सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ४ ]
भाँति रक्त अथवा रज (आर्तव) आता है। दिन में सोने से कफजन्म रोग, प्लीहोदर, प्रतिशय, पाण्डु, शोथ, ज्वर, मोह, अङ्गों की शिथिलता, अविपाक, अरुचि होती है। जो रोगी सोना ही पसन्द करता है, वह तमोगुण से अभिभूत हो जाता है। ऊँचे बोलने से वायु शिर में दर्द उत्पन्न करती है, तथा अन्धापन, जडता, गन्धनाश, वधिरता, गूँगापन, जवाड़े का खुला रहना, अधिमन्थ, अर्दित, नेत्रस्तम्भ, निमेषस्तम्भ, तुष्णा, कास, निद्रानाश, दाँतों का हिलना और अन्य वातजन्म उपद्रव हो जाते हैं। सवारी पर सवारी करने से वमन, मूर्च्छा, भ्रम, क्लम, अङ्गों का पकड़ा जाना, इन्द्रियों का विभ्रम होता है। देर तक बैठे रहने से श्रोणि में वेदना होती है। बहुत चलने से वायु जंघाओं में वेदना करती है, टाँगों का सूखना, या शोक अथवा पादहर्ष करती है। शीतलजल तथा चन्दन आदि शीतल वस्तुओं के भोग करने से वायु की वृद्धि होती है, अङ्गों का दूदना, विष्टम्भ, शूल, आस्मान, कम्पन होता है। वायु और धूप के सेवन से विवर्णता, ज्वर भी हो जाता है। विरुद्ध एवं अध्यशन से मृत्यु या भयानक रोग होता है। असत्य भोजन से बल और वर्ण नष्ट होते हैं। जो असंयमी मनुष्य पशु की भाँति प्रमाण से अधिक खाते हैं वे रोग समूह के कारण अजीर्ण के धिकार बनते हैं ॥२५-३७॥
व्यापदां कारणं वीक्ष्य व्यापत्स्वेतासु बुद्धिमान् ।
प्रयतेतातुरारोग्ये प्रत्यनीकेन हेतुना ॥३८॥
बुद्धिमान् वैद्य रोगी के आरोग्य के लिये व्यापत्तियों के कारण को समझकर इन व्यापत्तियों में विपरीत हेतु से प्रयत्न करे। (इन कारणों से रोगी को बचावे) ॥३८॥
विरिक्तवान्तरहरिणैणलावकाः
शशश्च सेज्यः समयूरतिचिरिः ।
सषष्टिकाश्चैव पुराणशालय-
स्तथैव सुदृगा लघु यच्छ कीर्तितम् ॥३९॥
वमन एवं विरेचन किये रोगी—हरिण, एण, बटेर, खर-गोश, मोर, तीतर, साँठी, पुराने चावल, मूँग और जो लघु भक्ष्य हैं, उनका सेवन करे ॥३९॥
इति श्रीसुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने आतुरोपद्रव-
चिकित्सितं नामकौनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥३६॥
चत्वारिंशतमोऽध्यायः
अथातो धूमनस्यकवलप्रहृचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् घन्वन्तरिः ॥२॥
अब इसके आगे धूमनस्य कवलप्रहृ चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् घन्वन्तरि ने कहा था।
वि० मन्तव्य—धूम, नस्थ तथा कवल के ग्रहण—सेवन द्वारा जो चिकित्सा की जाती है उसका वर्णन इस अध्याय में किया गया है ॥१,२॥
धूमः पञ्चविधो भवति; तद्यथा—प्रायोगिकः, स्नेहिको, वैरेचनिकः, कासघ्नो, वामनीयश्चेति ॥३॥
धूम पाँच प्रकार का है, यथा—प्रायोगिक, स्नेहिक, वैरेचनिक, कासघ्न और वामनीय।
वि० मन्तव्य—प्रायोगिक धूम—जो प्रतिदिन स्वस्थों द्वारा पिया जाता है यथा—स्वस्थ वृत्त में भगवान् पुनर्वसु ने कहा है “धूमपः” च० सू० अ० ८। तथा च० सू० अ० ५ में श्लो० २०-२४ तथा २७-३६। स्नेहिक धूम जो स्नेहन के लिये पिया जाता है, वैरेचनिक धूम—जो शिरोविरेचन के लिये पिया जाता है, कासघ्न—जो कास श्वास एवं स्वरमेद आदि कण्ठ रोगों में पिया जाता है, वमनीय—जो वमन के लिये पिया जाता है, इसको पीने से वमन हो जाती है। यह चार धूम—रोगियों की रोगनिवृत्ति के लिये प्रयुक्त किये जाते हैं। और प्रायोगिक धूम—तत्र प्रयोगः = स्वस्थस्थ सततोपयोगः तत्र साधुः प्रायोगिकः, सच्च श्लेष्माण् उत्कलेशयति, उत्किलच्छ च अपकर्षति, शमयति वातं, स्नेहनविरेचनाभ्यां तुल्यत्वात् इति डल्हणाचार्यः। तथा स्वयं सुश्रुतः १४ तमे सूत्रे ॥३॥
तत्रैलादिना कुष्ठतगरवर्ज्येन शलक्षणपिष्टेन द्रादशाङ्गुलं शरकाण्डमंगुलिपरिणाहं क्षोमेणाष्टाङ्गुलं वैष्टयित्वा लेपयेद्देशा वर्तिः प्रायोगिके, स्नेहफलसारमधुच्छिष्टसर्ज-रसगुग्गुलुप्रभृतिभिः स्नेहमिश्रैः, स्नेहिके, शिरोविरेचन-द्रव्यैर्वैरेचने, बृहतीकण्टकारिकात्रिकटुकासमर्दहिडिक्कुदीत्वद्भमनःशिलाच्छिन्नरूहाककर्कटशृङ्गोप्रभृतिभिः कास-हरेश्च कासघ्ने, स्नायुचर्ममुखरशृङ्गकर्कटकास्थिशुष्कमत्स्य-वल्तूरुक्रमिप्रभृतिभिर्वामनीयैश्च वामनीये ॥४॥
इसके लिये एलादिगण में से कूठ और तगर को छोड़कर शेष द्रव्यों को बारीक पीसकर बारह अंगुल लम्बे और अंगुली के समान मोटे सरकण्डे पर रेशम के वस्त्र को आठ अंगुल लेप्टकर—इनका लेप कर दे। यह वर्ति प्रायोगिक धूम (प्रतिदिन बरतने के) लिये है। ऐरण्ड आदि स्नेहफल, देवदार आदि की लकड़ी (का बुरादा) मोम, राल, गुग्गुलु आदि की स्नेह में मिलाकर स्नेहिक धूम में बरते। शिरोविरेचन द्रव्य (चिरचिते के बीज, विडंग आदि) विरेचन धूम में बरते। बड़ी कटेरी, कटेरी, त्रिकटु, कसौदी, हींग, हिंगोट, मैनसिल, गिलोय, काकड़ाशृंगी आदि और काखर वस्तुयें कासघ्न धूम में बरते। स्नायु, चर्म, खुर, सींग, कैंकड़े की अस्थि, सूखी मछली, सूखा मांस, क्रमि (केंबुआ) आदि वमन करनेवाले द्रव्यों को वामनीय धूप में बरते।