सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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कल्पस्थानम्
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कठोरता मत्सरता माया और आलस्य से रहित जितेन्द्रिय, क्षमाशील, पवित्रस्वभाव, शील-दया से युक्त, मेधावी, न यकने-वाला, अनुत्क, हितेच्छु, वक्ता, दक्ष-चतुर, निपुण, कुशल, न्यसन रहित, तथा तत्त्वविगत शास्त्र आदि पूर्वांक, गुणयुक्त, सदा अगद ( विपनाशकयोग ) पास में रखनेवाले । वैद्य विद्या को जाननेवालों से पूजित वैद्य को राजा रसोई में रखे ।
वि० मन्तव्य—इस वैद्य को देखरेख में भोजन का निर्माण हो ॥११॥
प्रशस्तदिग्देशकृतं शुचिभाण्डं महत्तुलुचि ।
सजालकं गवाक्षाल्यमात्रवर्गनिषेवितम् ॥१२॥
विकक्षस्तुष्टसंस्तुष्टं सवितानं कृताचंनम् ।
परीक्षितस्त्रीपुरुषं भवेच्छचापि महानसम् ॥१३॥
रसोई कैसी हो ! प्रशस्तदिशा ( आग्नेयकोण ) और प्रशस्तदेश में बनाई हुई, पवित्र वर्चनोवाली, बड़ी, शुद्ध ( साफ सुथरी ), जालीवाली, धुँआ जाने के लिये प्रसुर वातायनों की, विश्वस्त पुरुषों से युक्त, लकड़ी आदि के लिये अलग-अलग भागवाली, छत पर चंदोआ, लगी हुई, अग्निपूजा की हुई, देखे-माले स्त्री पुरुषोंवाली रसोई होनी चाहिये ।
प्रशस्त देश—“हटं निवार्तं प्रवार्तैकदेशं सुखप्रविचार-मनुपत्यकं धूम्रातपजलरजसामनभिमामनीयमनिष्ठानां च शब्द-स्पर्शरूपरसगन्धानां सोदपानोदूखलेमूषल वचः—इत्यादि ॥ चरक ॥१२,१३॥
तत्राध्यक्षं नियुञ्जीत प्रायो वैद्यगुणान्वितम् ।
शुचयो दक्षिणा दक्षता विनोताः प्रियदर्शनाः ॥१४॥
सविभक्ताः सुमनसो नीचकेशनखाः स्थिराः ।
स्नाता हटं संयमिनः कृतोष्णीषाः सुसंयताः ॥१५॥
तस्य चाज्ञाविषेयाः स्युर्विविधाः परिकर्मिणः ।
वहाँ पर रसोई में रसोई का अधिकारी वैद्य गुणों से युक्त मनुष्य को बनाये ।
भुल्य कैसे हों—काम करनेवाले-पवित्र, कुलीन, चतुर, नम्र, देखने में सुन्दर, भिन्न-भिन्न कामों को करनेवाले, निर्मल, शुद्ध मन के, केश और नख कटाये हुये, हृद-मजबूत, स्नान किये, चंचलता रहित, संयमी, सिर की लपेटे, संयत ( कसे हुये टीले-ढाले नहीं ) तथा आज्ञा को माननेवाले होने चाहिये ।
वि० मन्तव्य—अध्यक्ष—यह महानस का अध्यक्ष अर्थात् प्रबन्धक है सब परिकर्मियों-कर्मचारियों का अधिष्ठाता है । इन परिकर्मियों में भोजन की सामग्री जुटानेवाले, काटने-पीसनेवाले, भोजन पकानेवाले तथा परोसनेवाले सब हैं । कभी बड़े-बड़े होटलों में जाकर देखिये । स्थिराः—स्थायी भुल्य जो उसी एक कार्य में जीवन लगा देनेवाले । हटं संयमिनः—कमर कसे—पेटी बाँधे हुए । कृतोष्णीषाः—घिर पर उष्णीष पगड़ी बाँधे
