सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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कल्पस्थानम्
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तन्जूनतां यास्यथ दृष्टते च
विशौर्यते रोमनखं तथैव ॥११॥
तत्राप्यनन्तां सह सर्वंगन्धैः
पिष्ठा सुराभिर्विंनियोज्य मार्गम् ।
सिद्धचेत् पयोभिः सुमुद्गन्वितैस्तं
विडङ्गपाठाकटभीजलैर्वा ॥१२॥
विष से दूषित भूमि प्रदेश का, शिलागुड को, तीर्थ ( घाट आदि ) को, ईरिण ( ऊपर भूमि मैदान ) को गाय-बैल, घोड़े हाथी, ऊंट, गधे, और मनुष्य शरीरके जिस जिस अंग से छूते हैं, वह अंग सूज जाता है, वहाँ पर जलन होती है, रोम और नख गिर जाते हैं । इसके लिये अनन्ता ( सारिवा ) को एलादि-गन्ध के साथ सुरा में पीसकर दूध एवं काली मिट्टी या वर्ल्मीक मृत्तिका मिलाकर इससे छिड़काव करे । अथवा वायविडंग, पाठा, कटभी ( अपराजिता ) इनके कषाय से परिषेक करे ॥
तृणेषु भक्तेषु च दूषितेषु
सीदन्ति मूर्च्छन्ति वमन्ति चान्ये ।
विड्भेदमुच्छन्त्यथवा प्रियन्ते
तेषां चिकित्सां प्रणयेद्यथोक्ताम् ॥१३॥
विषापहैर्वाऽप्यगदैर्विलिप्य
वाद्यानि चित्राण्यपि वादयेत ।
तारः सुतारः ससुरेन्द्रगोपः
सर्वैश्च तुर्यः कुशविन्दभागः ॥१४॥
पितेन युक्तः कपिलान्वयेन
वाद्याप्रलेपो विहितः प्रशस्तः ।
वाद्यस्य शब्देन हि यान्ति नाशं
विषाणि घोराण्यपि यान्ति सन्ति ॥१५॥
घास-भूसा आदि एवं भोजन-गेहूँ आदि के विष से दूषित हो जाने पर जो इनका उपयोग करते हैं वे शिथिल हो जाते हैं, मूर्च्छित होते हैं, कइयों को वमन होती है, किसी को अति-सार होता है, और कोई भर भी जाते हैं । उनमें निम्न चिकित्सा करे । विषनाशक या अन्य अगदों से नाना प्रकार के वाद्यों पर लेप करके इनको बजाये । चाँदी, पारा, सुवर्ण, सारिवा, इन सब के बराबर कुशविन्द ( रत्न या शाण का पत्थर, डल्हन के मत से मुस्ता भी ), इनको कपिलवर्ण की गाय के पित्त के साथ मिलाकर बाजों पर लेप करना उत्तम है । क्योंकि वाद्य के शब्द से घोर विष भी नष्ट हो जाते हैं ।
वि० मन्तव्य—वाद्य-ढोल आदि-शब्द या ध्वनि से वाता-वरण फट जाता है फलतः जहाँ तक शब्द जाता है वहाँ तक विषनाशक औषध की धूलि पहुँच जाती है और विष का प्रभाव नष्ट हो जाता है ॥१३-१५॥
धूमेऽनिले वा विषसंप्रयुक्ते
खगाः श्रमाताः प्रपतन्ति भूमौ ।
कासप्रतिस्रयायजिरोरुजञ्च
भवन्ति तीव्रा नयनामयाञ्च ॥१६॥
लाक्षाहरिद्रातिविषाभयान्व-
हरेणुकेलादनवककुसुम् ।
प्रियङ्गां चाप्यनले निधाय
धूमानिलौ चापि विशोधयेत ॥१७॥
धूम या वायु के विष से युक्त होने पर पक्षी-श्रम से यककर भूमि पर गिर जाते हैं । कास, श्वास, प्रतिस्रयाय, शिरोरोग, और आंख के रोग हो जाते हैं । इसमें लाख, हल्दी, अतीस, हरड, मोथा, हरेणु, इलायची, तमालपत्र, तगर, कूठ, प्रियंगु इनको अग्नि में डालकर इनसे धूम और वायु का शोषन करे ।
वि० मन्तव्य—विषैला धूम ( गैस ) तथा वायु जहाँ फैल जाता है अथवा फैला दिया जाता है । जैसे—प्रथम महासमर ( सन् १६१४-१८ ) में गैसों का प्रयोग किया गया था और उसके द्वारा “इन्फ्लुएन्जा” नामक ज्वर जनपदोद्बन्ध-मरक महामारी के रूप में फैला था । इस ज्वर के भी प्रधान लक्षण कास, प्रतिस्रयाय एवं शिरोवेदना ही थे ॥१६,१७॥
प्रजामिमासाम्सयोनेर्ब्रह्मणः सृजतः किल ।
अक्रोदसुरो विघ्नं कैटभो नाम दपितः ॥१८॥
तस्य क्रुद्धस्य वै वक्राद्रब्रह्मणस्तेजसो निवेः ।
क्रोधो विग्रहवान् भूत्वा निपपातातिदारुणः ॥१९॥
स तं ददाह गर्जन्तमन्तकामं महाबलम् ।
ततोऽसुरं घातयित्वा तत्तेजोऽवर्धताद्भुतम् ॥२०॥
ततो विषादो देवानामभवन्तं निरीदय वै ।
विषादजनन्तत्वाच्च विषमित्यभिधीयते ॥२१॥
ततः सृष्ट्वा प्रजाः शेषं तदा तं क्रोधमोक्षरः ।
विन्यस्तवान् स भूतेषु स्थावरेषु चरेषु च ॥२२॥
स्वयम्भू ब्रह्मा के इस सृष्टि को बनाते समय कैटभ नाम के राक्षस ने अभिमान में आकर विघ्न उपस्थित किया । उस समय तेजः पुञ्ज ब्रह्मा के क्रुद्ध होने से उनके मुख से क्रोध शरीर-रूप धारण करके अतिदारुण रूप से गिरा । इस क्रोधरूपी पुरुष ने उस यम के समान महाबलवान्, एवं गरजते हुए राक्षस को मार डाला । उस राक्षस को मारकर यह तेज विचित्ररूप में बढ़ने लगा । इसको देखकर देवताओं को बहुत विषाद ( दुःख ) हुआ । विषाद उत्पन्न करने के कारण इसको विष कहते हैं । फिर शेष प्रजाओं को बनाकर ब्रह्मा ने उस क्रोध को स्थावर और जंगम भूतों में रख दिया ।
१ विगत यूरोपिय महायुद्ध में सिपाहियों के टोप पर एवं बटनों पर ऐसे पदार्थ लगा दिये जाते थे कि जिनका रंग बिप्ले गैस से बदल जाता था । रंग बदलता देखकर सिपाही तुरन्त वायु से बचने का रसायंत्र ( मस्क ) बरतता था ।