भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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अ० ४० ]

चिकित्सास्थानम्

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वि० मन्तव्य—चरक में क्षौम-रेशम वस्त्र से लपेटने का विधान नहीं है, होना भी नहीं चाहिये। क्योंकि रेशम के धूम में दुर्गन्ध होती है ॥४॥

तत्र बस्तिनेत्रव्रद्वैधूमनेत्रव्रद्व्याणि व्याख्यातानि भवन्ति । धूमनेत्रं तु कनिष्ठिकापरिणाहमग्ने कलायमात्र-क्षोतो मूलेऽङ्गुष्ठपरिणाहं धूमवर्तिप्रवेशक्षोतोऽङ्गुलाण्यध्वच-चत्वारिंशत् प्रायोगिकैः, द्वाविंशत् स्नेहने, चतुर्विंशतिर्वैरचने, षोडशङ्कुलं कासघ्ने वामनीये च । एतेऽपि कोलाक्षिस्मात्र-च्छिद्रे भवतः । त्रणनेत्रमष्टाङ्कुलं त्रणधूपनार्थं कलायपरि-मण्डलं कुलत्थवाहिस्त्रोत इति ॥५॥

धूमनेत्र को बनाने के साधन बस्तिनेत्र के समान (स्वर्ण, चाँदी, लकड़ी आदि) हैं। धूमनेत्र आगे में कनिष्ठिका अँगुली के समान मोटा, मटर के जाने योग्य खांत का, मूल में अँगूठे के समान मोटाई का, धूमवर्ति के प्रवेश होने योग्य खोतवाला, अङ्गुलाक्ष अंगुल लम्बाई का प्रायोगिक धूम के लिये होना चाहिये। स्नेहन के लिये बत्तीस अंगुल, विरेचन के लिये चौबीस, कासघ्न धूम में सोलह, और वमनीय में भी सोलह अंगुल होना चाहिये। इनका छेद बेर की गुठली के बराबर होता है। त्रणनेत्र की लम्बाई आठ अंगुल, त्रण में धूम देने के लिये, मटर के बराबर मोटाई और छेद कुलथी के जाने योग्य होता है।

वि० मन्तव्य—जो सज्जन कहा करते हैं कि हुक्का पीना भारतीयों ने मुसलमानों से सीखा है वे इस सूत्र में बतलाई गई धूमनेत्र (धूम पान की नलिका = हुक्का, कली तथा चिलम) के निर्माण की विधि पर ध्यान दें। और सू० ६ पर भी धूमनेत्र बनाने का प्रकार भगवान् पुनर्वसु ने भी च० सू० अ० ५ में बतलाया है। त्रण में धूम देना त्रण के ६० उपक्रमों में “त्रणधूपन” नाम से बतलाया है और श्लो० ८० में विधि कही है, देखिये चि० स्था० अ० १। च० चि० अ० १७ श्लो० ७६ में ‘मल्लकसपुटे पाठ है, भाषाविशेषज्ञ मल्लक का अपभ्रंश “चल्य-चिल्य” मानते हैं ॥५॥

अथ सुखोपविष्टः सुमना त्रव्वधोदृष्टिरतन्द्रितः स्नेहा-कंदीमायां वर्ति नेत्रक्षोतसि प्रणिधाय धूमं पिबेत् ॥६॥

मुखेन तं पिबेत् पूर्व नासिकाभ्यां ततः पिबेत् ।

मुखपीतं मुखनेत्रं वसेत् पीतं च नासया ॥७॥

मुखेन धूममादाय नासिकाभ्यां न निर्हरेत् ।

तेन हि प्रतिलोसेन दृष्टिस्तत्र निहन्व्यते ॥८॥

विशेषतस्तु प्रायोगिकं प्राणेनाददीत, स्नेहिकं मुख-नासाभ्यां, नासिकायां वैरेचनिकं, मुखनेत्रैवतरी ॥९॥

मुखपूर्वक बैठकर, प्रसन्न चित्त, कमर को सीधा रखकर, नीचे को देखते हुए, बिना आंखय के, स्नेह से भिगोई—एवं

