सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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चिकित्सास्थानम्
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तद्विधिधसपि पञ्चधा । तद्यथा—नस्यं, शिरोविरेचनं, प्रतिमर्शं, अवपीडः, प्रधमनं च । तेषु नस्यं प्रधानं शिरोविरेचनं च, नस्यविकल्पः प्रतिमर्शः शिरोविरेचनविकल्पोऽवपीडः प्रधमनं च, ततो नस्यशब्दः पञ्चधा नियमितः॥
औषध को या औषधि से सिद्ध स्नेह को नासिकाओं से दिया जाने के कारण नस्य कहा जाता है । यह नस्य दो प्रकार का है, शिरोविरेचन और स्नेहन । यह दो प्रकार का नस्य भी पाँच प्रकार का है, यथा—नस्य, शिरोविरेचन, प्रतिमर्श, अवपीड और प्रधमन । इनमें नस्य और शिरोविरेचन मुख्य हैं । नस्य का ही भेद प्रतिमर्श है, शिरोविरेचन के भेद-अवपीड और प्रधमन हैं । नस्य शब्द इन पाँचों के लिये प्रयुक्त होता है ॥२१॥
तत्र यः स्नेहनाथं शून्यशिरसां श्रीवास्कन्धोरसां च बलजननाथं दृष्टिप्रसादजननाथं वा स्नेहो विधीयते तस्मिन् वैशेषिको नस्यशब्दः । तत्तु देयं वाताभिभूते शिरसि दन्तकेशदमश्रुप्रातदारुणकर्णशुल्ककर्णद्वेष्टतिमिरस्वरोपघातनासारोगास्यशोषावबाहुकाकाळजवलीपलितप्रादुर्भावदारुणप्रबोधेषु वातपैन्तिकेषु मुखरोगोव्वन्येषु च वातपित्तहरद्रव्यसिद्धेन स्नेहेनेति ॥२२॥
इनमें जो स्नेहन शून्यशिरवाली (खाली शिर की प्रतीति) में स्नेहन के लिये, श्रीवा और स्कन्ध में बल लाने के लिये, अथवा दृष्टि की निर्मलता के लिये दिया जाता है, उस स्नेह में खासकर नस्य शब्द बरता जाता है । यह नस्य (स्नेह) वात से पीड़ित शिर में, दाँत-केश-रमश्रु के गिरने में, भयानक कर्णशूल में, कर्णद्वेष्ट में, तिमिर, स्वरभेद (स्वर बैठना), नासारोग, मुखशोष, अवबाहुक, असमय में क्षुरिणी या बाल श्वेत हो जाने पर, वातपित्तजन्य भयानक कष्टदायक मुखरोगों में या दूसरे रोगों में या पित्त नाशक द्रव्यों से सिद्ध-धी, तैल, वसा या मज्जा स्नेह से नस्य देना चाहिये ॥२२॥
शिरोविरेचनं श्लेष्मणाऽभिन्यामतालुकण्ठशिरसामरोचकशिरोगौरवशूलपीनसाधौवभेदककृमिप्रतिद्वयथापस्मारगन्धाज्ञानोव्वन्येषु चोर्ध्वजत्रुगतेषु कफजेषु विकारेषु शिरोविरेचनद्रव्यैस्तसिद्धेन वा स्नेहेनेति ॥२३॥
शिरोविरेचन—कफ से भरे ताणु, कण्ठ, शिर में, अरोचक में, शिर के भारीपन में, शूल में, पीनस में, अर्धवभेदक में, कृमि में, प्रतिशय में, अपस्मार में, गन्ध के नाश में, अन्य ऊर्ध्वजत्रुगत कफजन्य रोगों में शिरोविरेचन द्रव्यों से अथवा इनसे सिद्ध स्नेह से शिरोविरेचन नस्य देना चाहिये ॥२३॥
तत्रैतद्विधिधसप्यमुक्तवतोऽन्तकाले, पूर्वाह्ने श्लेष्मरोगिणां, मध्याह्ने पित्तरोगिणां, अपराह्ने वातरोगिणाम् ॥
