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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सोमवल्लथमता श्वेता पद्मं कालीयकं त्वचम्‌ ।

कपित्थरसमूत्राभ्यां पानमेत्तस्च युज्यते ॥५४॥

विषा अभ्यंग--पिच्छिक, गाढा, विवणं हो जाता है |

इसके रगाने से कारे उप्यन्न हो जपते हँ, पौढ़ा; खव,

का पकना, पसीना, ज्वर ओर त्वचा का फटना होता है । इसे

रीतल जल से स्नान कराके चन्दन, तगर, कूठ, खस, बांस

के पत्ते, गिलोय-अमृता, अपराजिता (कोय), कारीयक कष्ठ;

दाल्चीनी इनको कैथ के रख ओर गोमूत्र के साथ शरीर पर रेप करे ओर इसको पीये । (अमृता-दरड़, उल्दण ने अमतासंग

क भ लेकर तत्थ छिया है । श्वेत

श्वेतवच के ल्थि भी दै) ॥५१-५४॥ _ उत्सादने परीषेके कषाये चालुलेपने सय्यावख तनुत्रेषु ज्ञयसभ्यज्गलक्षणेः ॥५५।।

उत्सादन, परिषेक, कषाय, अनुखेपन, शय्या, वख ओर

कवचोँ मे विष का योग होने पर अभ्यंग के खमान लक्षण ओर

चिकित्सा है ॥॥५५॥ केशातः शिरोदुःखं खेभ्यश्च रुधिरागमः। ्रन्िजन्मोत्तमाखेषु विषलुऽबटेखने ।५६॥।

प्रलेपो बहुशस्तत्र भाविताः कृष्णसृत्तिकाः।

ऋष्यपित्तघृतश्यामापाछिन्दीवण्ड्लीयकेः ॥५७॥।

गोमयस्वरसो बाऽपिं हितो वा मारूतीरसः ।

रसो मूषिकपण्यो वा धूमो वाऽगारसंभवः ॥१८

कधी आदि के विष से यृक्त होने पर बालों का गिरना,

शिर मे पीड़ा, रोमकूपोंसे स्तं का आना, शिर मे गांठे

(फखिया) उन्न हो जाती है । इसमे काटी भिद को च्ृष्य

(स या नीलण्ड मृग) के पित्त, घत श्यामा (त्रिवगु), निशोय, तण्डुटीयक (चराई) इनसे कई बार भावित करके लगाये, गोबर

का स्वरस या चमेखी का रस शिर पर ब्रते, मूर्षिकपर्णी का रस

या धर धवासा वरते ॥५६-५८॥ जिरोऽभ्यङ्गः शिरखाणं स्नानसुष्णीषमेव च ।

सखजश्च विषसंसष्टाः साधयेदवङेखनात्‌ ॥५९॥

शिर का अभ्यंग (तेक आदि), शिरल्लाण (लोहे का टोप)

स्नान का जल, पगड़ी मालाययं-इनके विष. से युक्त होने पर

कधी के समान लक्षण एवं चिकित्सा खमे ॥५६॥ ` सुखारेपे सुखं श्यालं युक्तमभ्यङ्ग लक्षणः । पदूमिनीकण्टकप्रख्यैः कण्टकेश्योपचीयते ॥६०॥

तन्न क्षो द्रत पानं घरटेपन्दनं घृतम्‌ 1 पयस्या मधुकं फञ्जी बन्धुजीवः पुननेवा ॥६१॥ सुख के आलेप के विष से युक्त होने पर मुख ॒श्याववणं, विषेरे अभ्यंग के समान क्षणोवाला शो जाता है | पद्चिनी कण्टक के खमान काटो (फुन्विरयो) से भर जाता दै । इसमें |

