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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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पृष्ठ 620

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मुश्रुतसंहिता

[ अ० २ ]

स्थावर और जंगम भेद से विष दो प्रकार का है। इसमें स्थावर विष के दस आश्रय स्थान हैं, और जंगम के अधिष्ठान सोलह हैं।

वक्तव्य—“कृत्रिम विष भी मानते हैं, यथा—दंष्ट्राविषे मूलविषे सगरे कृत्रिमे विषे।” संयोगं द्विविधं पौष्कं तृतीयं विषमुच्यते। गरं स्यादविषं तत्र सविषं कृत्रिमं मतम्।” निर्विष द्रव्यों से बना गरविष, यथा मधु और घृत समान मात्रा में। सविष द्रव्यों से बना कृत्रिमविष, यथा दालचिकना ॥३॥

मूलं पत्रं फलं पुष्पं त्वक् क्षीरं सार एव च।

नियॉसो धातवश्चैव कन्दश्च दशमः स्मृतः ॥४॥

मूल, पत्र, फल, पुष्प, छाल, दूध, सार, गोंद, घातु, और कन्द ये दस स्थावर विष के अधिष्ठान हैं ॥४॥

तत्र क्लीतकाश्चसारगुच्छासुगन्धगर्गरकघाटविघुच्छिखाविजयानीत्यष्टौ मूलविषाणि; विषपत्रिकालम्बावरदाश्रकरम्भमहाकरम्भाणि पञ्च पत्रविषाणि; कुमुद्वती-वेणुकाकरम्भमहाकरम्भककॉटकरेणुकखद्योतकचर्मरीभ-गन्धासर्पधातिनन्दनसारपाकानीति द्वादशफलविषाणि, वेत्रकादम्बवल्लीजकरम्भमहाकरम्भाणि पञ्च पुष्पविषाणि, अन्त्रपाचककर्तरीयसौरीयककरघाटकरम्भनन्दननाराचकानि सप्त त्वकसारनिर्यासविषाणि, कुमुद्वन्नीस्तुहीजालक्षीरीणि त्रीणि क्षीरविषाणि, फेनाश्रम (भस्म) हरितालं च द्वे धातुविषे, कालकूटवत्सनाभसर्षपपालककर्दमकवैराटकमुस्तकशृङ्गीविषप्रपुण्डरीकमूलकहालाहल-महाविषकर्कटकानीति त्रयोदश कन्दविषाणि, इत्येवं पञ्चपञ्चाशत् स्थावरविषाणि भवन्ति ॥४॥

इनमें—क्लीतक, कनेर, गुंजा, सुगन्ध, गर्गरक, करघाट, विघुच्छिखा, विजया ये आठ मूल विष हैं। विषपत्रिका, लम्बा, वरदाक, करम्भ और महाकरम्भ ये पांच पत्र विष हैं। कुमुद्वती, वेणुका, करम्भ, महाकरम्भ, कर्कटक, रेणुक, खद्योतक, चर्मरी, इभगन्धा, सर्पधाती, नन्दन, सारपाक ये बारह फलविष हैं। वेत्र, कादम्ब, वाल्लीज, करम्भ और महाकरम्भ ये पांच पुष्प विष हैं। अन्त्रपाचक, कर्तरी, सौरीयक, करघाट, करम्भ, नन्दन, नाराचक ये सात त्वकसार और नियॉस विष हैं। कुमुद्वन्नी, स्तुही, जालक्षीरी ये तीन क्षीर विष हैं। फेनाश्रम (भस्म) और हरताल ये दो धातुविष हैं। कालकूट, वत्सनाभ, सर्षप, पालक, कर्दमक, वैराटक, मुस्ताक, शृङ्गीविष, प्रपुण्डरीक, मूलक, हालाहल, महाविष, कर्कटक ये तेरह कन्द विष हैं। इस प्रकार से पचपन स्थावरविष हैं। (फेनाश्रम से कोई संखिया मानते हैं)।

वि० मन्त्रव्य—इन सब विषों में केवल वत्सनाभ (वच्छनाग), शिक्कि (सिंगिया), हरिताल नामक विषों को चिकित्सक समाज जानता है और औषधों में प्रयुक्त करता है।

