सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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चिकित्सास्थानम्
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जीवनदायी, वृष्य, चत्तुष्य, शूलनाशक है। यह मुस्तादिक यापन बस्ति सबमें श्रेष्ठ है ॥१०६-१११॥
अवेक्ष्य भेषजं बुद्धया विकारं च विकारवित् ।
बीजेनानेन शाखुङ्गः कुर्याद्भस्तिशतान्यपि ॥११२॥
रोग को समझनेवाला वैद्य बुद्धि से औषध और रोग को समझकर इस बीज रूप न्याय से सैकड़ों बस्तियों को बनाये। ('बीजमिव कर्षकस्य सूत्रं बुद्धिमतामल्पमप्यनल्पज्ञानायतनं भवति तस्माद् बुद्धिमताम्हापोहवितकः-च०) ॥११२॥
अजीर्णे न प्रयुञ्जीत दिवास्वप्नं च वज्रयेत् ।
आहाराचारिकं शेषमन्यत् कामं समाचरेत् ॥११३॥
अजीर्ण में बस्ति न देवे। बस्ति लेने पर दिन में न खोये।
शेष आहार-आचार विधान का यथेच्छानुसार पालन करे ॥
यस्मान्मधुं च तैलं च प्राधान्येन प्रदीयते ।
माधुतैलिक इत्येवं भिषग्भिर्यस्तिरुच्यते ॥११४॥
रथेवपि च युक्तेषु हृस्त्यश्वे चापि कल्पिते ।
यस्मान्न प्रतिषिद्धोऽयमतो युक्तस्थः स्मृतः ॥११५॥
बल्लोपचयवर्णानां यस्माद् व्याधिशतस्य च ।
भवत्येतेन सिद्धिस्तु सिद्धवस्तिरतो मतः ॥११६॥
सुखिनामल्पदोषाणां नित्यं स्निग्ध्याश्व ये नराः ।
मृदुकोष्ठाश्च ये तेषां विधेया माधुतैलिकाः ॥११७॥
क्याँकि मधु और तैल इनमें मुख्यतः दिये जाते हैं, इसलिये वैद्य इनको माधुतैलिक कहते हैं। जुड़े हुए तैयार रथों के तैयार घोड़े, तथा हाथी के होने पर भी इनका उपयोग किया जा सकता है, इसलिये इनको युक्त रथ कहते हैं। सैकड़ों रोगों में इनसे बल, वर्ण और पुष्टि में सिद्धि मिलती है, इसलिये इनको सिद्धवस्ति कहते हैं। जो मनुष्य सुखी जीवन व्यतीत करते हों, थोड़े दोषवाले हों; और जो नित्य स्निग्ध रहते हों, जो मृदु कोष्ठवाले हों, उनमें माधुतैलिक बस्तिथॉ बरतनी चाहिये ॥
मृदुत्वात् पादहीनत्वाद्बकुस्तनविधिसेवन्नात् ।
एकबस्तिप्रदानान्च सिद्धवस्तिष्वन्यत्रणा ॥११८॥
सिद्धवस्तियों के कोमल होने से, इसमें पादहीन होने से, वमनादि सम्पूर्णविधि का सेवन न करने से और केवल एक ही बस्ति दिये जाने के कारण सिद्ध वस्तियों में किसी प्रकार का परहेज नहीं रहता ॥११८॥
इति श्री सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने निरुहकम-
चिकित्सतं नामाष्टत्रिंशोऽध्यायः ॥३८॥
एकोनचत्वारिंशतमोऽध्यायः
अथात आतुरोपद्रवचिकित्सतं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
अव इसके आगे आतुरोपद्रवचिकित्सा का व्याख्यान करेंगे—जैसा भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥१,२॥
स्नेहपीतस्य वान्तस्य विरिक्तस्य सूतासूजः ।
निरुहस्य च कायामिर्नमन्दो भवति देहिनः ॥३॥
सोऽन्नेरत्यर्थगुरुभिरुपयुक्तः प्रज्ञाम्यति ।
अल्पो महद्धिर्वहुभिश्छादितोऽग्निरिवेन्धनैः ॥४॥
स चाल्पैलैर्घुभिश्चान्नेरुपयुक्तैर्विर्धते ।
काष्ठैर्णुभिरत्यपैश्च सन्धुश्चित्त इवानलः ॥५॥
स्नेहपान किये, वमन किये, विरेचन लिये, रक्तमोक्षण करवाये पुरुष की और निरुह लिये व्यक्ति की कायामिर्नमन्द हो जाती है। यह अग्नि अतिशय भारी अन्न के सेवन से शान्त हो जाती है जिस प्रकार थोड़ी सी अग्नि बड़ी २ बहुत सी लकड़ियों के डालने से बुझ जाती है। और यही अग्नि थोड़े, एवं लघु अन्न के सेवन से तीव्र हो जाती है, जिस प्रकार बाह्य अग्नि सूक्ष्म और थोड़ी लकड़ियों से बढ़ जाती है। इसी से कहा है—
यथाऽग्निरनस्तृणोमयाद्यैः सन्धुक्षमाणो भवति क्रमेण ।
महान्तिथरः सर्वसहस्तयैव शुद्धस्य पेयादिभिरन्तरग्नः ॥ च० सि० अ० १ ॥१२॥३-५॥
हृत्दोषप्रमाणेन सदाऽऽहारविधिः स्मृतः ।
दोषो के निकलने के अनुसार सदा आहार विधि कही है।
पेयां विलेपीमकृतं कृतं च, यूर्ध रसं त्रिद्विरथैकशश्च। क्रमेण
सेवेत विशुद्धकायाः प्रधानमध्यावरशुद्धिशुद्धः ॥ च० सि० अ० १ ॥१२॥
त्रोणि चात्र प्रमाणानि प्रस्थोऽर्धाढकमाढकम् ॥६॥
तत्रावरं प्रस्थमात्रं द्वे शेषे मध्यमोत्तमे ।
यहाँ पर तीन माप हैं। यथा—प्रस्थ, आधा आढक और आढक। इनमें प्रस्थ अवर माप, आधा आढक मध्य माप, और आढक उत्तम माप है। (प्रस्थ यहाँ पर साढ़े तेरह पल का लेना चाहिये)।
वि० मन्तव्य—जिस परिमाण में विरेचन में दोष (पुरीष के अतिरिक्त द्रव) निकलें उसके अनुसार आहार की व्यवस्था करनी चाहिये। उत्तम कोटि के विरेचन में एक आढक, मध्यम कोटि के विरेचन में आधा आढक और अवर कोटि के विरेचन में १ प्रस्थ दोष निकल जाना चाहिये। परन्तु कुछ आचार्यों का कथन है कि वह विरेचन उत्तम कोटि का माना जाता है जिसके अन्त में कफ का निःसरण हो भले ही एक ही विरेचन में कफ का निःसरण हो जाय (देखिये श्लो० १६) और कुछ आचार्यों का कथन है कि हीन कोटि के विरेचन में १०, मध्यम कोटि के विरेचन में २० और उत्तम कोटि के विरेचन में ३० वेग (बार विरेचन होना) माने जाते हैं (दे० च०