यह दोनों प्रकार का नस्य बिना भोजन कराये, भोजन के समय पूर्वाह्ने में कफ रोगियों को देना चाहिये । पित्त रोगियों को मध्याह्ने में और वातरोगियों को अपराह्ने में देना चाहिये ॥
अथ पुरुषाय शिरोविरेचनीयाय त्यक्तमृत्रपुरीयाय मुक्तवते ऽयमे काले दन्तकाष्ठधूमपानाभ्यां विशुद्धवकत्रस्रोतसे पाणितापपरिस्विन्नमृदितगळकपोल्लल्लाटप्रदेशाय वातातपरजोहोने वेशमन्युतानशायिने प्रसारितकरचरणाय किञ्चित् प्रविलम्बितशिरसे वन्नाच्छादितनेत्राय वामहस्तप्रदेशिन्यघोत्रामितनासाप्राय विशुद्धस्रोतसि दक्षिणहस्तेन स्नेहमुष्णाम्बुना प्रतमं रजतसुवर्णताम्रमणिमृत्पात्रशुक्तीनामन्यतमस्थं शुक्रत्या पिचुना वा सुखोष्णं स्नेहमदुतमासिद्धेद्वयवच्छिन्नन्धारं यथा नेत्रं न प्राप्नोति ॥२४॥
स्नेहेऽवसिच्यमाने तु शिरो नैव प्रकम्पयेत् । न कुप्येन्न प्रभाषेच्छु न णयान्न हसेत्तथा ॥२६॥ एतैहि विहतः स्नेहो न सम्यक् प्रतिपद्यते । ततः कासप्रतिद्वययाशिरौऽस्निग्दसंभवः ॥२७॥
शिरोविरेचन के योग्य पुरुष को, मल-मूत्र का त्याग कराके थोड़ासा भोजन किये हुए, आकाश में बादल न होने पर, दातुन और धूमपान से मुख के खोतों को शुद्ध करके, हाथों को अग्नि पर गरम करके उनसे गला, कपोल, माथा इनको स्वेद देकर एवं मलकर, वायु-धूप और धूल से रहित घर में रोगी को पीठ के भार चित्त लेटाकर, हाथ-पैर को सीधा फैला कर, शिर को नीचे की ओर कुछ लटकाकर, आँखों को कपड़े से ढपकर, बायें हाथ की प्रदेशिनी अंगुली से नासा के अग्रभाग को कुछ ऊँचा करके, छोट के निर्मल (सीध रहित) होने पर, गरम पानी से गरम किये स्नेह को दक्षिण हाथ से, सुवर्ण, चाँदी, ताम्र, मिट्टी के पात्र या शुक्ति में रखे हुए स्नेह को शुक्ति या रई के फोये से सुहाता हुआ गरम, स्नेह को न बहुत जल्दी न रुककर, एक समान धार से नासिका में इस प्रकार डाले कि स्नेह नेत्र तक न पहुँचे । स्नेह को डालते समय रोगी शिर को न हिलाये न क्रोध करे न बोले, न हँक ले और न हँसे । ऐसा करने से स्नेह ठीक प्रकार नहीं पहुँचता । उससे कास, प्रतिशय, शिरोरोग, अक्षिरोग उत्पन्न हो जाते हैं ।
वक्तव्य—(१) 'स्वस्थवृत्ते तु शीते मध्याह्ने, शरदसन्तयोः पूर्वाह्ने, ग्रीष्मेऽपराह्ने, वर्षास्वादित्यदर्शने, पञ्चकर्मण्यान्चरतो बस्तिकर्मांतरकालमेव ॥' संग्रह
(२) "प्राकसूर्यं मध्यसूर्यं वा कुर््यात्तर्पणमेव वा । उत्तानस्य शयानस्य शयने स्वास्तुते सुखम् ॥" प्रलम्बशिरसः किञ्चित् किञ्चत् पादोन्नतस्य च । दद्यान्नासापुटे स्नेहं तर्पणं बुद्धिमान् भिषक् ॥ अनबाक् शिरसो नस्यं न शिरः प्रतिपद्यते । अत्यवाक्शिरसो नस्यं मस्तुलुंगे च तिष्ठति ॥