सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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मुश्रुतसंहिता
[ अ० ३ ]
श्राठ (र) विषाः, चित्रशिरः सरावकुर्दिशतदारुकारिमे- दकसारिकामुख। मुखसन्दंशविशर्धितमृत्रपुरीषविषाः, मक्षिकाकणभजलायुका मुखसन्दंशविषाः, विषहतास्थि- सर्पकण्टकवरटीमत्स्यास्थि चेत्यस्थिविषाणि, शकुलीमत्स्य रक्तराजिवरकी (टी) मत्स्याश्च पित्तविषाः, सूक्ष्मतुण्डो- च्छिचटिङ्गवरटीशतपदीशूकवलभिकाशुङ्गिभ्रमराः शूकतुण्ड- विषाः, कीटसर्पदेहा गतासवः शवविषाः, शेषास्त्वनुक्ता मुखसन्दंशविषेष्वेव गणयितव्याः ॥५॥
इनमें डडि, निश्वास में विषवाले दिव्य सर्प हैं। भूमि के साँप दंशविषवाले हैं। बिछी, कुत्ता, बन्दर, मकर, मण्डूक, पाकमत्स्य, गोहूँ, शम्भूक, प्रचालक, ग्रहगोधिका (छिगकली), पशु, कीड़े, तथा दूसरे दंश। एवं नख विषवाले हैं। चिपट, पिच्छटक, कषायवासिक, सर्पक, तोटक, वच, कीट, कौण्डि- न्यक, ये इनके मल मूत्र में हैं। चूहों के शुक्र में विष है। लूआ (मकड़ी) के लाला, मूत्र, मल, मुख, संदेश, नख शुक्र और आर्चव में विष है। विच्छू, विश्वम्भर, वरटी, राजीवमत्स्य, उच्चिटिंग (विषकपरा), समुद्रबृश्चिक, इनके आर (पूर्व में स्थित कांटा) में विष है। चित्रशिर, सराव, कुर्दशित, दारुकारि, मेदक, सारिमुखा इनके मुखसन्दंश, विशर्धित, मूत्र और मल में विष है। मक्खी, कणभ और जोक इनके मुख सन्दंश में विष है। विष से मरे की अस्थि, साँप का कण्टक (दाँत), वरटी, मछली की अस्थि, ये अस्थि विष हैं। शकुलीमत्स्य, रक्तराजी, वरटी, मत्स्य ये पित्तविषवाले हैं। सूक्ष्मतुण्ड, उच्चिटिंग, वरटी, शतपदी (कानखजुरा), शूक, बलमीका, शृंगो, भ्रमर इनके शूक और तुण्ड में विष है। कीड़े और साँप इनके मृत देह शव विष हैं। शेष जो नहीं कहे उनको मुख सन्दंश विष में गिनना चाहिये।
वक्तव्य—चूहे के काटने से भी विष होता है, इसी को आजकल (Rat Bite Fever) के नाम से कहते हैं। और- बैल आदि को मारने के लिये वॉस की पतली लकड़ी (पैनी) के अगले भाग में आधा इंच लम्बी लगाई पतली-तेज कील होती है। इसे बैल में लुभोते हैं। इसकी भाँति होने से विच्छू के दंश को 'आर' शब्द से कहा है। बुद्धवाग्भट ने तुण्ड विशर्धित के स्थान पर स्पर्श और रक्त पढ़ा है ॥५॥
भवन्ति चात्र—
राजोऽरिदेशे रिपवस्तृणाम्बु-
मार्गात्रधूमश्रसन्तान् विषेण।
सदूषयन्येभिरतिप्रदुष्टान्
विद्याय लिङ्गैरभिगोध्येतान् ॥६॥
इसमें श्लोक भी हैं—शत्रु देश में प्रविष्ट राजा के तृण (पशुओं के घास, भूसा आदि), जल, रास्ते, अन्न, वायु को
शत्रु विष से दूषित कर देते हैं। शत्रुओं से अति दूषित किये इनको निम्न लक्षणों से जान कर इनका शोधन करे ॥६॥
दुष्टं जलं पिच्छिलमुग्रगन्धि
फेनान्वितं राजिभिरावृतं च।
मण्डूकमत्स्यं त्रियते विहङ्गा
मत्ताश्च सानूपचरा भ्रमन्ति ॥७॥
मज्जन्ति ये चात्र नराश्रनागा-
स्ते छर्दिमोहज्वरदाहशोकान्।
ऋ (ग) न्छन्ति तेषामपहृत्य दोषान्
दुष्टं जलं शोधयितुं यतते ॥८॥
विष से दूषित जल—पिच्छिल, तेजगन्धवाला, झागदार और रेखाओं से युक्त होता है। मेढक, मछली, मर जाती है। पक्षी और कछुए आदि किनारे पर रहनेवाले पागल हो जाते हैं। इस जल में मनुष्य, घोड़े, हाथी, जो भी स्नान करते हैं, उनको वमन, मोह, ज्वर, दाह और शोक होता है। उनके दोषों को दूर करके, दूषित जल को, शुद्ध करने का यत्न करे ॥ इसके लिये—
धवाश्वकर्ण.सनपारिभद्रान्
सपाटलान् सिद्धकमोक्षकौ च।
दग्धा सराजदुमसोमवलका-
स्तद्व्रह्म शीतं वितरेत् सरःसु ॥९॥
भस्माण्डजलि चापि घटे निधाय
विशोधयेदीप्सितमेवमम्भः।
धावड़ी, अश्वकर्ण, असन (विजयसार), पारिभद्र (फर- हद), पाटल, सिद्धक, (निर्गुणडी या सिम्बल), मोक्षक (मोखा), अमलतास, सोमवलक (विटखदिर की छाल) इनको जलाकर इनकी ठण्डी भस्म को जल में छिड़क देवे। इस राख की अंजली घड़े में डालकर इच्छित पीने के पानी का शोधन करे।
वि० मन्तव्य—जल की शुद्धि के लिये जो भस्म का प्रयोग बतलाया है वह क्षार का प्रयोग है। आजकल जो पुटास परमेड्- नेट का प्रयोग होता है उसका यही बीज है। उक्त लालद्रव्य भी क्षार ही है। जिन कूपों का जल विकृत हो जाता है इनमें उक्त भस्म डालने पर वही लाभ होता है जो पुटास परमेड्नेट डालने पर होता है ॥१०॥
क्षितिप्रदेशं विषदूषितं तु
शिलातलं तीर्थमथेरिणं वा ॥१०॥
सुश्रुन्ति गात्रेण तु येन येन
गोवाजिनागोष्ट्रखरा नरा वा।
१ मेरे मित्र श्री निरंजन गलियारा ने बतलाया है कि बर्मा में इन्सीन, तमाई की तरफ बर्मी लोग तालाबों में एक लकड़ी का चूर्ण पानी पर छिड़क देते हैं। सबेरे मछलियाँ मरो हुई पानी के ऊपर उनको मिल जाती हैं।