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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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चिकित्सास्थानम्

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शिर का हीन और अतिशोधन होने पर (क्रमशः) कफन और वातनाशक चिकित्सा करे। भली प्रकार से शिर का शोधन होने पर घी का नस्य देना चाहिये। (एक दिन के अन्तर से, दो दिन के अन्तर से या सात दिन के पीछे, अथवा एककोस दिन के पीछे बार-बार जब तक ठीक समझे नस्य देवे। वायु का अधिक प्रकोप होने पर या जिसे वायु का रोग हो, उसे दो समय नस्य देना चाहिये)।

वि० मन्तव्य—मास्तेना....विजानात। ॥४३॥ इस श्लोक का पूर्वार्द्ध स्यात् इस प्रकार होना चाहिये—

मास्तेनाऽभिभूतिः स्यात् अत्यन्तं यस्य देहिनः।

अर्थात् जिस मानव की वायु द्वारा अत्यन्त अभिभूति (अभिभव-पीडन) हो रही हो उसको दिन से दो बार नस्य देना चाहिये ॥३७-४३॥

अवपीडस्तु शिरोविरेचनवदभिष्यण्णसर्पदृष्टविसंज्ञेभ्यो दद्याच्छिरोविरेचनद्रव्याणामन्यतमसवपिष्यावपीड्य च, शर्करैन्दुरसक्षीरघृतमांसरसानामन्यतमं क्षीणानां शोणितपित्ते च विदध्यात् ॥४४॥

अवपीड नस्य शिरोविरेचन की भांति अभिष्यण्ण (मेद-कफ से भरे शिरवाले), सर्पदृष्ट, मूर्छित पुरुषों को देना चाहिए। इसके लिये पिप्पली, विडंग आदि शिरोविरेचन द्रव्यों में से किसी एक को पीसकर, दवाकर, निचोड़कर देना चाहिये, और शर्करा, इन्दुरस, दूध, घी, मांसरस में से किसी एक को क्षीण हुए एवं रक्तपित्त रोगियों में देना चाहिए।

वि० मन्तव्य—अवपीड नामक नस्य-यह शिरोविरेचन नस्य के दो विकल्पों (मेदों) में एक है। देखिये सू० २१। इसकी विधि श्रीशाङ्कधराचार्य के शब्दों से—शा० सं० उ० खं० अ० ८८।

कल्ककृतात् औषधात् यः पीडितो निःस्पृतो रसः।

सोऽवपीडः समुद्धिष्टः तीक्ष्णद्रव्यसमुद्भवः ॥१२॥

अर्थात्—नकळिकनी आदि तीक्ष्ण द्रव्य का कल्क करके निचोड़कर जो रस निकाला जाता है वह “अवपीड” नस्य कहलाता है ॥४४॥

क्रशदुर्वलभीरूणां सुकुमारस्य योषिताम्।

श्रुताः स्नेहाः शिरःशुद्धये कल्कस्तेभ्यो यथा हितः ॥

कुश, दुर्वल, भीरु, कोसलप्रकृति तथा स्त्रियों के शिर के शोधन के लिये सिद्ध किये स्नेह तथा उन द्रव्यों का कल्क हितकारी है ॥४५॥

चेतोविकारकूमिविषाभिपन्नानां चूर्णं प्रधमेत् ॥४६॥ मानसिक विकार, कूमि और विष से पीड़ित रोगियों में चूर्ण को नाक में फूँके।

वक्तव्य—नाड़ीपंडंगुलायामा द्विमुखी च तथा धमेत्। त्रिशर्चूर्णं मुच्छतीमात्रमेव प्रधमने विधिः ॥ शुक्तिप्रमाणं जिघ्रद्वा बद्धं सूक्ष्मेण वाससा ॥ (मुच्छती-चुटकीभर)।

वि० मन्तव्य—प्रधमन नस्य भी शिरोविरेचन नस्य का एक विकल्प है। यह—चूर्ण रूप में—स्वला चूर्णित द्रव्य नाक में डाला जाता है जिसे “सूचनी” कहते हैं। इसे चुटकी भर कर, नासा पुट में डाला जाता है अथवा नाली में भर वैद्य, रोगी की नासा में फूँकता है अथवा वस्त्र में चूर्ण की पोटली बनाकर सूँघा जाता है ॥४६॥

नस्येन परिहरंत्यो मुक्तवानपत्तपित्तोऽत्यर्थतत्तत्तत्प्रतिश्यायी गभिणी पीतस्नेहोदकमद्यद्रवोऽजीर्णां दत्तवस्तिः कुद्धो गरातस्तृषितः शोकाभिभूतः श्रान्तो बालो वृद्धो वेगावरोधितः शिरःस्नातुकांश्चचेति, अनातंवे चाभ्रे नस्यधूम्रो परिहरेत् ॥४७॥

नस्य के लिये अनोष्य—भोजन करके, अपतर्पण किया (लंघन किया), अतिशय तरुण, प्रतिश्याय रोगी, गर्भवती, स्नेह-मद्य पानी द्रव पीये हुये, अजीर्णरोगी, वस्ति लिया, कुद्ध, गर से पीड़ित, प्यास से पीड़ित, शोक से परितप्त, थका हुआ, बालक, वृद्ध, मलमूत्र आदि वेग को रोके हुए, शिरसमेत स्नान की इच्छावाला व्यक्ति, वादल आने पर या ठीक म्रुतु न होने पर, नस्य और धूम छोड़ देवे ॥४७॥

तत्र ह्येनातिमात्रातिशीतोष्णसहसाप्रदानादतिप्रविलम्बितशिरस उच्छिन्नतो विचलतोऽभ्यवहरतो वा प्रतिपिद्धप्रदानान्च व्यापदो भवन्ति तृष्णादुगारादयो दोषनिमित्ताः क्षयाश्च ॥४८॥

इसमें हीनमात्रा में, अतिमात्रा में, अतिशीत, अतिउष्ण, सहसा देने से, शिर को बहुत नीचा करके देने पर, छींक लेते हुए, हिलते हुए, खाते हुए, निषेध की अवस्थाओं में स्नेह देने पर हानियां होती हैं। ये हानियां दोषजन्य तृष्णा, उद्वार आदि हैं और क्षयजन्य हैं ॥४८॥

भवतश्चात्र—

नस्ये शिरोविरेके च व्यापदो द्विविधाः स्मृताः।

दोषोत्कलेशात् क्षयाच्चैव विज्ञेयास्ता यथाक्रमम् ॥४९॥

कहा भी है—नस्य में और शिरोविरेचन में दो प्रकार की हानियां होती हैं। इनमें स्नेह नस्य में दोषोत्कलेशजन्य और शिरोविरेचन में क्षयजन्य (दोषक्षयजन्य) हानियां होती हैं ॥४९॥

दोषोत्कलेशनिमित्तास्तु जयेच्छमनशोधनैः।

अथ क्षयनिमित्तास्तु यथास्वं बृंहणं हितम् ॥५०॥

दोषोत्कलेशजन्य हानियों की चिकित्सा शोधन और शमन से करे। क्षयजन्य हानियों की चिकित्सा उनके अपने दोषों के अनुसार बृंहण विधि से करे ॥५०॥