सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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चिकित्सास्थानम्
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वि० मन्तव्य—रोपण कवल—व्रण के ६० उपक्रमों में कवल धारण भी एक उपक्रम है परन्तु यह मुख के ही व्रणों में प्रयुक्त होता है। मुख के व्रणों के लिये देखिये मुखरोग निदान।
तत्र त्रिकटुकवचासर्पपहरीतकीकल्कमालोड्य तैलजुक्तुरामूत्रक्षारमधुनामन्यतमेन सलक्षणमभिप्रतप्तमुपस्विन्नमुदितमलकपोल्लल्लाटप्रदेशो धारयेत् ॥६१॥
इसमें—त्रिकट, वच, सरसों, हरड इनका कल्क तैल, शुक्त, सुरा, गोमूत्र, क्षार, मधु इनमें से किसी एक में घोलकर, थोड़ा सा नमक मिलाये। गला, कपोल, ललाट भाग पर गरम किये हाथों से सेक करके, इनको मलकर कवल को मुख में धारण करे ॥६१॥
मुखं संचार्यते या तु मात्रा स (सा) कवलः स्मृतः।
असंचार्या तु या मात्रा गण्डूषः स प्रकीर्तितः ॥६२॥
जो मात्रा मुख में मुखपूर्वक एक तरफ से दूसरी तरफ घुमाई जा सकती है, वह कवल कहा है। और जो मात्रा मुख में फेरी न जा सके उसे गण्डूष कहते हैं ॥६२॥
तावच्च धारयितव्योऽन्यमनसोन्मतदेहेन यावदोषप रिपूर्णकपोल्लव्यं नासास्त्रोतोनयनपरिप्लावश्च भवति तदा विमोक्तव्यः, पुनश्चान्यो गृहीतव्य इति ॥६३॥
ये गण्डूष और कवल मुख में, एकाग्रमन से, शरीर को सीधा रखकर तब तक धारण करने चाहिये, जब तक कि गले दोष से न भर जायें, नासा से और आँखों से पानी न आये। फिर छोड़कर दूसरा कवल धारण करना चाहिये ॥६३॥
एवं स्नेहपयःक्षौद्ररसमूत्राम्लसंश्रुताः।
कषायोष्णोदकाभ्यां च कवला दोषतो हिताः ॥६४॥
इस प्रकार स्नेह, दूध, मधु, रस, मूत्र, अम्ल (कांजी) से पूर्ण, कषाय एवं गरम पानी इनके कवल दोष के विचार से बरतने चाहिये। (रस-ईला का रस, अथवा मांस रस) ॥६४॥
व्याघ्रेरपचयस्तुष्टिवैशर्वं वक्रन्तलाघवम्।
इन्द्रियाणां प्रसादश्च कवले शुद्धिलक्षणम् ॥६५॥
हीने जाड्यकफोत्कलेशावरसञ्ज्ञानमेव च।
अतियोगान्मुखे पाकः शोषरुष्णाहचिकलमाः ॥६६॥
शोधनीये विशेषेण भवन्त्येव न संशयः।
रोग का घटना, प्रसन्नता, निर्मलता, मुख में हल्कापन, इन्द्रियों की निर्मलता होना ये कवल में शुद्धि के लक्षण हैं। हीनयोग में—जड़ता, कफ का उत्कलेश, रसज्ञान की अप्रतीति होती है। अतियोग में—मुख में पाक, शोष, प्यास, अरुचि,
कलम होता है। प्रायः करके शोधनीय कवलों में ये लक्षण होते हैं ॥६५,६६॥
तिला नीलोत्पलं सर्पिः शर्करा क्षीरमेव च ॥६७॥
सक्षौद्रो दग्धवक्रत्रस्य गण्डूषो दाहनाशनः।
कवलस्य विधिर्द्योप समासेन प्रकीर्तितः ॥६८॥
तिल, नीलाकमल, घी, शर्करा दूध और मधु इनका कवल जले हुए मुख के दाह को नष्ट करता है। कवल की यह विधि संक्षेप से कह दी है।
वि० मन्तव्य—चूना आदि क्षार द्वारा मुख की श्लैष्मिक कला में क्षत हो जाते हैं उसकी ही यह चिकित्सा है ॥६७,६८॥ विभव्य भेषजं बुद्ध्या कुर्वीत प्रतिसारणम्।
कल्को रसक्रिया क्षौद्रं चूर्ण चैति चतुर्विधम् ॥६९॥
अंगुल्यप्रप्रणीतं तु यथास्वं मुखरोगिणाम्।
औषध का बुद्धिपूर्वक विभाग करके, कल्क, रसक्रिया, क्षौद्र (मधु), और चूर्ण (बल्ल में छना) इन चार रूपों में प्रतिसारण करे। दोषों के अनुसार औषध को इनमें से किसी एक रूप में लेकर अंगुली के अप्रभाग से मुख रोगियों में विसे।
वि० मन्तव्य—प्रतिसारण—मञ्जन-वह द्रव्य जो मुख में लगाया जाय। भगवान् सुश्रुत ने प्रतिसारण ४ प्रकार का माना है परन्तु श्री वाग्भट तथा शाङ्कधराचार्य ने तीन ही प्रकार का माना है यथा—(१) कल्कः (२) रसक्रिया (३) चूर्णः त्रिविधं प्रतिसारणम्। वा० सू० अ० २। और (१) कल्को (२) अवलेहः (३) चूर्णं च त्रिविधं प्रतिसारणम्। शा० उ० खं० अ० १०। भगवान् सुश्रुत ने केवल मधु को भी चौथा प्रतिसारण मान लिया है। सचमुच मधु उत्तम कोटि का प्रतिसारण है, विशेषतः मुखपाक आदि में ॥६९॥
तस्मिन् योगमयोगं च कवलोल्लं विभावयेत् ॥७०॥
तानेव शमयेद् व्याधीन् कवलो यानपोहति।
दोषघ्नमन्मिष्यन्दि भोजयेच्छ तथा नरम् ॥७१॥
इति भगवता श्रीधन्वन्तरिणोपदिष्टायां तच्छिष्येण
महर्षिणा सुश्रुतेन विरचितायां सुश्रुतसंहितायां
चतुर्थं चिकित्सास्थानं समाप्तम् ॥४॥
प्रतिसारण के हीनयोग और अतियोग को कवल की भांति समझना चाहिये। जिन रोगों को कवल अच्छा करता है, प्रतिसारण भी उनको अच्छा करता है। रोगी को दोषनाशक और अनमिष्यन्दि भोजन खाने को देवे ॥७०,७१॥
इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने धूमनस्यकवलग्रह-चिकित्सतं नाम चत्वारिंशोऽध्यायः ॥४०॥