सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ४० ]
तेषु प्रतिमर्शश्चतुर्दशसु कालेषुपादेयः तद्यथा—तत्सो- स्थितेन, प्रक्षालितदन्तनेन, गृह्णात्रिगच्छता, व्यायामव्यवा- याश्चपरिश्रान्तेन, मूत्रोच्चारकवलाञ्चनान्ते मुक्तवता, छदितवता, दिवास्वप्नोस्थितेन, सार्यं चेति ॥११॥
प्रतिमर्श नस्य का उपयोग चौदह समय में करना चाहिये। यथा—प्रातः विस्तर से उठने पर, दाँतों को साफ करके, घर से बाहर निकलते समय, व्यायाम मैथुन मुसाफरी से थका होने पर, मूत्र-मल कवल और अंजन के पीछे, भोजन करके, वमन करके, दिन में सोकर उठने पर और सार्यकाल प्रतिमर्श नस्य लेना चाहिये ॥११॥
तत्र तत्सोस्थितेनासेवितः प्रतिमर्शो रात्रावुपचितं नासास्त्रोतोगतं मलमुपहन्ति मनःप्रसादं च करोति, प्रक्षालितदन्तेनासेवितो दन्तानां दृढतां वदनसौगन्धं चापादयति, गृह्णात्रिगच्छता सेवितो नासास्त्रोत्तसः किलञ्- तया रजोधूमा वा न बाधते, व्यायाममैथुनाश्चपरिश्रा- न्तेनासेवितः श्रममुपहन्ति, मूत्रोच्चारान्ते सेवितो दृष्टगुरु- त्वमपनयति, कवलाञ्चनान्ते सेवितो दृष्टिं प्रसादयति, मुक्तवता सेवितः स्त्रोतसां विशुद्धिं लघुतां चापादयति, वान्तेनासेवितः स्त्रोतविलङ्गनं इलेश्मणमपोह्य भक्ताका- ङ्क्षामापादयति, दिवास्वप्नोस्थितेनासेवितो निद्राशेषं गुरुत्वं मलं चापोह्य चित्तैकाग्र्यं जनयति, सार्यं चासे- वितः सुखनिद्राप्रबोधं चेति ॥१२॥
इनमें प्रातःकाल विस्तर से उठकर सेवन किया प्रतिमर्श नस्य रात्रि में एकत्रित हुए, नासास्त्रों में आये हुए मल को नष्ट करता है और मन की प्रसन्नता करता है। दाँतों को साफ करके लिया प्रतिमर्श नस्य दाँतों को दृढ़ एवं मुख में सुगन्ध उत्पन्न करता है। घर से बाहर जाते समय सेवन किया प्रतिमर्श नासास्त्रों को किलन्न रखने से धूल या घुएँ का प्रभाव नहीं होने देता। व्यायाम, मैथुन या मुसाफरी से थके हुए होने पर सेवन किया नस्य थकान को मिटाता है। मूत्रमल त्याग के पीछे सेवन किया दृष्टि के भारीपन को दूर करता है। कवल के पीछे लिया दृष्टि को निर्मल करता है। भोजन करके सेवन किया स्त्रोतों की निर्मलता और हल्कापन उत्पन्न करता है। वमन के पीछे सेवन किया प्रतिमर्श नस्य स्त्रोतों में लगे कफ को हटाकर भोजन में रस उत्पन्न करता है। दिन में सोकर उठने पर लिया नस्य निद्राशेष का भारी- पन और मल को दूरकर चित्त की एकाग्रता उत्पन्न करता है। सार्यकाल लिया नस्य सुखपूर्वक नौद और जाग जाता है ॥
ईषदुच्छिन्नतः स्नेहो यावद्भक्त्रं प्रपद्यते।
