भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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मुश्रतसहिता

[ ३० ]

इनको एक-एक पल लेकर क्वाथ करे । इसमें सिंधाड़ा, कौंच, नागकेसर, अगह, चन्दन, विदारी, सौफ, मजीठ, निशोध, इन्द्रजो, सैन्धव, मैनफल, पद्माल, मुलेहठी इनका बारीक पिसा करूक, मधु, दूध, घी इनको घोलकर बनाये आस्थापन को शीतल होने पर देवे । इसमें कांजी आदि खट्टे द्रव्य न मिलाये । यह दाह, रक्तप्रदर, पित्तरक्त, भित्तगुल्म और ज्वर को नष्ट करता है ॥५१-५४॥

रोध्रचन्दनमझिछाटारान्तानन्तावलधिभिः । सारिवावृषकारमयमेदामधुकपदमकैः ॥५५॥

स्थिरादितृणमूलैश्च क्वाथः कर्षत्रयोन्मितः । पिष्टैर्जीवककाकोलीयुर्गधिमधुकोत्पलैः ॥५६॥

प्रपौण्डरीकजीवन्तीमेदारेणुरूपकैः । अभोरुमिसिसिन्धुस्थवत्सकोगीरपदमकैः ॥५७॥

कसेरुशर्करायुक्तः सर्पिमधुपयप्लुतैः । द्रवैस्तीक्ष्णाम्लवज्यैश्च दत्तो बस्तिः सुश्रीतलः ॥५८॥

गुल्मासुरदरहृत्पाण्डुरोगान् सविषमज्वरान् । असूकृप्तितातिसारो च हन्यापित्तकृतान् गदान् ॥५९॥

लोघ, चन्दन, मजीठ, रास्ता, सारिवा, बला, ऋद्धि, कालीसारिवा, अडूसा, गम्भारी, मेदा, मुलेहठी, पद्माल, लघुपंचमूल, पंचतृणमूल, प्रत्येक तीन कर्ष इनका क्वाथ, जीवक, काकोली, क्षीरकाकोली, ऋद्धि, मुलेहठी, नीलाकमल, प्रपौण्डरीक (कमल) जीवन्ती, मेदा, पपटक, फालसा, शतावरी, सैन्धव, इन्द्रजो, खस, पद्माल, कसेरु, इनका करूक, शर्करा तीनपल, घी, मधु, दूध में इनको घोलकर तीक्ष्ण एवं अम्ल द्रव्यों को छोड़कर बनाई शीतल बस्ति देने पर गुल्म (रक्त या पित्त गुल्म) रक्तप्रदर, हृदयरोग, पाण्डुरोग, विषमज्वर, रक्त-पित्त, अतिसार और पित्तजन्य रोगों को नष्ट करती है ॥५५-५९॥

भद्रान्तिबकुलस्थार्ककोशातक्यमृतामरैः । सारिवावृहतीपाठामूर्वारंगवधवत्सकैः ॥६०॥

क्वाथः, कल्कस्तु कर्तव्यो वचामदन्तसर्पयैः । सैन्धवामरकुष्ठैलापिप्लीबिल्वनगरैः ॥६१॥

कटुतैलमधुक्षारमूत्रतैलाम्लसंयुतैः । कार्यमास्थापनं तूष्णं कामलापाण्डुमेहिनाम् ॥६२॥

मेदस्विनामनननानां कफरोगाग्नद्विषाम् । गल्लगण्डगरलानिर्झलीपदोदररोगिणाम् ॥६३॥

कटफल, नीम, कुलथी, आक, तुरई, गिलोय, देवदारु, सारिवा, कटेरी, पाठा, मूर्वा, अमलतास, इन्द्रजो इनका क्वाथ, बच, मैनफल, सरसो, सैन्धव, देवदारु, इलायची, कूट, पिप्पली, बिल्व, सौठ, इनका करूक, सरसो का तेल, मधु, यवक्षार, मूत्र, तैल, कांजी इनसे बनाया आस्थापन देने पर शीघ्र ही कामला, पाण्डु, प्रमेह को नष्ट करता है । मेदस्वी, अग्निमान्द्य रोगी, कफरोग से पीड़ित, भोजन में अरुचिवाले

