भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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धट

खि० अ० १ श्छो° १४) । इन तीर्नो में कफान्त विरेचन का

सिद्धान्त सर्वोत्तम प्रतीत होता ह क्योकि वह निर्विवाद है ॥६।।

प्रस्थे परिखते देया यवागू : स्वल्पतण्डुला ॥७॥ दरं चैवाधोढके देये तिखच्याप्याढके गते । विङेपीमुचिताद्भक्ताच्चतुथाशङ्रतां ततः ॥८॥ द्द्यादुक्तेन विधिना क्छिन्नसिक्थामपिच्छिखाम्‌ ।

अस्तिधलवणं स्वच्छुद्‌ गयुषयतं ततः ।€।

अंशद्वयप्रमाणेन दद्यात्‌ सुस्िन्नमोदनम्‌ । ततस्तु कृतसंज्ञेन हद्यनेन्द्रियबोधिना ॥१०॥

घरीनंलान्‌ वितरेद्भोक्तुमातुरायोदनं खदु ।

ततो यथोचितं भक्तं भोक्तुमस्मे विचक्षणः ॥११॥

छावेणहरिणादीनां रसेदे्यात्‌ सुसंस्छृतेः।

परस्थविरेचन मे थोडे से चावटों से बनाई (अष्टं तण्डुर)

यवागू देनी चाहिये (यह यवागू पेया एक बार देनी चादिये)

ओर आघे आद्क विरेचन मे यवागू दो वार देनी चाहिये ।

एक आद्क विरेचन में सिद्ध यवागू तीन बार (तीन समय)

देनी चाहिये । अभ्यास किये रोज के भोजन से चौोथाई माग

से बनाई विह्ेपी देवे । यह विलेपी अच्छी प्रकार गलायी

कणिर्योवाखी एवं चावल रदित होनी चोदये इसके उपरान्त

बिना स्नेहन ओर ल्वण के स्वच्छ (पते) मुंग के यूष क

साथ अच्छी प्रकार गलाया हुआ भात, प्रतिदिन के भोजन की आधी मात्रा मे देवे । इसके आगे कृत संक यूष (स्नेह, नमक आदि से वारे संस्कृत) जो कि मन को प्रिय एवं इन्द्रियो

को जाग्रत करनेवाला हो, उस यूष के साथ नरम भात प्रतिदिन के भोजन का ई तीन चोथाई भाग रोगी को दे। इसके वाद चुर वेय रोगी को मोजन, बेर, हरिण, चित्ितहरिण आदि के मली प्रकार संस्कृत मांसरस के साथ खने को देषे। ` वक्तव्य--यवागृ--“सिक्थकेरदितो मण्डो पेया सिक्थसम￾न्विता । यवागृवहुखिक्या स्यात्‌ विलेपी विरलद्रवा ॥» कृत￾युष--“अस्नेहल्वणं संमृतं कटुकैर्विना । विजेय स्नेद्वण.

कटुकेः संस्कृतं कृतमिति ॥ चरक में प्रथम तीन अन्न काटो म पेया, दूसरे तीन कालों मे विलेपी, तीसरे तीन अन्न कां , मे कृता-कृतयुष, चौथे तीन कालों भ कत-कृतरख, इस प्रकार बारहं अन्न कारों मं अथात्‌ सातवे दिन खाधारण भोजन पर आ जायेगा । इसके अतिरिक्त--“अथेनं साया परे बाहि खलोदकपरिषिकत पुराणानां ोदहितशालितण्डुलानां स्ववक्छिन्नानां मण्डपूवा खलोष्णां वाग पाययेदग्निवलममिसमीच्य च । एवं

द्वितीये तृतीये चा्काछे । चतुथे त्वन्नकाठे तथा विधानामेव शाछतष्डुलानामुल्छिननानां विलेपीयष्णोदकद्धितीयामस्नेहर्व￾शामलसतहल्वणां वा मोजयेत्‌। एं पञ्चमे षष्ठे चान्लकाठे । । ततरालुकरममेकं वु. बरस्थः सष्दाचरेत्‌॥९०॥ ` 1

