ी औषधि निकालें। फिर औषध की समाप्ति पर धागे से दो तीन लपेटे देकर नेत्र पर बांध दें। फिर दक्षिण हाथ को चित्त-सीधा करके बस्ति को पकड़कर बायें हाथ की मध्यमांगुली और प्रदेशिनी से नेत्र को थामकर, अङ्गुठे से नेत्र का मुख बन्द रखकर, नेत्र के अप्रभाग पर घी लगाकर, घी से गुदा को स्निग्ध करके पुष्टवृंश के साथ साथ, समान, मुख को ऊपर रखकर, कर्णिका पर्यन्त नेत्र को रोगी अन्दर प्रविष्ट करे। बस्ति को बायें हाथ में थामकर दक्षिण हाथ से एक ही दबाव में दबायें। न तो जोर से दबायें और न धीरे दबायें, फिर नेत्र को निकालकर बस्ति देने से लेकर तीस मात्रा कालतक प्रतीक्षा