सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 601, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ेंअण २८ ] ६€
॑ पठ लेकर क्वाथ करे । मेनफल, मुठेहटी, सौफ, सैन्धव, प्रियं,
1, +.
इ्द्रजौ, रखौत, मांसरस, मधु, द्राक्षा, सौवीर (काजी) इनको , मिलाकर दी गई गरम सुहाती वस्ति मांख, शुक्र, वल, ओज,
आयु, अग्नि को बद़ाती है ओर गुल्म, रक्तप्रद्र, वीसपं, मूर
कृच्छर, उरःश्चत, क्चय,विषमज्वर,अशं, ग्रहणी, वातक्रुण्डलिका को नष्ट करती हं । जानु-जंघा-शिर वस्ति का पकड़ा जाना, उद्ा-
वत्त, वायु, वातरक्त, खकरा, अष्ठीला, कुक्षिशू, उदर, अर्चि,
रक्तपित्त, कफोन्माद, प्रमेह, आध्मान, दूह को नष्ट करती दै ।
वक्तव्य-- यहा पर स्तेह नदीं कहा है, फिर भी मिलाना
चाहिये । यथा--स्नेहो गुडो मांसरसः पयांसि साम्छानि मून
मधु सेन्धवं च । एते निरूहैः विदुषा प्रयोज्याः -काथश्च कल्को
मदनात् फर च ॥। हारीतः ।७१-७६।
वातष्नौषधनिष्क्वाथाः सेन्धव्रिबृतायुताः। साम्ाः सुखोष्णां योऽयाः स्यु बस्तयः कुपितेऽनिडे ॥
वायु के कुपित होने पर भद्रदाग्यादि वातघ्न ओषधि्यों के
क्वाथ में सेन्धव, निरोय, कांजी मिलाकर सुदहाती इद गरम बस्तियां देनी चादिये ॥७७॥
, ` न्यम्रोधादिगणक्वाथाः काकोस्यादिसमायुताः ।
विधेया बस्तयः पित्ते ससपिष्काः सञ्ञकंराः ॥७८॥ `
पित्त में न्यग्रोधादिगण के क्वाथ मे काकोल्यादिगण का कल्क, घी, ओर शकरा मिलाकर बस्तियां ( शीतल ) देनी
चाहिये ॥७८॥
आरग्बधादिनिष्क्वाथाः पिष्पल्यादिसमायुताः। सक्षोद्रमूत्रा देयाः स्युबेस्तयः कुपिते कफे ॥७६॥
कफ के कुपित होने प्र आरग्वधादि गणके क्वाथमें
पिपपल्यादिगण का प्रक्षेप देकर मधु ओर. गोमूत्र मिलाकर
हाती गरम बस्तियां देनी चादिये ॥७६॥
शकरेल्लरसक्षोरघृतयुक्ताः सुशीतटाः।
्षीरबरक्षकषायाव्या बस्तयः ओणिते हिताः ॥८०॥ रक्त मे- न्यग्रोधादि इक्षो के क्वाथमें शकरा, ईव का
रख, दुध, घी मिलाकर दी गई अतिशीतल बस्तियां उत्तम
है ।८०॥
शोधनद्रभ्यनिष्क्वाथांस्तत्कलकस्नेह सैन्धवः । ` युक्ताः खजेन मथिता बस्तयः शोघनाः स्मृताः ॥८९॥
शोधनं वस्तियां-- वमन, विरेचन मे कदे इए ` योधन द्रव्योके क्वाथमे, इन्दं द्रव्यो का कल्क, स्नेहः सेन्धव
मिलाकर, मन्थनदण्ड से मथकर बना$ बस्ति शोधनबस्तियां ६।८९॥ तरिफठाक्वाथगोमू्रक्षोद्रक्षारसमायुताः। ऊषकादिप्रतीवापा बस्तयो टेखनाः स्ताः ॥८२॥
| त्रिफला का क्वाथ, गोमून्न, मधु, श्वार, इनके साथ ऊपकादिगण का] प्रततेप देकर बनाई बस्तियां केखन कही जाती ॥८२॥ `
चिकित्सास्थानम् ८४५
बरहणद्रव्य निष्क्वाथाः कल्केमेधुरकैयंताः।
सर्पिर्मासरसोपेता वस्तयो बृंहणाः स्मरताः ।८३॥
विदारीगन्धादि बृहण द्रव्यो के क्वाथ म काकोल्यादि का