हुए । सुसंयताः—छोलता आदि दोष रहित । रसोई घर में—रसोई बनानेवालों एवं प्रबन्धकों का बही भोजन होता है जो तृप्ति—यदृपति एवं घरवालों का होता है । राजपरिवारों में एवं बड़े घरों में ऐसा ही होता है और होना भी चाहिये । इस दशा में वे कर्मचारी स्वयं अन्नादि में विषमिश्रण नहीं करते यदि करते हैं तो उस अन्न को स्वयं खाने में हिकचके हैं । वैद्य एवं महानसाध्यक्ष को साथ बिठाकर भोजन करना चाहिये ( न अभक्त, अशिष्ट, अशुचि, लुभित परिचरः ) तथा अन्नो का थोड़ा-थोड़ा अंश अग्नि में डालना चाहिये ( न अदस्वा-अग्नेय ) तथा प्रतिकूल-शत्रुता रखनेवालों द्वारा उपस्थित अन्न खाना चाहिये ( न प्रतिकूलोपहितं ) च० सू० अ० ८ ॥१४,१५॥
आहारस्थितयश्चापि भवन्ति प्राणिनो यतः ॥१६॥
तस्मान्महानसे वैद्यः प्रमादरहितो भवेत् ।
क्योंकि मनुष्य का जीवन आहार के आश्रय ही स्थित है, इसलिये वैद्य रसोई में सदा सावधान रहे ॥१६॥
महानसिकवोदारः सौपौदनिकपीपिकाः ॥१७॥
भवेयुर्वैद्यवशगा ये चाप्यन्येऽत्र केचन ।
रसोई में काम करनेवाले, पिडो पीसनेवाले, ढाल-भात-रोटी आदि बनानेवाले, और जो भी रसोई में काम करनेवाले हों वे सब वैद्य के अधीन रहने चाहिये ॥१७॥
इन्द्रितज्ञो मनुष्याणां वाकचेष्टामुखवैकृतैः ॥१८॥
विद्याद्विपश्य दातारमेभिलिङ्गेश्व बुद्धिमान् ।
न ददात्युत्तरं पृष्टो विवक्षन् मोहमेति च ॥१९॥
अपार्थं बहु सङ्कीर्णं भाषते चापि मूढवन् ।
स्फोटयत्यङ्कुलोभूमिमकस्माद्विलिखेद्दुसेत् ॥२०॥
वेपथुर्जायते तस्य त्रस्तश्रान्योऽन्यमोक्षते ।
क्षामो विवर्णवक्त्रश्च नखैः किञ्चिच्छिन्नत्यपि ॥२१॥
आलभेतासङ्कदीनः करेण च शिरोरुहान् ।
निर्णियासुरपद्मैर्वैर्भाक्षते च पुनः पुनः ॥२२॥
वर्तते विपरीतं तु विषदाता विचेतनः ।
विषदाता की पहिचान—मनुष्यों के इशारों को समझनेवाला बुद्धिमान् मनुष्य बाष्पी, चेष्टा, मुख की भावभंगी आदि से विष देनेवाले मनुष्यों को पहचान ले और निम्नलिखित लक्षणों से यथा-विष देनेवाला मनुष्य पृष्ठने पर उत्तर नहीं देता, बोलने की इच्छा करता हुआ भी घबड़ा जाता है । व्यर्थ की बातें बहुत करता है, इधर उधर की मिली जुली बातें करता है, मूर्ख की तरह बात करता है । अंगुलियों को चटकता है, भूमि को कुरेदता है, विना कारण के हँसता है । यह मनुष्य काँपता है, डरकर इधर-उधर या एक दूसरे की ओर देखता है । शरीर से क्रुश, विवर्णमुख ( मुख का रंग पल्टा हुआ ) नखों से कुछ तोड़ता रहता है । बार-बार हाथों से बालों को