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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ ३० ]

है। उदास रहता है, दूष्योदर के लक्षणों से पीड़ित रहता है। दूषीविष आमाशय में हो तो कफवात के लक्षण रहते हैं, पक्वाशय में होने से वायु-पित्त के लक्षण होते हैं। रोगी के शिर के बाल, शरीर के रोम झड़ जाते हैं, पर कटे हुए पक्षी की भाँति-गंजा दीखता है। रसादि धातुओं में स्थित दूषित दूषीविष धातुजन्य रोगों को करता है। शीत, वायु और बादल के आने पर यह कुपित होता है।

वक्तव्य—तद्वर्षास्वन्धुयोनिन्त्वाद् संक्तेदंगुडवद्गतम्। सर्प-त्यन्धुषरापाये तदगस्त्यो हिनस्ति च। प्रयाति सन्दवीर्यं विषं तस्माद् घनात्यये ॥ चरक वि० अ० २२-७-८ ॥२७-२६॥

निद्रा गुरुत्वं च विजृम्भणं च विश्लेषहर्षावथवाऽङ्गमर्दः।

दूषीविष के पूर्वरूप-निद्रा आना, भारीपन, जम्भाई, सन्धियों, का दीलापन, रोमांचता, अंगों का टूटना होता है ॥

ततः करोत्यन्तमदाविपाका- वरोचकं मण्डलकोठमोहान् ॥२०॥

धातुक्षयं पादकराशयशोफं दकोदरं छर्दिमथातिसारम्।

वैषण्येमूर्च्छाविषमञ्जरान् वा

कुर्यात् प्रवृद्धां प्रबलां तृषां वा ॥२१॥

उन्मादमन्यज्जनयेत्थाऽन्य- दानाहमन्यत् क्षपयेच्छ शुक्रम।

गादगचमन्यज्जनयेच्छ कुष्ठं

तांस्तान् विकारांश्च बहुप्रकारान् ॥२२॥

इसके आगे अन्न के कारण मर्द (हर्षक्षय या घेन आना), अविपाक, अरोचक, चकत्ते और कोठों की उत्पत्ति, धातुक्षय, हाथ, पैर, मुख में शोय, उदर में जलबृद्धि, वमन, अतीसार, विवर्णता, मूर्च्छा, विषमञ्जर, बढ़ी हुई प्रबल प्यास उत्पन्न करता है। कोई विष उन्माद, कोई आनाह, कोई शुक्र-नाश, कोई विष भराई हुई आवाज, कोई कुछ इस प्रकार विष बहुत से-नाना प्रकार के रोगों को उत्पन्न करते हैं ॥३०-३२॥

दूषितं देशकालान्निवास्वप्नैरभोदण्डः।

यस्माद्दूषयते धातून् तस्माद्दूषीविषं स्मृतम् ॥२३॥

यह विष देश (आनूप), काल (शीतल-बादली आना), अन्न (सुरा, तिल आदि), दिन में खोने से बार-बार धातुओं को दूषित करता है, इसलिये इस विष को दूषीविष कहते हैं। (व्यायाम, मेषुन, क्रोध आदि भी इसको बढ़ाते हैं, उनका अन्न में समावेश करना चाहिये) ॥२३॥

स्थायवरस्योपयुक्तस्य वेगे तु प्रथमे नृणाम्।

श्यावा जिह्वा भवेत्तच्छ्वा मूर्च्छां खासश्च जायते ॥

द्वितीये वैपथुः सादो दाहः कण्ठरुजस्तथा। विषसामागयप्रामं कुरुते हृदि वेदनाम् ॥३५॥ तालुशोषं तृतीये तु शूलं चामाशये भुजाम्। दुर्वर्णं हरिते शनै जायते चास्यलोचने ॥३६॥ पक्वामागययोरस्तोदो हिक्का कासोऽन्त्रकूजन्तम्। चतुर्थं जायते वेगे शिरसश्चातिगौरवम् ॥३७॥ कफप्रसेको वैषण्यं पर्वभेदश्च पञ्चमे। सर्वदोषप्रकोपश्च पक्वाधाने च वेदना ॥३८॥ षष्ठे प्रज्ञाप्रणाशश्च भुजं चाप्यतिसार्यते। स्कन्धगुष्ठकटीभङ्गः सन्तिरोधश्च सप्तमे ॥३९॥

स्थायर विष के खाने पर इसके प्रथम वेग में मनुष्यों की जीभ श्याववर्ण, जड़ हो जाती है, रोगी को मूर्च्छा और श्वास होता है। दूसरे वेग में कम्पन, शिथिलता, दाह, गले में दर्द होता है। आमाशय में पहुँचने पर विष हृदय में वेदना करता है। तीसरे वेग में तालुशोष, आमाशय में तीव्रशूल, एवं आँखें बुरे वर्ण की हरी, सूजी हो जाती हैं। चौथे वेग में पक्वाशय और आमाशय में तोद, हिनकी, कास, आँतों में गड़गड़ाहट, और शिर में भारीपन होता है। पाँचवें वेग में कफ का खाव, विवर्णता, पर्वों का टूटना, सब दोषों का प्रकोप और पक्वाशय में वेदना होती है। छठे वेग में बुद्धि और प्राणों का नाश, और अतिशय अतिसार होता है। सातवें वेग में स्कन्ध, पीठ और कटि टूट जाते हैं और खास रुक जाता है (मर जाता है)।

वि० सन्तव्य—विष की लहर का नाम वेग है। भाँग पीने पर भी वेग का कुछ २ अनुभव होता है ॥३४-३६॥

प्रथमे विषवेगे तु वान्तं शीताम्बुसेचित्तम्।

अगदं मधुसर्पिभ्यां पाययेत् समायुतम् ॥४०॥

द्वितीये पूर्ववद्दान्तं पाययेत् विरेचनम्।

तृतीयेऽगदपानं तु हितं नस्यं तथाऽञ्जनम् ॥४१॥

चतुर्थे स्नेहसंमिश्रं पाययेतागदं भिषक्।

पञ्चमे क्षौद्रमधुककवाथयुक्तं प्रदापयेत् ॥४२॥

षष्ठेऽतीसारवत् सिद्धिरवपीडश्च सप्तमे।

मूर्ध्नि काकपदं कृत्वा सासुरवा पिजितं क्षिपेत् ॥४३॥

चिकित्सा—विष के प्रथमवेग में रोगी को वमन कराके शीतल जल से परिषेक कराये। मधु और घी से भली प्रकार मिलाकर अगद पिलाये। विष के दूसरे वेग में पूर्व की भाँति वमन करके तीव्र विरेचन देवे। तीसरे वेग में अगद पिलाना, नस्य और अंजन दे। चौथे वेग में वैद्य स्नेह से मिला अगद पिलाये। पाँचवें वेग में मधु एवं मुलेहटा के क्वाथ में मिला अगद देवे। छठे में अतिसार की भाँति चिकित्सा करे और अवपीडन नस्य देवे। सातवें वेग में सिर पर काकपद के आकार का पन्थ लगा रक्त मिश्रित मांस रख देवे। अवपीडन भी देवे।