सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ४० ]
दूध-मछली मछ-यवागु का पान किये, अल्पकफवाले व्यक्ति धूम पान न करें ॥११॥
अकालपीतः कुठते भ्रमं मूर्च्छां शिरोरुजम् ।
प्राणश्रोत्राक्षिजिह्वानामुपघातं च दारुणम् ॥१२॥
बिना समय के किया हुआ धूमपान भ्रम, मूर्च्छा, शिरोरोग, प्राण-नेत्र-औंख-जिह्वा, इनका नाश भयानक रूप में करता है ॥१२॥
आघास्तु त्रयो धूमा द्वादशसु कालेपूपादेयाः । तद्यथा- जुतदन्तप्रक्षालननस्यस्तानभोजनदिव्याख्यन्मैथुनच्छृद्भि- मूत्रोच्चारहसितरुषितशब्दकर्मान्तेष्विवति । तत्र विभागो- मूत्रोच्चारक्षवथुहसितरुषितमैथुनान्तेषु स्नेहिकः, स्नान च्छृद्भिनदिव्याख्यन्तान्तेषु वैरेचनिकः, दन्तप्रक्षालनस्य स्तानभोजनशब्दकर्मान्तेषु प्रायोगिक इति ॥१३॥
इनमें पहले तीन धूमों का उपयोग बारह समयों में करना चाहिये—छोंक लगने पर, दातुन करने पर, नस्य लेने पर, स्नान के पीछे, भोजन कर चुकने पर, दिन में सोकर, मैथुन के पीछे, वमन करके, मल-मूत्र त्यागकर, हँसनेपर, क्रोध करने के पीछे और शब्दकर्म के पीछे करे । इसमें स्नेहिकधूम-मल-मूत्र त्याग कर, छोंक आनेपर, हँसनेपर, क्रोध करनेपर और मैथुन के पीछे बरते । वैरेचनिक धूम-स्तान, वमन, और दिन में सोने के पीछे बरते । प्रायोगिक धूम-दातौन करने के पीछे, नस्य, स्नान, भोजन, शब्दकर्म के पीछे बरते ॥१३॥
तत्र स्नेहिको वातं शमयति, स्नेहादुपलेपाच्छृद्भि- वैरेचनः श्लेष्माणमुक्लेश्यापकर्षति, रौदयात्तैदृष्यादौ- ष्याद्वैशद्याच्छृद्भि, प्रायोगिकः श्लेष्माणमुक्लेश्यात्युत्किलष्टं चापकर्षति शमयति वातं साधारणत्वात् पूर्वाभ्यामिति ॥
स्नेहिकधूम स्नेह एवं उपलेप (कफद्विद्धि) से वायु का शमन करता है । वैरेचनिक धूम-रूक्ष तीक्ष्ण उष्ण एवं विशद होने के कारण कफ को उत्कलेशित करके बाहर निकालता है । प्रायोगिकधूम स्नेहिक और वैरेचनिक धूम के समान होने से कफ को उत्कलेशित करता है, और उत्किलष्ट कफ को बाहर निकालता है, एवं वायु को शान्त करता है ॥१४॥
भवति चात्र—
नरो धूमोपयोगाच्छृद्भि ससन्नेन्द्रियवाङ्मनाः ।
हृदकेशद्विजश्मश्रुः सुगन्धिं विशदान्तः ॥१५॥
तथा कासश्चासारोचकात्योपलेपस्वरभेदमुखाक्वाक्ष- क्षवथुवमथुग्रुथतन्द्रानिद्राहनुमन्यास्तम्भाः पीनसशिरोरोग- कर्णाक्षिशुष्का वातकफनिमित्ताश्चास्य मुखरोगा न भवन्ति ॥१६॥
कहा भी है—
धूम के सेवन से मनुष्य की इन्द्रियाँ और मन निर्मल बन जाते हैं । केश, दांत, दाढ़ी-मूछ दृढ़ होते हैं । मुख सुगन्धित
