सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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कल्पस्थानम्
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होता है। कर्दम से-मुख से पानी आना, अतीसार, आँखों में पीलापन होता है। वैराटक से अङ्गों का दुखना और थिरोरोग होता है। मुस्तक से शरीर में स्तम्भ, कम्पन, शृङ्गीविष से—अङ्गों में शिथिलता, दाह, उदर में बुद्धि। पुण्डरीक से आँखों में मुखी, उदर में बुद्धि। मूलक से विवर्णता, वमन, हिकका, शोक, मूहवृत्त, हालाहल से-देर में श्वास आता है, मनुष्य का रंग काला पड़ जाता है। महाविष से हृदय में ग्रन्थि और महान् शूल होता है। कर्कटक विष में मनुष्य ऊपर को कूदता है। ईचता हुआ दन्तों को काटता है ॥११-१८॥
कन्दजान्युप्रवीर्षाणि प्रत्युक्तानि त्रयोदश ॥१८॥
सर्वाणि कुशलेञ्जयान्येतानि दशभिर्गुणेः।
उग्रवीर्यवाले तेरह कन्द विष जो कहे हैं, इन सबको निम्न दश गुणों से कुशल मनुष्यों द्वारा पहचानना चाहिये ॥१८॥ रुक्षमुष्णं तथा तीक्ष्णं सूक्ष्ममाशुव्याधि च ॥१९॥ विकाशि विशदं चैव लघ्वपाकि च तत् स्थूतम्। तद्रौच्यात् कोपयेद्रायुमौष्यात् पित्तं सशोणितम्। मति च मोहयेत्तेन्दयान्मर्मवन्धान् छिन्नति च।
शरीरावयवान् सौक्ष्म्यान् प्रविशेद्विकरोति च ॥२०॥
आशुत्वादाशु तद्वन्ति न्यवयात् प्रकृति भजेत्।
क्षपयेच्छ विकसित्वाद्योपान्धात्तूनमलानि ॥२१॥
वैजघादतिरिच्येत दुष्टिकित्यं च लाघवात्।
दुर्हर्षं चाविपाक्तिवात्तस्मात् कलेशयते चिरम् ॥२३॥
विष के दस गुण—विष रूक्ष, उष्ण, तीक्ष्ण, सूक्ष्म, आशु, न्यवारी, विकारी, विशद, लघु और अपाकी है। रूक्ष होने से विष वायु को, उष्ण होने से रक्त के साथ पित्त को कुपित करता है। तीक्ष्ण होने से बुद्धि को मोहित करता है एवं मर्म वन्धनों को काट देता है। सूक्ष्म होने से शरीरावयवों में प्रवेश करके विकार उत्पन्न करता है। आशु होने से शीघ्र मारता है, न्यवारी होने से सम्पूर्ण शरीर में फैल जाता है। विकारी होने से दोष, घातु और मलों को नष्ट करता है। विशद होने से कहीं पर भी चिपकता (रकता) नहीं। लघु होने से दुष्टिकित्य है। अविपाकी होने से कठिनाई से निकाला जाता है, इसलिये देर तक मनुष्य को दुःख होता है।
वक्तव्य—लघुरूक्षमाशुविशदं न्यवारी तीक्ष्णं विकारी सूक्ष्मं च। उष्णमनिर्दंश्यसं दशगुणमुक्तं विषं तज्जः ॥ विष और मद्य के गुण समान हैं। आगे और गाय के दूध के गुण समान हैं। इसलिये जहाँ विष ओज को नष्ट करता है। वहाँ गाय का दूध ओज का बढ़ाता है, क्योंकि विष और ओज के गुण परस्पर विपरीत हैं। यथा—“गुरुशीतं मृदुरल्फणं बहलं मधुरं स्थिरम्। प्रसन्नं पिच्छिलं स्निग्धमोजो दशगुणं स्मृतम् ॥ गाय का दूध—स्वादुशीतं मृदुस्निग्धं बह-ल्फण्यपिच्छिलम्। गुरुमन्दं प्रसन्नं च गन्धं दशगुणं पयः ॥
तदेवं गुणमेवोजः सामान्यादभिवर्धयेत् ॥ मद्य के गुण—लघूष्ण-तीक्ष्णसूक्ष्ममलव्यवायुशुगमेव च। रूक्षं विकाशि विशदं मद्यं दशगुणं स्मृतम् ॥ विषस्थ ये गुणा दद्याः सन्निपातप्रकोपणाः। त एव मद्ये दृश्यन्ते विषे तु बलवत्तराः ॥ इत्याशु हि विषं किञ्चिद् किञ्चिद्वीरोगाय कल्पते। यथा विषं तथैवान्त्यो ज्येष्ठो मयकृतो गदः ॥ चरक चि० अ० २४ ॥१९-२३॥
स्थायरं जङ्गमं यच्च कुत्रिमं चापि यद्विषम्।
सद्यो व्यापादयेत्तत् ज्ञेयं दशगुणान्वितम् ॥२४॥
यत् स्थावरं जङ्गमकुत्रिमं वा
देहादशेषं यदनिर्गतं तत्।
जीर्णं विषञ्चोपधिभिर्हतं वा
दावानितवातातपशोषितं वा ॥२५॥
स्वभावतो वा गुणविप्रहीनं
विषं हि दूषीविषतामुपैति।
वीर्याल्पभावान्न निपातयेत्तत्
कफावृतं वषगणानुबन्धि ॥२६॥
स्थायर, जंगम या कुत्रिम जो भी विष तुरन्त आदमी को मार देता है, उसको दशगुणोंवाला जानना चाहिये। स्थावर, जंगम, या कुत्रिम जो कि शरीर से सम्पूर्ण रूप में बाहर नहीं निकलता, अपितु पचकर या विषन्न औषधियों से नष्ट होकर, अथवा दावानल, वायु, धूप से सूख जाने के कारण, या अपने स्वभाव से ही गुणों में कुछ कम गुण का हो जाता है, उस विष की दूषीविष संज्ञा हो जाती है। यह दूषीविष वीर्य (शक्ति) के कम होने से मनुष्य को जान से नहीं मारता, अपितु कफ से आवृत होने से बहुत वर्षों तक बना रहता है। (इसी तरह के विष को slow poison कहते हैं) ॥२४-२६॥
तेनादितो भिन्नपुरोषवणो
विगन्धवैरस्यमुखः पिपासी।
मूर्च्छन् वमन् गद्गदवाग्विषण्णो
भवेच्च दूष्योदरलिङ्गजुष्टः ॥२७॥
आमाशयस्थे कफवातरोगो
पक्वाशयस्थेऽनिलपित्तरोगो।
भवेन्नरो ध्वस्तशिरोरुहाङ्गो
विलूणपक्षस्तु यथा विहङ्गः ॥२८॥
स्थितं रसादिष्वयथा यथोक्तान्
करोति घातुप्रभवान् विकारान्।
कोपं च शीतानिलदुर्दिनेषु
यात्याशु, पूर्वं शृणु तत्र रूपम् ॥२९॥
दूषीविष से पीड़ित मनुष्य को अतोषार रहता है, रंग बदल जाता है। मुख में दुर्गन्धि एवं विरसता, प्यास रहती है। मूर्च्छा होती है, वमन होता है, आवाज असष्ट हो जाती