सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ४ ]
ये पहिचानें—निश्चित मूल्य का चिह्न हैं। विस्तार न्यायवैद्यक-विषतंत्र में देखिये ॥४०-४१॥
इति सुश्रुतसंहितायां कल्पस्थाने जङ्गमविषविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
चतुर्थोऽध्यायः
अथातः सर्पदृष्टविषविज्ञानीयं कल्पं व्याख्यास्यामः॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
अब इसके आगे सर्पदृष्टविज्ञानीयकल्प का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥१,२॥
धन्वन्तरिं महाप्राज्ञं सर्वशास्त्रविशारदम् ।
पादयोरुपसंगृह्य सुश्रुतः परिपुच्छति ॥३॥
महाबुद्धिमान्, सब शास्त्रों में निपुण धन्वन्तरि भगवान् के पैरों को स्पर्श करके सुश्रुत ने पूछा ॥३॥
सर्पसंख्यां विभागं च दृष्टलक्षणमेव च ।
ज्ञानं च विषवेगानां भगवन् ! वक्तुमर्हसि ॥४॥
हे भगवन् ! सर्पों की संख्या उनके भेद, उनके काटने के लक्षणों को विष के वेगों का ज्ञान आप के कहने योग्य है, इस-लिये कहें ॥४॥
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा प्रात्रवीदुभिषजां वरः ।
असंख्या वासुकिश्रेष्ठा विख्यातास्तक्षकादयः ॥५॥
महोधराश्च नागेन्द्रा हुताग्निनसमतेजसः ।
ये चाप्यजसं गर्जन्ति वर्षन्ति च तपन्ति च ॥६॥
ससागरगिरिद्रोपा यैरियं धार्यते मही ।
कृद्वा निःश्वासदृष्टिभ्यां ये हन्युरखिलं जगत् ॥७॥
नमस्तेभ्योऽस्ति नो तेषां कार्यं किञ्चिच्छिकित्सया ।
ये तु दंष्ट्राविषा भौमा ये दशन्ति च मानुषान् ॥८॥
तेषां सङ्ख्यां प्रवक्ष्यामि तथावदनुपूर्वशः ।
सुश्रुत के इन वचनों को सुनकर वैद्यों में श्रेष्ठ धन्वन्तरि ने कहा। वासुकि जिन में श्रेष्ठ है, ऐसे तक्षकादि सांप असंख्य हैं। ये पृथ्वी को धारण करनेवाले, नागेन्द्र, होमानि के समान तेजस्वी हैं। और जो निरन्तर गरजते हैं, बरसते हैं, तपते हैं, समुद्र, पर्वत, द्रौप समेत पृथ्वी जिनसे धारण की हुई हैं, जो कूद होकर निःश्वास—दृष्टि मात्र से सम्पूर्ण जगत् को नष्ट कर सकते हैं, उनके लिये नमस्कार है, उनसे चिकित्सा में कोई सम्बन्ध नहीं है। जो कि दंष्ट्रा विषवाले पृथ्वी के सांप हैं, जो मनुष्यों को काटते हैं, उनकी संख्या की ठीक प्रकार क्रम से कहता हूँ१ ।
१—साँपों का नाम, वर्णन महाभारत आदिपर्व में विस्तार से दिया है, वहां देखें। या Indian Snakes नामक ग्रंथ जो पुस्तक में देखें।
वि० मन्तव्य—हमारा अनुमान ही नहीं, विश्वास है कि भूतकाल में अन्य शास्त्रों, दर्शनों या बादों के समान सर्पशास्त्र भी रहा होगा जिसमें यह प्रतिपादित या सिद्ध किया गया होगा कि सर्प ही सब कुछ हैं यथा ईश्वरवाद में ईश्वर, शक्तिवाद में शक्ति, सौरसम्प्रदाय में सूर्य, गणपति सम्प्रदाय में गणेश ही सब कुछ माना जाता है। आज भी सर्प सम्प्रदाय के जन पाये जाते हैं जिनको “सपेरा” कहते हैं और सर्प को देव मानकर पूजा भी होती है, उसे मारना भी उचित नहीं समझा जाता, यत्र तत्र उसके मन्दिर भी हैं, उत्तर प्रदेश में नागपञ्चमी तथा पञ्जाब में भाद्रपद कृष्ण ८ तथा शुक्ला नवमी को पूजा होती है और कश्मीर में अमरनाथ की यात्रा में जो छड़ी चलती है वह सर्प पूजा का ही प्रकार है। और पुराणों में जिस शेष नाग का वर्णन है वह भी सर्प ही है, वह इतना विराट-ब्रह्म-बृहत्-बड़ा है कि विष्णु भगवान् भी उसी पर शयन करते हैं और इतना बड़ा भूमण्डल भी उसके सहस्र संख्यक फणाओं में एक फण पर घूलिकण के समान अत्यन्त सूक्ष्म कण है। अन्य न जाने कितने कण हैं आदि आदि। यही सब “ससागर.....जगत्” कहकर भगवान् धन्वन्तरि ने उन सर्पों को प्रणाम किया है। तात्पर्य यह है कि सर्पवादियों का ईश्वर सर्प ही है। सर्पों को देवयोनि का प्राणी भी माना है यही कारण है कि सर्प, सर्पिणी, नपुंसक सर्प, गर्भिषी तथा स्तिका सर्पिणी आदि के लक्षण दृष्ट प्राणी में उत्पन्न हो जाते हैं देखिये इसी अध्याय का सूत्र ३८ ॥५-८॥
अगोतिस्त्वेव सर्पाणां भिद्यते पञ्चधा तु सा ॥९॥
दर्वीकरा मण्डलिनो राजिमन्तस्तथैव च ।
निर्विषा वैकरञ्जाश्च त्रिविधास्ते पुनः स्मृताः ॥१०॥
दर्वीकरा मण्डलिनो राजिमन्तश्च पञ्चगः ।
तेषु दर्वीकरा ज्ञया विशतिः षट् च पन्तगाः ॥११॥
द्वान्विशतिर्मण्डलिनो राजिमन्तस्तथा दश ।
निर्विषा द्वादश ज्ञया वैकरञ्जाश्चयस्तथा ॥१२॥
वैकरञ्जोद्भवाः सप्त चित्रा मण्डलिराजिलाः ।
ऐसे सांप अस्सी हैं। इनका भेद पांच प्रकार का है। यथा—दर्वीकर, मण्डली, राजिमान्, निर्विष और वैकरञ्ज। ये फिर आकार दृष्टि से तीन प्रकार के हैं यथा—दर्वीकर, मण्डली, राजिमान्। इनमें दर्वीकर सांप लम्बीस, मण्डली बाईस, राजिमान् दस, निर्विष बारह, वैकरञ्ज तीन हैं। चित्रितमण्डलि-राजिमान्-वैकरञ्जों से उत्पन्न सांप सात हैं (मण्डलि से चार, राजिमान से तीन)।
वक्तव्य—दर्वी-कड़छी, कर-फण, कड़छी के समान फण (थिर) वाले, फनियर। मण्डलि—गोल-गोल मण्डलवाले। राजिमान्-राजि-रेखा-धारीवाले। निर्विष—थोड़े विषवाले।