गल्लगण्ड, गर, ग्लानि, श्लोपद और उदररोगियों के लिये उत्तम है ॥६०-६३॥

दशमूलीनिशाबिल्वपटोलत्रिफलाभरैः । कथितैः कल्कपिष्टैस्तु मुस्तसैन्धवदारुभिः ॥६४॥ पाठामागधिकेन्द्रहैस्तैलक्षारमधुप्लुतैः । कुर्यादास्थापनं सम्यङ्मूत्राम्लफलयोजितैः ॥६५॥ कफपाण्डुगदालस्यमूत्रमाश्रुतसंविनाम् । आमाटोपापचोरैलेषमगुल्मकुम्भिविकारिणाम् ॥६६॥ दशमूल, हल्दी, बिल्व, पटोल, त्रिफला, देवदारु, इनका क्वाथ, मुस्ता, सैन्धव, दारुहल्दी, पाठा, पिप्पली, इन्द्रजो इनका करूक, तैल, क्षार, मधु, मूत्र, खट्टे फल (विजौरा का रस) मिलाकर बनाया आस्थापन कफ, पाण्डुरोग, आलस्य, मूत्रावरोध, वायुरोध, आम, आधमान, अपची, कफगुल्म, कुम्भिरोगों को नष्ट करता है ॥६४-६६॥

वृषाडमभेदवर्षाभृधान्यगन्धर्वहस्तकैः । दशमूलबलामूर्वायवकोलतिग्राच्छदैः ॥६७॥ कुलस्थबिल्वभूमिन्मैवैः कवथितैः पलसंमितैः । कल्कैर्मदनयष्टचाहृषडग्रन्थामरसर्पयैः ॥६८॥ पिप्पलीमूलसिन्धुस्थवानीमिसिक्त्सकैः । क्षौद्रैच्छारोगोमूत्रसर्पितैलरसाप्लुतैः ॥६९॥ तूष्णमास्थापनं कार्यं संसृष्टबहुरोणिणाम् । गुग्ग्रीशकैराष्टीलातूनीगुल्मगदापहम् ॥७०॥

बासा, पाषाणमेद, पुनर्नवा, धनिया, एरण्ड, दशमूल, बला, मूर्वा, जो, वेर, शटी, कुलथी, बिल्व, चिरायता एक एक पल लेकर क्वाथ करे । मैनफल, मुलेहठी, बच, देवदारु, सरसो, पिप्पलीमूल, सैन्धव, अजवायन, सौफ, इन्द्रजो, इनको एक-एक पल लेकर इनका करूक, मधु, ईल का रस, दूध, गोमूत्र, घी, तैल, मांसरस घोलकर बनाया आस्थापन दोषों के संसर्ग एवं सन्नपातजन्य रोगों में देना चाहिये । इससे गुग्ग्रीश, शर्करा, अष्टीला, तूनी, गुल्मरोग नष्ट होते हैं ॥६७-७०॥

राक्षारगवधवर्षाभूकटुकोशैरवारिदैः । त्रायमाणामृतारत्तापञ्चमूलीभिर्भितकैः ॥७१॥ सबलैः पालिकैः क्वाथः कल्कस्तु मदनान्वितैः । यष्टचाहृमिसिसिन्धुस्थफलिनोन्द्रयवाहृयैः ॥७२॥ रसाञ्जन्तरसक्षौद्रद्राक्षासौवीरसंयुतैः । यत्को बस्तिः सुखोष्णोऽयं सांसुशुक्लबलोजसाम् ॥७३॥ आयुषोऽग्नेश्च संस्कृतां हन्ति चाशु गदानिमान् । गुल्मासुरदरवीसर्पमूत्रकृच्छ्रक्षतक्षयान् ॥७४॥ विषमज्वरमर्शासि ग्रहणी वातकुण्डलीम् । जानुजङ्घागिरोबस्तिग्रहोदावर्तमाश्रुतान् ॥७५॥ वातासूकशर्कराष्टीलाकुक्षिश्लोदराशुचीः । रक्तपित्तकफोन्मादग्रमेहाध्वमानहृदग्रहान् ॥७६॥ रास्ता, अमलतास, पुनर्नवा, कुटकी, खस, मुस्ता, त्राय-माण, गिलोय, मजीठ, बृहत्पंचमूल, बहेड़ा, बला, एक-एक