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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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पृष्ठ 619

अं २ ]

कल्पस्थानम्

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विषैले अंजन से आँसू, गीध का आना, जलन, वेदना, दृष्टिभ्रम और अन्वापन भी हो जाता है। इसमें तुरन्त घृत का पान करे। पिप्पली से मिला तर्पण पिये। मेघशृंगी का या वरण के गौद का अंजन करे। मुक्कक, अजकर्ण (साल), समुद्रफेन, इनको गाय के पित्त में मिलाकर अंजन करे। कैथ, मेघशृङ्गी या मिलावे के फूल अथवा दुपहरिया, अंकौठ इनके फूल इनमें से किसी एक से अंजन करे।

वक्तव्य—पिप्पली कल्क से सिद्ध घृत का तर्पण पीये। अथवा तर्पण—अक्षितर्पण करे घृत से आंख का तर्पण ॥

शोकः स्नायस्तथा स्वापः पादयोः स्फोटजन्म च ॥७२॥

भवन्ति विषजुष्टाभ्यां पादुकाभ्याससंशयम् ।

उपानत्पादपीठानि पादुकावत् प्रसाधयेत् ॥७३॥

विषैले जूते—खड़ाऊँ आदि से—पाँव में सूजन, स्नाय, पाँवों का सोना, छाले उत्पन्न होना, होता है। जूते, आसन के लक्षण चिकित्सा पादुका की भाँति है ॥७२,७३॥

भूषणानि हताचर्चि पि न विभान्ति यथा पुरा ।

स्वानि स्थानानि हन्युश्च दाहपाकावदारणेः ॥७४॥

पादुकाभूषणेषु कृमभ्यङ्गविधिमाचरेत् ।

विष के कारण आभूषण तेज रहित हो जाते हैं, पहले की भाँति नहीं चमकते। जिस स्थान पर धारण किये जाते हैं, वहाँ पर जलन, पकना, अवदारण—उत्पन्न कर देते हैं। पादुका और आभूषणों में अभ्यंग विधि बरते ॥७४॥

विषोपसर्गो वाषपादिभूषणान्तो य ईरितः ॥७५॥

समीच्योपद्रवास्तस्य विदधीत चिकित्सितम् ।

महासुगन्धिभगवद् यं प्रवद्याभि तं विषक् ॥७६॥

पानालेपनस्तस्येषु विदधीताञ्जनेषु च ।

विरेचनानि तीक्ष्णानि कुर्यात् प्रच्छद्वानानि च ॥७७॥

सिराश्च व्यधयेत् क्षिप्रं प्राप्तं विघ्नावर्णं यदि ।

मूषिकाञ्जरुहा वाऽपि हस्ते बद्धा तु भूपतेः ॥७८॥

करोति तिर्बिषं सर्वमन्नं विषसमायुतम् ।

बाष्प से आरम्भ करके भूषण पर्यन्त यह जो विष के उपद्रव कहे हैं, इन उपद्रवों को देखकर इनकी चिकित्सा करे। महासुगन्धि अगद जिसे कहूँगा उसे वैद्य पान, आलेपन, नस्व और अंजन आदि में बरते। तीक्ष्ण वमन और विरेचन देवे। यदि योग्य हो तो सिरावैद्य करके तुरन्त रक्तमोक्षण करे। राजा के हाथ में बांधी मूषिका, अजरुहा औषधि, विषैले सब अन्न की विषरहित बना देती है ॥७५-७८॥

हृदयावरणं नित्यं कुर्याच्च मित्रसम्भगः ॥७९॥

पिबेदघृतसजेयाख्यममृताख्यं च बुद्धिमान् ।

सपिदैषि पयः क्षौद्रं पिबेद्वा जीतलं जलम् ॥८०॥

मयूरानन्दकुलान् गोधाः पृषतान् हरिणानपि ।

सततं भक्षयेद्यापि रसास्तेषां पिबेदपि ॥८१॥

बुद्धिमान् नृपति मित्रों के बीच में बैठो दुधा हृदय की सदा रक्षा करे। अजेय मृत, अमृत घृत को पीये। घी, दधि, दूध, मधु या शीतल जल पीये। मोर, नेवला, गोहूँ, चित्तल हरिण या हिरणों को निरन्तर खाये इनके मांसरसों को पीये ॥

वक्तव्य—हृदयावरण—“सूक्ष्मताप्रजरजस्तस्मै सखौद्रं हृदयविशोधनम् । शुद्धे हृदि ततः शार्णं हेमचूर्णस्य दापयेत् ॥ हेमसर्वविषाण्वाशु गराश्च विनियच्छति । हेमपस्व सञ्जत्यगे न हि पबोऽस्त्रुवद् विषम्” ॥७९-८१॥

गोधानकुलमांसेषु हरिणस्य च बुद्धिमान् ।

दद्यात् सुपिष्टं पालिन्दीं मधुकं शर्करां तथा ॥८२॥

शर्करातिविषे देये मायुरे समहौषधे ।

पार्णते चापि देयाः स्युः पिप्पल्यः समहौषधाः ॥८३॥

सखौद्रः सघृतश्चैव शिश्वीयुषो हितः सदा ।

विषघ्नादि च सेवेत् भद्र्यभोज्यानि बुद्धिमान् ॥८४॥

गोहूँ, नेवला और हरिण के मांसों में, विवृत, मुलेहटी, शर्करा को बारीक पीसकर देवे। मोर के मांस शर्करा, अतीस और सौठ दे। पृषत (चित्तल) के मांस में पिप्पली और सौठ देवे। घी और मधु के साथ शिश्वी (सेम की फली) का यूप सदा देना चाहिये। बुद्धिमान् मनुष्य विषघ्न द्रव्यों के साथ भद्र्य और भोजनों का सेवन करे ॥८२-८४॥

पिप्पलीमधुकक्षौद्राक्षरैरुत्साम्बुभिः ।

छद्वयेदगुप्तहृदयो भक्षितं यदि वै विषम् ॥८५॥

यदि रोगी ने विषपान किया हो तो विषघ्न वस्तुओं से हृदय को ढांपकर, पिप्पली, मुलेहटी, मधु, शर्करा, ईल का रस, जल, इनसे वमन करे ॥८५॥

इति सुश्रुतसंहितायां कल्पस्थानेऽवपानरक्षाकल्पे

नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

द्वितीयोऽध्यायः

अथातः स्थावरविषविज्ञानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अब इसके आगे स्थावरविषविज्ञानीय अध्याय का व्याख्यान करेंगे, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था।

वि० मन्तव्य—स्थावर विष—जो वृक्ष, ज्वा आदि स्थावरों से प्राप्त होती—उन्में उत्पन्न होती है। जङ्गम विष जो जङ्गमों—सर्प आदि प्राणियों में पाई जाती है, उत्पन्न होती है ॥१,२॥

स्थावरं जङ्गमं चैव द्विविधं विषमुच्यते ।

दशाधिष्ठानमाद्यं तु द्वितीयं षोडशाश्रयम् ॥३॥

१. 'आदौ हृदयं रस्यं' तस्यावरणं पिबेद्यथालाभम् । मज्जानं मधुघृतगैरिकमथगोमयसं वा । इक्षुसुपक्वमथवा काकं निष्पीड्य तदसं बलम् । छागादीनां वाग्भस्ममृदं वा पिबेदाशु ॥ चरक