सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० १ ]
भूता रहता है। न जाने के मार्गों से भागना चाहता है, बार-बार मुड़कर देखता है। विपरीत चेष्टायें करता है, संसारहित बेमान बन जाता है ॥१८-२२॥
केचिद्भूयात् पार्थिवस्य त्वरिता वा तदाज्ञया ॥२३॥
असतामपि सन्तोऽपि चेष्टां कुर्वन्ति मानवाः ।
तस्मात् परीक्षणं कार्यं भूत्यानामाद्यैर्नृपैः ॥२४॥
कभी कभी राजा के डर से, जल्दी या राजा की आज्ञा से—सज्जन मनुष्य भी असाधु पुरुषों जैसी चेष्टायें कर बैठते हैं। इसलिये इनकी परीक्षा आदर के साथ-साथवानी से करनी चाहिये ॥२३,२४॥
अन्ने पाने दन्तकाष्ठ तथाऽभ्यङ्गैऽवलेखने ।
उत्सादने कषाये च परिषेकेऽनुलेपने ॥२५॥
स्रुतु वक्षेषु शय्यासु कवचाभरणेषु च ।
पादुकापादपीठेषु पृष्ठेषु गजवाजिनाम् ॥२६॥
विषजुष्टेषु चान्येषु नश्यधूमाञ्जनादिषु ।
लक्षणानि प्रबन्ध्यामि चिकित्सांमप्यन्तन्तरम् ॥२७॥
विष देने के साधन—अन्न ( भोजन ), पेयवस्तु, दातुन, अभ्यंग, अवलेखन ( कंधी आदि ), उबटन, स्नान का जल ( कषाय ) परिषेक, चन्दन आदि लेप, माला, वस्त्र, शय्या, कवच, आभूषण, जूता आदि, आसन आदि, हाथी घोड़े की पीठ, विषैले नस्य, धूम, अञ्जन आदि में विष देते हैं। इनके लक्षण कहकर पीछे चिकित्सा को कहेंगे।
वक्तव्य—औरंगजेब ने—जयसिंह के पुत्र को विषैली पोशाक पहनाकर ही मारा था। (डुर्गादास नाटक।) ॥२५-२७॥
नृपभक्ताद्वलि न्यस्तं सविषं भक्षयन्ति ये ।
तत्रैव ते विनश्यन्ति मक्षिकावायसादयः ॥२८॥
हुतमुक्तेन चान्नेन भुञ्ज चटचटायते ।
मयूरकण्ठप्रतिमो जायते चापि दुःसहः ॥२९॥
भिन्नाचिस्तीर्णधूमश्च न चिराच्छोषणाम्यति ।
चकोरस्याक्षिवैराग्यं जायते क्षिप्रमेव तु ॥३०॥
दृष्ट्वाऽत्र विषसंमृद्धं त्रियन्ते जीवजीवकाः ।
कोकिलः स्वरवैकृत्यं कौश्लस्तु मदमुत्छति ॥३१॥
हृष्येन्मयूर उद्भिन्नः क्रोशतः शुक्सारिके ।
हंसः द्वेष्टति चात्यर्थं भुङ्क्त्राजस्तु कूजति ॥३२॥
पृषतो विस्मृत्यशु विष्टां मुञ्चति मर्कटः ।
सन्निकृष्टस्ततः कुर्याद्वाह्नस्तान् भुगपक्षिणः ॥३३॥
वेदमनोऽथ विभूषार्थं रक्षार्थं चात्मनः सदा ।
राजा के विषैले भोजन में से दी हुई बलि को मक्खी कौवे आदि जो खाते हैं, वे वही मर जाते हैं। विषैले अन्न से अग्नि में चट-चट शब्द बहुत होता है। आग का रंग मोर की गर्दन
के समान हो जाता है, इसका तेज असह्य होता है। ज्वाला फटी हुई अलग-अलग, धूम में तीक्ष्णता रहती है, जल्दी बुझ जाती है। विषैले अन्न से चकोर की आँख की लाली तुरन्त जाती रहती है। विषैले अन्न को देखकर जीव-जीवक तुरन्त मर जाता है। कौयल का स्वर बदल जाता है, कौख को मक्खी चढ़ जाता है। मोर हृष्ट एवं उद्विग्न होता है, तोता और मैना चिल्लाते हैं। हंस जोर से शब्द करता है, भुंगराज कूजता है। पृषत ( चित्तल हरिण ) आँसू बहाता है, बन्दर का मल निकल आता है। इसलिये राजा पशु पक्षियों को घर में पाले। इनसे घर की शोभा होने के साथ साथ अपनी भी सदा रक्षा होती है।
वक्तव्य—प्रत्येक धातु की ज्वाला का रंग भिन्न-भिन्न होता है। इसलिये आधुनिक रसायनशास्त्रों में कुछ धातुओं को हम अग्नि की परीक्षा से भी पहचान लेते हैं।
पक्षियों को घर में पालने का वर्णन मृच्छकटिक में दिया है। यथा—
“आश्रयं भोः इहापि सप्तमे प्रकोष्ठे सुरिलष्टविहंगवादीः सुखनिषण्णान्योन्यचुम्बनपरणि सुखमनुभवन्ति पारावतमिश्रुनानि । दधिभक्तपूरितोदरो ब्राह्मण इव सूक्तं पठति पञ्जरयुक्तः । इयमपरा संमाननालब्धप्रसरैव गृहदासी अधिकं कुरुराश्वेतं मदनसारिका । अनेकफलरसास्वादग्रहकण्ठा कुम्भदासीव कूजति परपुष्टा । अलम्बिता नागदन्तेषु पंजरपरम्परा । योध्यन्ते लावकाः । आलाप्यन्ते कपिञ्जलाः । प्रेष्यन्ते पञ्जरकपोताः । इतस्ततो विविधमणिचित्रित इवार्थं सहर्षं नृत्यन्विकिरण संततं पक्षोत्पैः विधुवतीव प्रासादं गृहमयूरः । इतः पिण्डीकृता इव चन्द्रपादाः पदगतिशिक्षमाणानीव कामिनीनां पश्चात्परिभ्रमन्ति राजहंसमिश्रुनानि । एतेऽपरे वृद्धमहत्तकाः इव इतस्ततः संवरन्ति गृहं सारसाः । आश्रयं भोः, प्रसारणं कृतं गणिक्या नानापक्षिसमूहैः । यत्सत्यं नन्दनवनमिव मे गृहं प्रतिभासते ॥”
मेघदूत में कालिदास ने मेघ को रात में आराम लेने के लिये जो घर बताया है—उसके लिये कहा है—“तां कस्यांश्चिद् भवनवलभो सुतपारावतायाम्। नीत्वा रान्नि चिरविलसनात् खिन्नविच्युत्कलत्रः ॥” बाण ने अपने घर का वर्णन करते हुए—तोतों द्वारा अशुद्ध पाठ करते हुए विचारियों को टोकने का वर्णन किया है यथा—जगुणु हे यस्य समस्तवाङ्मयेः सांवारिकैः पञ्जरवर्त्तिभिः शुकेः । निगृह्यमाणः बटवः पदे पदे यजुषि सामानि च यस्य शङ्किताः ॥ यूनानी लोगों की मान्यता है कि जिस घर में कबूतर पाले जाते हैं, वहाँ पर क्षत आदि रोग नहीं होते। पक्षाघातवाले रोगियों को ये लोग परो की बाँध दिखाते हैं ॥१८-३३॥
उपक्षिप्तस्य चात्रस्य बाष्पेणोर्ध्वं प्रसपता ॥३४॥