भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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मुश्रुतसंहिता

[ अ० ३८ ]

एवं कालं बलं दोषं विकारं च विकारवित् । बस्तिद्रव्यबलं चैव वीक्ष्य बस्तीन् प्रयोजयेत् ॥९१॥ इसी प्रकार समय, बल, दोष, रोग, बस्तिद्रव्य के बल को देखकर रोग को समझनेवाला वैद्य बस्तियों देवे ॥९१॥

दद्यादुकलेअनं पूर्वं मध्ये दोषहरं पुनः । पश्चात् संगमनीयं च दद्याद्भस्ति विचक्षणः ॥९२॥ बुद्धिमान् पहले दोषों को उत्कलेश करनेवाली बस्ति देवे, मध्य में दोषनाशक और अन्त में संशमनीय बस्ति देवे ॥९२॥

एरण्डबीजं मधुकं पिप्पली सैन्धवं वचा । हपुषाफलकल्कश्च बस्तिरुत्कलेअनः स्मृतः ॥९३॥ शताह्ना मधुकं बीजं कोटजं फलमेव च । सकाञ्चिकाः सगोमूत्रो बस्तिदौषहरः स्मृतः ॥९४॥ प्रियङ्गुमधुकं मुस्ता तथाव च रसाञ्जनम् । सस्त्रीरः शस्यते बस्तिदौषाणां शमनः परः ॥९५॥

एरण्डबीज, मुलेहटी, पिप्पली, सैन्धव, वच, हाऊबेर, मेनफल, इनके कल्कवाली बस्ति उत्कलेशक कही है । सौफ, मुलेहटी, इन्द्रजो, मेनफल, कांजी, गोमूत्रवाली बस्ति दोषहर है । प्रियंगु, मुलेहटी, मुस्ता, रसौत और दूधवाली बस्ति दोषों का शमन करती है ॥९३-९५॥

नृपाणां तत्समानानां तथा सुमहतामपि । नारीणां सुकुमारानां गिगृस्थविरयोरपि ॥९६॥ दोषनिर्हणार्थाय वलवर्णोदयाय च ।

समासेनोपदेष्ट्यामि विधानं माधुतैलिकम् ॥९७॥ यान्खीभोज्यपानेषु नियमश्चात्र नोच्यते । फलं च विपुलं दृष्टं व्यापदां चाप्यसंभवः ॥९८॥ योज्यस्त्वतः सुखेनैव निरुहृकमभिच्छ्रुता । यदेच्छति तदैवैष प्रयोक्तव्यो विपश्चित्ता ॥९९॥

राजाओं या राजाओं के समान वैभवशाली बड़े पुरुषों के लिये, स्त्रियों के लिये, नाशुक्त प्रकृति एवं बालक तथा बूढ़ों के दोषों को निकालने के लिये, बल-वर्ण को बढ़ाने के लिये संक्षेप में माधुतैलिक बस्तियों को विधि कहूँगा । इन बस्तियों में—खारी, स्त्री-सेवन, भोजन आदि का कोई परहेज नहीं है । फल भी बहुत अधिक है और हानियों के होने की सम्भावना नहीं है । इसलिये निरुह विधि को चाहनेवाले सुखपूर्वक इनका व्यवहार कर सकते हैं । बुद्धिमान् जब चाहे, तब इनको बरत सकता है (इनमें शोधनविधि आवश्यक नहीं) ॥९६-९८॥

मधुतैले समे स्यातां क्वाथश्चैरण्डमूलजः । पलायं शतपुष्पायास्ततोऽर्धं सैन्धवस्य च ॥१००॥ फलेनैकेन संयुक्तः खजेन च विलोडितः । देयः सुखोष्णो भिषजा माधुतैलिकसंज्ञितः ॥१०१॥

मधु और तैल परस्पर समान ( चार प्रसृत, दो कर्ष ), एरण्डमूल का क्वाथ भी चार प्रसृत और दो कर्ष, सौफ आधा पल, सैन्धव एक कर्ष, मेनफल-एक संख्या में यह नौ प्रसृत