परचेप देकर, मांसरस, घी मिलाकर वनाई गई वस्तिर्या वृंदण ह ॥८२॥
चटकाण्डोच्चटाक्वाथाः सक्षीरघृतश्कंराः ।
आत्मगुप्राएखावापाः स्खता बाजीकरा चणाम् ॥८४॥
चिद्यो के अण्डे, उच्चटा ( श्वेत घेंॐची ) का क्वाय,
इसमें दुध, घी, शकरा ओर कोच के फल का कल्क मिलाकर
बनाई वस्तथा वाजीकर कही दँ ।८४॥
वदयंरावतीशेलुलारमरीधन्बनाङ्राः कषीरसिद्धाः क्षौद्रयुताः साखाः पिच्छिरसंन्िताः ॥८५॥
वाराहमादिषौरभरवेडारणेयकौकङ्टम् ।
सदयस्कमखगाजं वा देयं पिच्छिखत्रस्तिषु ॥८६॥
पिच्छात्रस्ति- वेर, नागवला, रसुडा, सिम्बर, धामन
इनके कोमल पत्ते, इनको तीन-तीन पक लेकर चौबीख पल दूष म चौगुना जल मिलाकर दुघ मात्र शेष रक्ते । इसमे रुधिर मिलाकर बस्ति देब । यह पिच्छिटवस्ति रै । पिच्छिक्बस्तियों
मँ-सुअर, भस, मेदा, बिल्ली, हरिण, सगां अथवा बकरा इनको
तुरन्त का ताजा र्त पिच्छिक्बस्तियों मे भिलाना चादिये ॥ परियङ्ग्वादिगणक्वाथा अम्बष्ठायेन संयुताः । सक्षौद्राः सघृताश्चेव भ्राहिणो बस्तयः स्मरताः ॥८७॥
प्रियंगु आदि द्रव्यो के गण के क्वाथ मे अम्बष्ठादिगण
का प्रत्तेप मिकाकर-मधु ओर धृत डारुकर बनाई बस्तियां
ग्राही ह ।८७॥ एतेष्वेव च योगेषु स्नेहाः सिद्धाः प्रथक् पथक् । समस्तेऽवथवा सम्यण्विघेयाः स्तेह बस्तयः ॥८्ट॥ इन्दी उपयुक्त योगों मे पथक् पथक् सिद्ध किय स्तेह या
इनको मिलाकर इनसे सिद्ध किया स्नेह बस्तियों के स्पमं भी
मी प्रकार देना चादिये ८८
वन्ध्यानां अतपाकेन ओधितानां यथाक्रसम्।
बरातेरेन देयाः स्युबेस्तयसखेबृतेन च ॥८९॥
वन्ध्या चयो का अमन विरेचनादि से ओधन् करके शत्-
पाक किये बलातैक से या चेदत स्नेह से (घी, तैर, वसां से )
बरत देनी चादिये । ( जैदृत स्नेह महाग्याधि से, बलातेक मूढ
गभचिकित्सा मे कहा है । उल्हण शतपाकतेर से अलग बस्ति
मानता दै, वातव्यापि में कहा तपाकतेर बरतने को कहता
है । परन्तु शतपाक, बरातेर उत्तम है ) ॥८६॥ | नरस्योत्तमसत्तवस्य तीदणं बस्ति निधापयेत् ।
` तीच्तण ट स्ति स्त देवे वे
॥ २4 ।) (क, भ । गि, ४न८ =" मे ८३ पद
मध्यमं मभ्यसत्तवस्य विपरीतस्य बे सृदुम् ॥6०॥ _
ऊनत्त ॥ त् म । सत्त्ववाले <| म १ 1 ४. | +" मनुष्य रोः अ ^ प च त ४ | ५ क. \ प ५
ध्यम्
ध य
` २ अ मौर ^ ¦ ४. १ : हीनस
तत्ववाके "<
9
- क्विच + ऋ ^ र ~ 15 (भु > ४
"ष्क ६९ श {) । न । 0 ह्व | न + - ५ . मं ॥ ~ कि ("कि नदि 44७५ १5, 9 र श् कृ पोरे ष * (4 १ ५०९^ १५ प त ॐ ६५४,
= 9, ~ 4 9 2 १४९. ०. < १ भ # [न ॐ ~. >
+“ अः "क ® क १५1 ^ | ५ ॥
वं। ९. 2४
- {= 8 | `"
ॐ ॥ छे ६:
४) भ न चनु ₹1 चद ~ § व { = ९ 9 8 | क च । ट ७
~~ ११ कक्कर नर ४०) १ ~ > > {४4 न्ग ` +" कद् 1 )