सुश्रतसं हितां

मोदनमुष्णोदकानुपानं तनुना तनुस्नेहख्वणोपपन्नेन रये

भोजयेत्‌ । एवमष्टमे नवमे चान्नकाले । दशमे त्वन्नकाछे ल

कपिञ्ञलादीनामन्यतमस्य मंसरसेनौदकलावणिकेनापि सारता भोजयेत्‌ उष्णोदकानुपानम्‌ । एवमेकादशे द्वादशे चान्नकाले |

अत ऊष्वेमन्नगुणान्‌ क्रमेणोपसुज्ञानः सतरात्रेण प्रकृतिमोजन

मागच्छेत्‌ ।। चरक सू° अ० १५ ॥७-११।

हीनमध्योत्तमेष्वेषु विरेकेषु प्रकीर्तितः ॥१२॥

एकद्ित्रिगुणः सम्यगाहारस्य क्रमस््वयम्‌ ।

एक प्रस्य विरेचन दीनविरेचन है, इसमें पेया क्रम एक एक अन्न कालमेंदेना चादिये। आधा आढक विरेचन मध्यविरेचन रै । इसमे पेयादिक्रम दो दो अन्न काठदे।

आढक विरेचन उत्तमविरेचन ई, इसमे पेयादिक्रम तीन तीन

अन्नकाल तक देवे ॥१२॥

कृफपित्ताधिकान्मयनित्यान्‌ दीनविशोधितान्‌ ॥१३॥ पेयाऽभिष्यन्दयेत्तषां तपेणादिक्रमो हितः

कफ-पित्त की अधिकतावाटे, नित्य मद्यपान करनेवाहे, ,

ठीक प्रकार से जिनका शोधन नदीं हुआ उनमें पेया अभिष्यन्द ।

(लोतो मे कफ वृद्धि) उत्पन्न करती है । इसल्यि इनमें तपणादि- |

विधि बरते | (तर्प॑णलाजा के सन्तु से बनाया तपण दे) ॥१३॥

वेदनाङाभनियमसोकवे चिन््यदेतुभिः ॥१४॥

नरालपोषिताश्वापि विरिक्तवदुपाचरेत्‌ ।

वेदना, इच्छित वस्तु की अप्रासि, उपवाखादि नियम थोक

उन्माद आदि मानसिक कारण से उपवास किये या इर ए

पुरषो को विरेचन दिये इष्ट कौ भांति चिकित्सा करे ।

वि° मन्तन्य-लद्कन के पश्चात्‌ भी जब आद्र देनेका समय आपे तव.बिरेचनोक्त विधि से पेथा-विरेपी आदि %

व्यवस्था करे ॥१४॥ _ थ

आढकाधोढकप्रस्थसंख्या ह्येषा विरेचने ॥१५॥

श्ेष्मान्तत्वाद्धिरेकस्य न ताभिच्छन्ति तद्विदः ।

एको विरेकः श्छेष्मान्तो न द्वितीयोऽस्ति कश्चन ।९५

आद क, आधा आढक ओर प्रस्य यहं मात्रा विस्चन

विषय मँ है। परन्तु विरेचन को सखमश्चनेवाटे इसको न

मानते, क्योकि कफ का आना ही विरेचन की उत्तम!

(विरेचन मं पदे प्रत्त. आता है, पित्त

रान्त दूरस्य आमः रूपी.कफ आता है) | कफ का आना

एक (घस्य) विरेचन ह, दूसरे विरेचन कौ क्या बात

कषा भी रै-“तस्मान्मतिमता नित्यमात्मान पिन्तं बमनं स्थाप्यं कफान्तं च विरेचनम्‌ ११५१९

` . बलं यत्त्रिविधं प्रोक्तमतस्तत्र क्रमद्जिधा ।

[अ० ३६ , स्मे खन्नकाले त॑था विधानामेवं शारीनां दविप्रसतं ल |

के निकलने के उप. |

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