अग्नि से प्रदीप्त धूमवर्ति को नेत्र क्षोत में लगाकर धूम पीये। पहले धूम को मुख से पीये, फिर नासिकाओं से पीये। मुख से पीये धूम को तथा नासा से पीये धूम को मुख से ही निकाले। मुख से धूम को पीकर नासिका से कभी न निकाले। क्योंकि नासा से निकालने पर दृष्टि को हानि पहुँचती है। विशेषकर प्रायोगिक धूम को नासिका से लेवे। स्नेहिक धूम को मुख और नासा से, वैरेचनिक को नासा से, कासघ्न और वमनीय धूम को मुख से ही लेवे।

वि० मन्तव्य—प्रायोगिक धूम को नासा से पीने का विधान विचारणीय है ॥६-९॥

तत्र प्रायोगिके वर्ति उ्यपगतशरकाण्डां निवातात-पशुष्कांमङ्गारेष्ववदीप्य नेत्रमूलक्षोतसि प्रयुज्य धूममाह-रेति त्रयात् ; एवं स्नेहनं वैरेचनिकं च कुर्यादिति । इतर-योग्यपेतधूमामङ्गारे स्थिरं समाहिते शरावे प्रक्षिप्य वर्ति मूलच्छिद्रेणान्येन शरावेण पिधाय तस्मिन् छिद्रे नेत्रमूलं संयोज्य धूममासेवेत् , प्रशान्ते धूमे वर्तिमवशिष्टां प्रक्षिप्य पुनरपि धूमं पाययेदादोषविशुद्धेः ; एष धूमपातोपाय-विधिः ॥१०॥

प्रायोगिक धूम में वर्ति को शरकरण्डे में से निकालकर, वायुरहित—एवं छाया में सुखाकर अङ्गारों से जलाकर, नेत्र-मूल क्षोत में रखकर धूम पी, ऐसा रोगी को कहे। स्नेहन और वैरेचनिक धूम में भी ऐसा ही करे। कासघ्न और वमनीय धूम में—वर्ति के जल जाने पर धूम रहित अङ्गारों में धरकर, वर्ति को दृढ़ एवं भली प्रकार धरे। शराव (चिलम) में रख देवें। इसके ऊपर दूसरा शराव, जिसके मूल में छेद हो, उसे रखकर (ढाँगर) छेद में धूमनेत्र के मूल को लगाकर धूम पीये। धूम के शान्त हो जाने पर, बची हुई वर्ति को फिर से रखकर धूम पीये। जबतक कि दोष का शोधन न हो जाये। यह धूम पान की विधि है।

वि० मन्तव्य—शराव आजकल का चिलम है, च० चि० अ० १८ के श्लो० ६५-७५ में भी शरावसम्पुट का विधान है ॥

तत्र शोकश्रमभयामर्षौण्यविषरक्तपित्तमदमूर्च्छा-दाहपिपासापाण्डुरोगतालुशोषच्छिदशिरोऽभिघातोद्गारा-पतपित्ततिमिरप्रमेहोद्ग्राधानोर्ध्ववातातां बालवृद्धदुर्बल-विरिक्तास्थापितजागदितगभिणीरुक्षक्षीणक्षतोरस्कमधुघृत-दधिदुग्धमस्त्यमद्यवागूपीताल्पकफाश्च न धूममा-सेवेरन् ॥११॥

शोक, यकान, भय, क्रोध, गरमी, विष, रक्तपित्त, मद, मूर्च्छा, दाह, प्यास, पाण्डुरोग, तालुशोष, वमन, शिरोऽभिघात, उद्गार, अपतर्पण, तिमिर, प्रमेह, उदर, आध्मान, ऊर्ध्ववात से पीड़ित, बालक वृद्ध, दुर्बल, विरेचन लिया, आस्थापन लिया, रात का जागा, गर्भवती, रुक्ष, क्षीण, उरःक्षत, मधु-घृत-दधि-