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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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पृष्ठ 626

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ३ ]

जगद्विषण्णं तं दृष्ट्वा तेनासौ विषसंज्ञितः । जंगमस्थावरायां तद्योनौ ब्रह्मा न्यथोजयत् ॥ चरक ।

वि० मन्तव्य—यह विष की प्राथमिक उत्पत्ति का प्रकार है और यह अगद तन्त्र-विषशास्त्रवालों का कथन है या विचार है या अनुमान है। जैसे मानव की सृष्टि के विषय में मानव शास्त्र का ॥१८-२२॥

यथाऽव्यक्तसं तौयमन्तरीक्षान्महीगतम् ।

तेषु तेषु प्रदेक्षेयु रसं तं तं नियच्छति ॥२३॥

एवमेव विषं यद्यद्वद्व्यं व्याप्यावतिष्ठते ।

स्वभावोदेव तं तस्य रसं समनुवर्तते ॥२४॥

जिस प्रकार अत्यन्तरसवाला जल आकाश से बरसकर भूमि पर गिरकर उन उन प्रदेशों के रसों को ले लेता है, इसी प्रकार विष भी जिस द्रव्य का आश्रय लेता है, प्रकृति से वह उसी द्रव्य के रसवाला बन जाता है। (वैसे विष अत्यन्तरस है) ॥२३,२४॥

विषे यस्माद्गुणाः सर्वे तीक्ष्णा प्रायेण सन्ति हि ।

विषं सर्वमतो ज्ञेयं सर्वदोषप्रकोपणम् ॥२५॥

ते तु वृत्तिं प्रकृपिता जहति स्वां विषाद्विताः ।

नोपयाति विषं पाकमतः प्राणान् रुण्दि च ॥२६॥

इलेषमणाऽवृतमार्गत्वाद्बुच्छवासोऽस्य निरुध्यते ।

विसंज्ञः सति जीवेऽपि तस्मात्तिष्ठति मानवः ॥२७॥

क्योंकि विष में प्रायः सब गुण तीक्ष्ण रूप में रहते हैं इसलिये विष को सब दोषों का प्रकोपक जानना चाहिये। ये वातादि दोष प्रकृपित होकर विष से पीड़ित होने के कारण अपने स्वभाव को छोड़ देते हैं। इसलिये विष का पाचन नहीं होता, और प्राणों का भातक बन जाता है कफ से मार्ग के आवृत होने के कारण इसका उच्छ्वास रुक जाता है। इसलिये जीते हुए भी मनुष्य संसारहित बना रहता है।

वि० मन्तव्य—यद्यपि रूक्ष एवं उष्ण आदि गुण सभी द्रव्यों में रहते हैं, परन्तु विष द्रव्य में तीव्र होते हैं, इसीलिये यह द्रव्य "विष" कहलाता है। वृत्ति—वासु—प्रसन्दन आदि को, पित्त-पाचन एवं रसरञ्जन आदि को और कफ सन्धिर्लक्षण कर्म को। विष अपाकी-न पचनेवाला होता है (क० अ० २-श्लो० २०) अतः प्राण की गति को रोक देता है, कफ द्वारा प्राण के मार्ग रुक जाने से श्वास प्रश्वास की क्रिया रुक जाती है—रुक-रुक कर बहुत ही सूक्ष्म होकर चलती है। तात्पर्य यह है कि विषपीड़ित के श्वास की गति को रुकी देखकर ही उसे मृत नहीं समझ लेना चाहिये अपितु—इसी अन्ध्याय के श्लो० ४०-४४ के अनुसार यदि लक्षण देखे जायें तब "मृत" समझना चाहिये अन्यथा विष नाशक उपचार तत्परता के साथ करते रहना चाहिये ॥१५-२७॥

शुक्रवत् सर्वसर्पाणां विषं सर्वशरीरगम् ।

कुट्टानामेति चाङ्ग्रेभ्यः शुक्रं निमन्थनादिव ॥२८॥

तेषां बडिशवद्वृष्ट्यास्तासु सज्जति चागतम् ।

अनुद्वृष्ट्या विषं तस्मान्न मुञ्चन्ति च भोगिनः ॥२९॥

सब सर्पां में विष शुक्र की भाँति सारे शरीर में फैला रहता है। जिस प्रकार विष की इच्छा से अंगों के मथने पर शुक्र बाहर आता है, इसी प्रकार कुट्ट होने पर विष सम्पूर्ण अंगों से बाहर आता है। यह आया हुआ विष उनकी बडिश (मछली पकड़ने का काँटा) के समान दृष्टा में (थैली में) रुक जाता है। इसलिये बिना चाह के सर्प विष को नहीं छोड़ते, (इच्छा करने पर ही सर्प जहर निकालता है)।

चरक—सर्पदृष्टा चतस्खस्तु तासां वामाधराः सिराः । पीतावामोत्तरादृष्टा रक्तश्यावाधरोत्तरा ॥ यन्मात्रः पतते विन्दुः गोवालात्सलिलोद्भूतात् । वामाधरायां दृष्ट्या तन्मात्रं स्यादहः विषम् ।

वि० मन्तव्य—सर्प का मांस खाया भी जाता है। सुना है चीन जापान आदि देशों में यह मछली के समान प्रयुक्त होता है और च० चि० अ० ८ में वर्मिशन्देन च उरगान् ॥५१॥ सर्प का मांस खाने का विधान भी है। प्रतीत होता है, कि जैसे शरीर में व्याप्त शुक्र धातु शुक्र के रूप में नहीं पाया जाता वैसे ही विष भी सर्प के शरीर में व्याप्त विषरूप में नहीं पाया जाता वह उनके दंश में आकर ही विषरूप धारण करता है। यह भी सुना जाता है, कि सर्प का शिर काटकर शेष शरीर का मांस निर्विष होने के कारण खा लिया जाता है। अनुद्वृष्टा-अनुद्योजिताः अनुच्छलिता इति यावत्, कर्णगुक्त परावृत्त्या हि दृष्ट्या अघोमुखता इति (डरलून टीका)। अर्थात् सर्प काटकर दृष्टा फँसे दन्तों को निकालने के लिये उछलकर एकबार उलटा होता है, उल्टा होते ही दन्तों का मुख नीचे की ओर हो जाता है फलतः क्षत में विष चू जाता है। कभी-कभी काटने पर विष का प्रभाव नहीं होता क्योंकि सर्प उल्टे बिना ही दन्त निकालकर भाग जाता है। यह सब सर्प विशेषज्ञ संपत्ति से सुना है ॥२८,२९॥

यस्माद्व्यर्थमुष्णं च तीक्ष्णं च पठितं विषम् ।

अतः सर्वविषेषूक्तः परिषेकस्तु शीतलः ॥३०॥

मन्दं कीटेषु नात्युष्णं बहुवातकफं विषम् ।

अतः कीटविषे चापि स्वेदो न प्रतिषिध्यते ॥३१॥

कीटेद्वृष्टानुप्रविषैः सर्पवत् समुपाचरेत् ।

चूंकि विष अतिशय उष्ण, और तीक्ष्ण कहा है, इसलिये सब विषोंमें शीतल परिषेक करना चाहिये। कीटों का विष मन्द, न बहुत उष्ण और न बहुत वातकफवाला होता है इसलिये कीटों के विष में स्वेद निषिद्ध नहीं है। उपविषवाले कीटों के दंश की चिकित्सा सर्पां की भाँति करे ॥३०,३१॥