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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

पृष्ठ 614, कुल 872 में से

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पृष्ठ 614

कल्पस्थानम्

प्रथमोऽध्यायः

अथातोऽन्तनपानरक्षाकल्पं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अब इसके आगे अनन्तपान रक्षाकल्प का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था।

वि० मन्तव्य—कल्पस्थान—अगदतन्त्र ही है, देखिये सू० स्था० अ० १ का सू० ७ और उसका विवरण ७।६। और “अष्टौ कल्पाः समाख्याता विषमेषजकल्पनात्” सू० स्था० अ० ३ का श्लो० २८। विष चिकित्सा की कल्पना इस तन्त्र में की गई है अतः इसका नाम कल्पस्थान है। विधि भेद से संसार में दो प्रकार के पदार्थ हैं। १—अमृत-जिनके सेवन से प्राणी “मृत” नहीं होता और प्रसाद-प्रसन्नता का अनुभव करता है और २—विष-जिनसे “मृत” हो जाता है और विषाद का अनुभव करता है ॥१,२॥

धन्वन्तरिः काशिपतिस्तपोधर्मभूतां वरः।

सुश्रुतप्रभृतीच्छिष्याच्छशासाहृतशासनः ॥३॥

तप और धर्म को धारण करनेवालों में श्रेष्ठ एवं जिसकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं हो सकता ऐसे काशिपति दिवोदास ने सुश्रुत आदि शिष्यों को कहा ॥३॥

रिपवो विक्रमाक्रान्ता ये च स्वे कृत्यतां गताः।

सिन्धुक्ष्वः क्रोधविषं विवरं प्राप्य ताहशम् ॥४॥

विषैर्निहन्त्युनिपुणं नृपतिं दुष्टचेतसः।

स्त्रियो वा विविधान् योगान् कदाचित्सुभगेच्छया ॥

विषकन्योपयोगाद्वा क्षणाज्जहादस्मन्तरः।

तस्माद्धौघेन सततं विषाद्रह्यो नराधिपः ॥५॥

विक्रम से जीते हुए शत्रु, और जो अपने लोग शत्रु हो गये हैं, वे लोग अपने क्रोधरूपी जहर को छोड़ने के लिये मौका देहूते रहते हैं। ये दूषित मनवाले व्यक्ति निपुण राजा को विषों से मार देते हैं। अथवा कभी सौभाग्य की इच्छा से स्त्रियाँ नानाप्रकार के योगों को दे देती हैं। अथवा विष कन्या के उपयोग से मनुष्य तुरन्त प्राण खो बैठता है। इसलिये वैद्य को चाहिये कि वह निरन्तर राजा की विष से रक्षा करे।

वक्तव्य—पर्वतेश्वर को चाणक्य ने विषकन्या के उपयोग से मारा था। विषकन्या बनाने के लिये कन्या को वचपन से ही थोड़ा थोड़ा विष देना आरम्भ करते हैं। धीरे धीरे इस विष की मात्रा बढ़ाते जाते हैं। अन्त में यह मात्रा इतनी हो

जाती है, जो कि दूसरे के लिए घातक होती है। यह विष कन्या के सब शरीर में फैल जाता है। सुम्भन या सम्भोग आदि से दूसरे पुरुष में भी आ जाता है। इसी से कहा है, “इति स्मृशन्ति स्वेदेन, गम्यमाना च मैथुने। पक्वं वृत्तादिष फलं प्रघातयति मेहनम् ॥” जू आदि इसके शरीर पर तुरन्त मर जाती है, यह इसकी पहिचान है।

वि० मन्तव्य—विष कन्या—ज्योतिःशास्त्रानुसार वह कन्या भी विषकन्या कही जाती है जिसको ग्रहों के कारण वैषम्य योग होता है। देखिये बृहत्-जातकालङ्कार भुवन दीप अ० १६। उपदंश आदि योनिरोगों से पीड़ित स्त्री भी विषकन्या कही जा सकती है, और ऐसे पुरुष भी विषपुरुष कहे जा सकते हैं। नृपति—नृपति अर्थात् राजा शब्द उपलक्षण है, अन्यजनों नरनारियों पर भी इस प्रकार के प्रयोग किये जाते हैं। जब कभी ऐसा सन्देह हो कि कोई ऐसा प्रयोग करना चाहता है, तब सबको अपनी रक्षा के लिये सावधान रहना चाहिये ॥४-५॥

यस्माच्च चेतोऽनित्यत्वमश्वतत् प्रथितं नृणाम्।

न विश्वस्यात्ततो राजा कदाचिदपि करस्यचित् ॥७॥

क्योंकि मनुष्यों का चित्त छोड़े की भौँति सदा चंचल रहता है, इसलिये राजा को चाहिये कि वह किसी का कभी विश्वास न करे।

वक्तव्य—वैद्य का विश्वास उसे करना चाहिये। इसी से पहले कहा है कि “विस्वज्यत्यमनास्मानम् ॥” गीता में कहा है—“चंचलं हि मनः कृष्ण ! प्रमाथि बलवद्बृहदम्। तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरेव सुदुष्करम् ॥” ॥७॥

कुलीनं धार्मिकं स्तिग्धं सुभूतं संततोत्थितम्।

अलुब्धमशठं भक्तं कृतज्ञं प्रियदर्शनम् ॥८॥

क्रोधपारुष्यमात्सर्यमायालस्यविवर्जितम्।

जितेन्द्रियं क्षमावन्तं शुचिं शीलदयान्वितम् ॥९॥

मेधाविनमसंश्रान्तसंतुरक्तं हितैषिणम्।

पटुं प्रगल्भं निपुणं दक्षं व्यसनवर्जितम् ॥१०॥

पूर्वोक्तैश्च गुणयुक्तं नित्यं सन्नहितगदम्।

महानसे प्रयुञ्जीत वैद्यं तद्विद्यपूजितम् ॥११॥

वैद्य की योग्यता—कुलीन, धार्मिक स्नेह रखनेवाला, धन-साधनों से युक्त, निरन्तर ध्यान देनेवाला, लालच रहित, धूर्त्ता रहित, श्रद्धालु, कृतज्ञ, देखने में सुन्दर, क्रोध-