क्लीतक-मुलेठी, विजया-भांग, कनेर, गुंजा, स्तुही-सेहुण्ड का दूध भी परिचित पदार्थ हैं। शेष विषों को वनवासी मले ही जानते हैं। मुलेठी-वामक है, सेहुण्ड का दूध विरेचक है इस प्रकार ये तत्काल बाहर निकल जाते हैं। भांग भी वामक है ॥

चत्वारि वत्सनाभानि मुस्तके द्वे प्रकीर्तिते।

षट् चैव सर्षपाण्यह्युः शेषाण्येकैकमेव तु ॥६॥

अवान्तरभेद—वत्सनाभ के चार, मुस्तक के दो, सर्षप के छे अवान्तर भेद हैं और सब एक एक हैं ॥६॥

उद्देश्यं मूलविषैः प्रलापो मोह एव च।

जम्भाङ्गुद्देश्यश्चासा ज्ञेयाः पत्रविषेण तु ॥७॥

मुण्डशोकः फलविषैर्दहोऽन्तद्वेष एव च।

भवेत् पुष्पविषैश्छिदिराधमानं मोह एव च ॥८॥

त्वकसारनिर्यासविषैरप्युत्कृभं वन्ति हि।

आस्थ्यदीगन्ध्यपारुष्यशिरोरुक्कफसंखवा ॥९॥

फेनागमः क्षीरविषैर्विड्भेदो गुरुजिह्वता।

हृत्पीडनं धातुविषैर्मुच्छ्रीं दाहश्च तातुनि ॥१०॥

प्रायेण कालघातीनि विषाण्येतानि निर्दिशेत्।

मूलविष से ऐंठन, प्रलाप और मूच्छ्रीं होती है। पत्रविष

से जम्भाई, अङ्गु में ऐंठन, श्वास होता है। फलविष से मुण्ड में शोक, दाह और अन्न में द्वेष रहता है। पुष्पविष से व्रमन, आध्मान और मोह (मूच्छ्रीं) होती है। त्वक, सार, नियॉस इन विषों के सेवन से मुख में दुर्गन्धि, कठोरता, शिर में दर्द, कफ का खाव होता है। दूध विष से क्षाग आना, अतीसार और जिह्वा में भारीपन होता है। धातुविष से हृदय में पीड़ा, मूच्छ्रीं तातु में दाह होता है। प्रायः ये विष दिन, पन्द्रह दिन, मास आदि समय में मारते हैं ॥७-१०॥

कन्दजानि तु तीक्ष्णानि तेषां वद्ययामि विस्तरम् ॥११॥

स्पर्शाज्ञानं कालकूटे वेपथुः स्तम्भ एव च।

श्रीवास्तम्भो वत्सनाभे पातविषमूत्रनेत्रता ॥१२॥

सर्षपे वातवैगुण्यमानाहो प्रन्थिजन्म च।

श्रीवादौर्बल्यवाक्सङ्गौ पालकेऽनुमताविह ॥१३॥

प्रसेकः कर्दमाख्येन विड्भेदो नेत्रपीतता।

वैराटकेनाङ्गुदुःखं शिरोरोगश्च जायते ॥१४॥

गात्रस्तम्भो वेपथुश्च जायते मुस्तकेन तु।

शृङ्गीविषेणाङ्गुसदादाहोदरविघ्नद्वयः ॥१५॥

पुण्डरीकेण रक्तत्वमदणोर्बुद्धिस्तथोदरे।

वैवर्ण्यं मूलकैश्चूर्दिहिककाशोफप्रभृदताः ॥१६॥

चिरेणोच्छृङ्गिसिति श्यावो नरो हालाहलेन वै।

महाविषेण हृदये प्रन्थिमूलोदुग्गमो भ्रशम् ॥१७॥

टेनोत्पत्तककर्त्तृध्वं हसन् दन्तान् दशत्यपि।

कन्दविष तीक्ष्णं विष होते हैं उनको विस्तर से कहूँगा,

यथा—कालकूट से स्पर्श का अज्ञान, कम्पन और जह्रता होती है। वत्सनाभ से श्रीवास्तम्भ, मल-मूत्र और आँख में पीड़ापन, सर्षपविष से वायु की विपरीतता, आनाह और गाठों की उत्पत्ति होती है। पालक से—श्रीवा की दुर्बलता, वाष्पी का अवरोध