बनाकर मन्थनदण्ड से मथकर—सुहाती गरम बस्ति वैद्य देवे । इनका नाम माधुतैलिक है । ( गयी ने 'पलेनैकेन संयुक्तः' पाठ दिया है । इससे मांसरस, कांजी आदि मिलाते हैं ) ॥१००,१०१॥

क्वाचामधुकतैलं च क्वाथः सरससैन्धवः । पिप्पलीफलसंयुक्तो बस्तिर्द्युक्तस्थः स्मृतः ॥१०२॥

बच, सैन्धव, पिप्पली, मुलेहटी, मेनफल प्रत्येक एक कर्ष, मधु और तैल चार प्रसृत, एरण्ड का क्वाथ चार प्रसृत, इनको मिलाकर बनाई बस्ति युक्तस्थ है । ( जब चाहे तब दे सकते हैं, रथ के तैयार जुड़ा होने पर भी दी जा सकती है ) ॥१०२॥

सुरदारु वरा रास्ता शतपुष्पा वचा मधु । हिङ्कुसैन्धवसंयुक्तो बस्तिर्दौषहरः स्मृतः ॥१०३॥ देवदारु, त्रिफला, रास्ता, सौफ, बच, मधु, हींग, सैन्धव से मिलाकर बनाई बस्ति दोषहर है ॥१०३॥

पञ्चमूलीकषायं च तैलं मागधिका मधु । बस्तिरेष विधातव्यः सशताह्नाः ससैन्धवः ॥१०४॥ बृहत्पञ्चमूल के कषाय में तैल, पिप्पली, मधु, सौफ, सैन्धव मिलाकर बस्ति देवे ॥१०४॥

यवकोलकुलस्थानां क्वाथो मागधिका मधु । ससैन्धवः सयष्ट्याहः सिद्धबस्तिरिति स्मृतः ॥१०५॥ जो, बेर, कुलस्थी का क्वाथ, पिप्पली, मधु, सैन्धव, मुलेहटी इनसे बनी बस्ति सिद्ध बस्ति है ॥१०५॥

मुस्तापाठाभूतातिक्वाबलाराक्षापुनर्नवाः । मञ्जिष्टारवधोगीरत्रायमाणाल्यगोलुत्रान् ॥१०६॥ पालिकान् पञ्चमूलाल्पसहितान्मदनान्छकम् । जलठके पचेत् क्वाथं पादशेषं पुनः पचेत् ॥१०७॥ क्षीरार्धादकसंयुक्तमाक्षोरात् सुपरिच्छतम् । पादेन जाङ्गुलरसस्तथा मधुघृतं समम् ॥१०८॥

शताह्नाफलिनौयष्टोवस्त्कैः सरसाञ्जनैः । काषिकैः सैन्धवोन्मिश्रैः कल्कैर्वस्तिः प्रयोजितः ॥१०९॥ वातासूडमेहशोफाशं गुल्ममूत्रविवन्धनुत् । विसर्पञ्चरविडुभङ्गरक्तपित्तविनाशनः ॥११०॥ बल्यः संजीवनो वृष्यश्चतुष्टयः शूलनाशनः ।

यापनानामयं राजा बस्तिमुस्तादिको मतः ॥१११॥ यापन बस्ति—मुस्ता, पाठा, गिलोय, कुटकी, बला, रास्ता, पुनर्नवा, मजीठ, अमलतास, खस, त्रायमाण, गोखरू, बृहत्पञ्चमूल, लघुपञ्चमूल प्रत्येक एक पल, मेनफल, संख्या में आठ लेकर एक आदक जल में क्वाथ करे । चौथाई शेष रहने पर छान ले । इसमें दूध आधा आदक मिलाकर फिर पकावे । दूध मात्र रह जाने पर इसमें चौथाई, जांगलपशु-पक्षियों का मांसरस, मधु, और घृत (छेः पल), सौफ, प्रियंगु, मुलेहटी, इन्द्रजो, रसौत से प्रत्येक एक कर्ष कल्क रूप में और सैन्धव मिलाकर बस्ति देवे । यह वातरक्त, प्रमेह, शोफ, अर्श, गुल्म, मूत्रावरोध, विसर्प, ऊवर, अतिशार, रक्तपित्त को नष्ट करती है । बलदायक,