सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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कल्पस्थानम्
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स्वभावादेव तिष्ठेत्तु ग्रहारादंग्योविषम् ॥३२॥ न्याय्य सावयवं देहं दिग्धविद्वाहिदृष्टयोः । लील्याद्विषान्वितं मांसं यः खादेन्मृतमात्रयोः ॥३३॥ यथाविषं स रोगेण किलइयते त्रियतेऽपि वा । अतश्चाप्यनयोमांससमभक्ष्यं मृतमात्रयोः ॥३४॥ मुहूर्तात्तदुपादेयं ग्रहारादंगवजितम् ।
स्वभाव से ही विष दंश किये स्थान पर रहता है । विचैले शस्त्र से मारे, और सांप के काटने पर विष अङ्ग समेत सम्पूर्ण शरीर में फैल जाता है । मरे हुए प्राणी का विषयुक्त मांस लोभ के कारण जो कोई खाता है, वह प्राणी विष के अनुसार रोग से पीड़ित होता है या मर जाता है । इसलिये विचैले बाण से मरे या सांप के काटने से मरे हुए प्राणी का मांस नहीं खाना चाहिये । यदि खाना ही हो तो ग्रहार और दंश के स्थान को छोड़कर तुरन्त एक मुहूर्त के अन्दर ले लेना चाहिये ॥
सवातं गृहधूमामं पुरीषं योऽतिसार्यते ॥३५॥ आध्मातोत्यर्थमुष्णासो विवर्णः सादपीडितः । उद्वमत्यथ फेनं च विषपीतं तमादिशेत् ॥३६॥ न चास्य हृदयं वह्निविषजुष्टं दहत्यपि ।
तद्वि स्थानं चेतनायाः स्वभावाद्वाथाय तिष्ठति ॥३७॥ वायु के साथ घर के धुवासे के समान रंग का काला मल जिसे आता हो, आध्मान हो, आंसुओं का जल बहुत गरम हो, विवर्ण हो, शिथिलता आ गई हो, वमन आती हो, क्षाग आती हो, उस रोगी को विष पान किया समर्क । इस रोगी के विष से युक्त हृदय को आग में न जलाये । क्योंकि हृदय चेतना का स्थान है, विष स्वभाव से ही उसमें व्याप्त करके रहता है । (पीतं मृतस्य हृदि तिष्ठति, दधविद्वयोः दंशदेशे स्यात्—चरक) ॥३५-३७॥
अश्वत्थदेवायतनशमन- वलमीकसन्ध्यासु चतुष्पथेषु ।
याम्ये सपिञ्चे परिवर्जनीया ऋत्वे नरा मर्मसु ये च दृष्टाः ॥३८॥
पीपल, मन्दिर, शमशान, वलमीक, सन्ध्याकाल, चौराह, भरणी नक्षत्र में, मघा नक्षत्र में और मर्म स्थानों पर काटे हुए मनुष्यों की चिकित्सा नहीं करनी चाहिये, ये असाध्य हैं ॥३८॥
दर्वीकराणां विषमाशुषाति सर्वाणि चोष्णे द्विगुणीभवन्ति ।
अजीर्णपितातपपीडितेषु बालप्रमेहिष्वथ गर्भिणीषु ॥३९॥
बृद्धातुरक्षीणुभक्षितेषु रूक्षेषु भीरुष्वथ दुर्दिनेषु ।
दर्वीकर सांपों का विष शीघ्र मारक होता है । सभी विष उष्णकाल में दुगुने बढ़ते हैं । अजीर्णरोगी, पित्तरोगी, धूप से
पीड़ित, बालक, प्रमेहरोगो, गर्भवती, बृद्ध, रोगी, क्षीण, भूखे, रूक्ष प्रकृति, और भीरुओं में एवं बादलों के आने पर सब विषों का जोर बढ़ता है ॥३९॥
शस्त्रश्चते यस्य न रक्तमेति राज्ञो लताभिश्च न संभवन्ति ॥४०॥
शीताभिरदुभिश्च न रोमहर्षा विषाभिभूतं परिवर्जयेत्तम् ।
जिह्वा सिता यस्य च केग्नशतो नासावभङ्गश्च सकण्ठभङ्गः ॥४१॥
कृष्णः सरक्तः श्वयशुश्रूष दंशे हन्वोः स्थिरत्वं च स वर्जनीयः ।
वर्तिर्घना यस्य निरेति वक्रत्रा- द्रक्तं स्वेदूष्णमघश्च यस्य ॥४२॥
दंष्ट्रानिपाताः सकलाश्च यस्य तं चापि वैद्यः परिवर्जयेत्तु । उन्मत्तमत्यर्थमुपद्रुतं वा हीनस्वरं वाऽप्यथवा विवर्णम् ॥४३॥ सारिष्टमत्यर्थमवेगितं च जह्नान्नरं तत्र न कर्म कुर्यात् ॥४४॥
असाध्य—शस्त्र से काटने पर जिसका रक्त नहीं निकलता, लता (वैत) आदि से मारने पर जिसके शरीर पर रेखायें नहीं उठती, शीतल जल से जिसकी रोमांच नहीं होता, विष से पीड़ित उस मनुष्य को छोड़ देना चाहिये । जिसकी जीभ श्वेत हो गई हो, बाल झड़ने लगे, नासा वैठ गई हो, आवाज रुक गई हो, रक्त काला हो, दंश में लाल शोथ हो, जवाड़ी स्थिर हो गई हो (बन्द रहे, खुले नहीं), वह भी असाध्य है । मुख से जमा हुआ घट्ट कफ निकले, मुख, नाक, गुद, मूत्रमार्ग से रक्त जाता हो दंशस्थान पर सब दांतों का पूरा पूरा निशान हो, उसको भी वैद्य छोड़ देवे । जो रोगी पागल हो, अति उपद्रवों से पीड़ित हो, स्वर कमजोर हो गया हो अथवा रोगों के शरीर का रंग बदल गया हो, मृत्यु के लक्षण निश्चित रूप में आ गये हों, जिसमें लहर न आये, वह रोगी मरेगा हो, उसकी चिकित्सा न करे ॥४०-४४॥
वक्तव्य—नीलोद्वदन्तशेथिल्यकेशपतनाङ्गभगविच्छेपाः शिशिरैर्न लोमहर्षो नाभिहृते दण्डराजी स्यात् ॥ शतजं क्षताच्च नाया- त्येतानि भवन्ति मरगलिंगानि ॥ च० ॥ च० अ० २३-३३-३४॥
मनुष्य के शरीर में मरने पर जो परिवर्तन होते हैं, यथा, राई गर मोरटिस, खिराओं का संकोच, रक्त संचार का बन्द होना उसके कारण, ही वैत आदि से मारने पर रेखायें नहीं उठती, जलाने पर छाला नहीं होता, छाले में पानी नहीं होता ।