नस्ये निषिक्तं तं विद्यात् प्रतिमर्शं प्रमाणतः ॥१३॥
नाक में नस्य रूप से डाला स्नेह थोड़ा सा सुड़कने पर जब मुख में आ जाता है, उतना प्रतिमर्श का प्रमाण जाने, उसे प्रतिमर्श की मात्रा समझे।
वक्तव्य—“प्रमाणं प्रतिमर्शस्य विन्दुद्वितयमिष्यते। विन्दुर्वा येन चोक्तस्तेषो नातुरिकिलष्टस्य जायते ॥ निहितो यत्र वा स्नेहो न साक्षादुपलभ्यते ॥” विधान—सप्तवर्षमुपादाय नस्य कर्म चतुर्विधम्। प्रतिमर्शोऽथ वमनं जन्मप्रभृति शस्यते। धूमोऽथ द्वारदेशे वर्षं कवलः पञ्चमे मतः ॥ दोषव्याधिबलाधस्थां वीक्ष्य चैताम् प्रयोजयेत् ॥१३॥
नस्येन रोगाः ग्राम्यन्ति नराणामूर्ध्वजंजुजाः। इन्द्रियाणां च वैमल्यं कुर्यादास्यं सुगन्धिं च ॥१४॥ हनुदन्तशिरप्रोवात्रिकवाहूरसां बलम्। वलोपलितखालिष्यव्यञ्जानां चाप्यसंभवम् ॥१५॥
नस्य से मनुष्य के, जमु से ऊपर के रोग शान्त हो जाते हैं। इन्द्रियों में निर्मलता और मुख में सुगन्धिता होती है। हनु, दन्त, शिर, प्रोवा, त्रिक, बाहु और छाती में बल आता है। वलोपलित, गंजापन, व्यंग भी उत्पन्न नहीं होते ॥१४, १५॥
तैलं कफे सवाते स्यात् केवलं पवने वसाम्। द्व्यासर्पिः सदा पित्ते मज्जानं च समारुते ॥१६॥ चतुर्विधस्य स्नेहस्य विधिरेवं प्रकीर्तितः। इलेश्मस्थानाविरोधित्वात्तेषु तैलं विधीयते ॥१७॥ वायुयुक्त कफ में तैल, शुद्ध वायु में वसा, पित्त में वी और वायुमिश्रित पित्त में मज्जा का नस्य देना चाहिये। चार प्रकार के स्नेह की यह विधि है। कफस्थान का अविरोधि होने से इन चारों में तैल का ही उपयोग होता है।
वि० मन्तव्य—यद्यपि नस्य में चारों प्रकार के स्नेहों का दोषानुसार प्रयोग हो सकता है तथापि शिर कफ का स्थान है और तैल कफ का विरोधी-वर्द्धक-प्रकोपक नहीं है अतः यथासम्भव तैल का ही प्रयोग करना चाहिये ॥१६, १७॥
अतः परं प्रवक्ष्यामि कवलग्रहणे विधिम्। चतुर्धा कवलः स्नेहो प्रसादी शोधिरोपणो ॥१८॥ स्निग्धोष्णैः स्नेहिको वातं, स्वादुशीतैः प्रसादनं। पित्तं, कटुवम्ललवणैः रूक्षोष्णैः शोधनः कफे ॥१९॥ कषायतिक्तमधुरैः कटुष्णैः रोपणो व्रणे। चतुर्विधस्य चंचास्य विरोधोऽयं प्रकीर्तितः ॥२०॥
इसके आगे कवल ग्रहण की विधि को कहूँगा। कवल चार प्रकार का है—स्नेही, प्रसादी, शोधन और रोपण। वायु में स्निग्ध, उष्ण द्रव्यों से स्नेहिक कवल, पित्त में मधुर-शीतल द्रव्यों से प्रसादन कवल, कफ में-कटु, अम्ल, लवण, रूक्ष और उष्ण द्रव्यों से शोधन कवल, व्रण में-कषाय, तिक्त, मधुर, कटु और उष्णद्रव्यों से रोपण कवल बरते। चार प्रकार के कवल में यह मेद कह दिया है।