सुश्चतसं षिता

से श्वेतस्यन्द दिया है । श्वेता-

| | अ०२। मधुषृत का पानी, चन्दन-घी विदारी, सुरहटी, भागौ दप

< 9 हिया । पुननवा इनका टेप करे ॥६०,६१॥।

अस्वास्थ्यं कुञ्ञरादीनां काछास्रायोऽक्िरक्तता। स्फिपायुमेदस॒ष्केषु यातुश्च स्फोटसंभवः ॥६२॥|

ततच्राभ्यज्गवदेवेषटठा यातृषाहनयोः क्रिया । |

हाथी, घोडे आदि की पीठ पर विष लगाने से हाथी आदि

रोगी हो जाते है, सुख से काला गिरती है, ओँखें लाल हो जाती '

ह । बेठनेवटे के नितम्ब, गुदा, मेहन ओर मुष्क प्र छे

उत्पन्न हो जाते हँ । इसमे अभ्यंग के समान चिकित्खा मनुष

ओर वाहन कौ करे ॥६२॥

शोणितागमनं खेभ्यः शिरोरुकपसं खवः ॥६३।। नस्यधमगते छिङ्गमिन्द्रियाणां च वेकृतम्‌ । |

तत्र दुग्धेगंवादीनां सर्पिः सातिविषेः.तम्‌ ॥६४॥ ` पाने नस्ये च सरवेतं हितं समद यन्तिकम्‌ | |

नस्य ओर धूम मे विष होने से-नाक से रक्त आताईै, |

खिरमें दद्‌, कफ का खाव ओर इन्द्रियां विक्त हो जातीहै।

इसमे गाय आदि के दृध से, अति विष के कल्क ` दवारा दिद । करिया घुत पीने मँ ओर नस्य मे बरते। कटभी (श्वेत वच, ।

ल्हण के मत से) ओर मेंहदी के कल्क से सिद्ध धृत उत्तम,

है । कोर अती, मेहदी शवेतवच (या कोयल) तीनों का क्ल |

बरतते है ।|६२,६४॥ . | | गन्धहानिर्विवणव्वं पुष्पाणां स्छानता भवेत्‌ ॥६५॥ |

जिध्रातश्च शिरोदुःखं बारिपूणं च खोचने । यत्र वाष्पेरितं कमं मुखारेपे च यत्‌ स्मृतम्‌ ॥६६॥

विषेले पुष्पों मे गन्ध का नष्ट होना, विवणता, सुरक्षाना

होता दै । संधनेवाले के शिर में पीड़ा ओर आंखों मे आष |

जाते हँ । इसमे विषेढे वाष्पं की मति एवं सुखल्पि † । भांति चिकित्सा करे ॥६५.६६॥

कणतैकगते श्रोत्र वैगुण्यं शोरूवेदने । कणंखावश्च तत्रानु कैभ्यं प्रतिपूरणम्‌ ॥६५॥ स्वरसो बहपुत्रायाः सघृतः क्षौ द्रसंयुतः। सोमवल्करसश्चापि सघशीतो हित इष्यते ॥६८॥

कान के तै के विवैला होने पर-छुनाई न देना, ध

वेदना, कर्णलाव होता ६ । इसमें ठरन्त ही.शतावरी का ख, ।

घी, मधु मिलाकर डले । कट्फल का -शीतल रख भी उत्तम

असनपदेदो दाहश्च वेदना दृष्टिविभ्रमः । . `

अञ्जने विंषसंसुष्टे मवेद्‌ान्ध्यमथामि च ॥६९।

तत्र सयो घृतं पेयं तपेणं च ससागघम्‌ । `

अञ्जनं मेषश्वङ्गस्य नियौसो वरुणस्य च ॥५०॥

` सुष्ककस्याजकणेस्य फेनो गोपित्तसंयुतः 1 क पित्थमेषश्वङ्गयोऽच पुष्पं भल्खातकस्य बा । ए एकैकं कारयेत्‌ पुष्यं बन्धकाद्कोठयोस्प । ==

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