और विशद-साफ हो जाता है । इसी प्रकार कास, श्वास, अरोचक, मुख की दुर्गन्ध, स्वरभेद, मुख का खाव, छोंक आना, (वमन), कथ (घर्षाटि भरना या अचानक श्वास का रुकना), शूक आना, तन्द्रा, निद्रा, हनुस्तम्भ, मन्धास्तम्भ, पीनस, शिरोरोग, कर्णशूल, अक्षिशूल, वात, कफजन्य मुखरोग इसको नहीं होते ॥१५, १६॥
तस्य योगायोगातियोगा विज्ञातव्याः । तत्र योगो रोग- प्रशमनः, अयोगो रोगाप्रशमनः, तालुगल्लोषपरिदाह- पिपासामूर्च्छाभ्रमसदकर्णद्वेष्टदृष्टिनासारोगदौर्बल्यान्यति- योगो जनयति ॥१७॥
धूमपान के योग, अयोग और अतियोग जानने चाहिये । इनमें सम्यग् योग-रोग की शान्ति होना, अयोग-रोग का शान्त न होना । तालु-गले में शुष्कता, जलन, प्यास, मूर्च्छा, भ्रम, सद, कानों में शब्द, दृष्टिरोग, नासारोग, दुर्बलता आदि को धूम का अतियोग उत्पन्न करता है ॥१७॥
प्रायोगिकं त्रींक्षीनुच्छवासानाददीत मुखनासिकाभ्यां च पर्यायांक्षींश्चतुरो वेति, स्नेहिकं यावदश्रुषवृत्तिः, वैरे- चनिकमादोषदर्शनात्, तिलतण्डुलयवाग्पीतेन पातव्यो वमनीयः, प्रासान्तरेषु कासघ्न इति ॥१८॥
प्रायोगिक धूम में तीन-तीन घूँट खींचे, अथवा मुख और नासिका से तीन या चार घूँट ठे । स्नेहिक धूम को अश्रु आने तक पीये । वैरेचनिक धूम को दोष को निकालने तक पीये । तिल एवं तण्डुल की यवाग् पिलाये हुए को वमनीय धूम पिलाये । कासघ्न धूम को प्रासों के बीच बीच में दे ॥१८॥
व्रणधूमं शरावसंपुटोपनीतेन नेत्रेण व्रणमानयेत्, धूमपानाद्वेदोपशमो व्रणवैशद्यामात्मावोपशमश्च भवति ॥
विधिरेष समासेन धूमस्याभिहितो भया ।
नस्यस्यातः प्रवद्व्यामि विधिं निरवशेषतः ॥२०॥
शराव सम्पुट से नेत्रद्वारा पहुँचाए हुए व्रण धूम को व्रण में देवे । व्रण पर धूम देने से वेदना की शान्ति, व्रण में निर्मलता और खाव बन्द होता है । धूम की यह विधि संक्षेप में मैंने कह दी है । इसके आगे नस्य की विधि को सम्पूर्णरूप में कहूँगा ।
वक्तव्य—धूमपान की विस्तृत विधि चरक सूत्र ० अ० पाँचवें में दी है, वहाँ देखनी चाहिये । अतिधूमपान का उपचार—“तत्रेष्टं सर्पिषः पानं नावनाक्षन्तर्पणम् । स्नेहिके धूमजे दोषे वायुपित्तानुगो यदि । शीतं तु रुक्पित्ते स्यात् श्लेष्मपित्ते विरक्षणम् ॥” सम्यक् पीत के लक्षण—“हृत्कण्ठेन्द्रियशुद्धित्वं लघुत्वं शिरसः शमः । यथेरितानां दोषाणां सम्यक् पीतस्य लक्षणम् ॥” १६, २०॥
औषधसौषधसिद्धो वा स्नेहो नासिकाभ्यां दीयत इति नस्यम् । तद्वद्विषधम-शिरोविरेचनं, स्नेहनं च ।