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सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

४७२

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ४ ]

ये पहिचानें—निश्चित मूल्य का चिह्न हैं। विस्तार न्यायवैद्यक-विषतंत्र में देखिये ॥४०-४१॥

इति सुश्रुतसंहितायां कल्पस्थाने जङ्गमविषविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

चतुर्थोऽध्यायः

अथातः सर्पदृष्टविषविज्ञानीयं कल्पं व्याख्यास्यामः॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अब इसके आगे सर्पदृष्टविज्ञानीयकल्प का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥१,२॥

धन्वन्तरिं महाप्राज्ञं सर्वशास्त्रविशारदम् ।

पादयोरुपसंगृह्य सुश्रुतः परिपुच्छति ॥३॥

महाबुद्धिमान्, सब शास्त्रों में निपुण धन्वन्तरि भगवान् के पैरों को स्पर्श करके सुश्रुत ने पूछा ॥३॥

सर्पसंख्यां विभागं च दृष्टलक्षणमेव च ।

ज्ञानं च विषवेगानां भगवन् ! वक्तुमर्हसि ॥४॥

हे भगवन् ! सर्पों की संख्या उनके भेद, उनके काटने के लक्षणों को विष के वेगों का ज्ञान आप के कहने योग्य है, इस-लिये कहें ॥४॥

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा प्रात्रवीदुभिषजां वरः ।

असंख्या वासुकिश्रेष्ठा विख्यातास्तक्षकादयः ॥५॥

महोधराश्च नागेन्द्रा हुताग्निनसमतेजसः ।

ये चाप्यजसं गर्जन्ति वर्षन्ति च तपन्ति च ॥६॥

ससागरगिरिद्रोपा यैरियं धार्यते मही ।

कृद्वा निःश्वासदृष्टिभ्यां ये हन्युरखिलं जगत् ॥७॥

नमस्तेभ्योऽस्ति नो तेषां कार्यं किञ्चिच्छिकित्सया ।

ये तु दंष्ट्राविषा भौमा ये दशन्ति च मानुषान् ॥८॥

तेषां सङ्ख्यां प्रवक्ष्यामि तथावदनुपूर्वशः ।

सुश्रुत के इन वचनों को सुनकर वैद्यों में श्रेष्ठ धन्वन्तरि ने कहा। वासुकि जिन में श्रेष्ठ है, ऐसे तक्षकादि सांप असंख्य हैं। ये पृथ्वी को धारण करनेवाले, नागेन्द्र, होमानि के समान तेजस्वी हैं। और जो निरन्तर गरजते हैं, बरसते हैं, तपते हैं, समुद्र, पर्वत, द्रौप समेत पृथ्वी जिनसे धारण की हुई हैं, जो कूद होकर निःश्वास—दृष्टि मात्र से सम्पूर्ण जगत् को नष्ट कर सकते हैं, उनके लिये नमस्कार है, उनसे चिकित्सा में कोई सम्बन्ध नहीं है। जो कि दंष्ट्रा विषवाले पृथ्वी के सांप हैं, जो मनुष्यों को काटते हैं, उनकी संख्या की ठीक प्रकार क्रम से कहता हूँ१ ।

१—साँपों का नाम, वर्णन महाभारत आदिपर्व में विस्तार से दिया है, वहां देखें। या Indian Snakes नामक ग्रंथ जो पुस्तक में देखें।

वि० मन्तव्य—हमारा अनुमान ही नहीं, विश्वास है कि भूतकाल में अन्य शास्त्रों, दर्शनों या बादों के समान सर्पशास्त्र भी रहा होगा जिसमें यह प्रतिपादित या सिद्ध किया गया होगा कि सर्प ही सब कुछ हैं यथा ईश्वरवाद में ईश्वर, शक्तिवाद में शक्ति, सौरसम्प्रदाय में सूर्य, गणपति सम्प्रदाय में गणेश ही सब कुछ माना जाता है। आज भी सर्प सम्प्रदाय के जन पाये जाते हैं जिनको “सपेरा” कहते हैं और सर्प को देव मानकर पूजा भी होती है, उसे मारना भी उचित नहीं समझा जाता, यत्र तत्र उसके मन्दिर भी हैं, उत्तर प्रदेश में नागपञ्चमी तथा पञ्जाब में भाद्रपद कृष्ण ८ तथा शुक्ला नवमी को पूजा होती है और कश्मीर में अमरनाथ की यात्रा में जो छड़ी चलती है वह सर्प पूजा का ही प्रकार है। और पुराणों में जिस शेष नाग का वर्णन है वह भी सर्प ही है, वह इतना विराट-ब्रह्म-बृहत्-बड़ा है कि विष्णु भगवान् भी उसी पर शयन करते हैं और इतना बड़ा भूमण्डल भी उसके सहस्र संख्यक फणाओं में एक फण पर घूलिकण के समान अत्यन्त सूक्ष्म कण है। अन्य न जाने कितने कण हैं आदि आदि। यही सब “ससागर.....जगत्” कहकर भगवान् धन्वन्तरि ने उन सर्पों को प्रणाम किया है। तात्पर्य यह है कि सर्पवादियों का ईश्वर सर्प ही है। सर्पों को देवयोनि का प्राणी भी माना है यही कारण है कि सर्प, सर्पिणी, नपुंसक सर्प, गर्भिषी तथा स्तिका सर्पिणी आदि के लक्षण दृष्ट प्राणी में उत्पन्न हो जाते हैं देखिये इसी अध्याय का सूत्र ३८ ॥५-८॥

अगोतिस्त्वेव सर्पाणां भिद्यते पञ्चधा तु सा ॥९॥

दर्वीकरा मण्डलिनो राजिमन्तस्तथैव च ।

निर्विषा वैकरञ्जाश्च त्रिविधास्ते पुनः स्मृताः ॥१०॥

दर्वीकरा मण्डलिनो राजिमन्तश्च पञ्चगः ।

तेषु दर्वीकरा ज्ञया विशतिः षट् च पन्तगाः ॥११॥

द्वान्विशतिर्मण्डलिनो राजिमन्तस्तथा दश ।

निर्विषा द्वादश ज्ञया वैकरञ्जाश्चयस्तथा ॥१२॥

वैकरञ्जोद्भवाः सप्त चित्रा मण्डलिराजिलाः ।

ऐसे सांप अस्सी हैं। इनका भेद पांच प्रकार का है। यथा—दर्वीकर, मण्डली, राजिमान्, निर्विष और वैकरञ्ज। ये फिर आकार दृष्टि से तीन प्रकार के हैं यथा—दर्वीकर, मण्डली, राजिमान्। इनमें दर्वीकर सांप लम्बीस, मण्डली बाईस, राजिमान् दस, निर्विष बारह, वैकरञ्ज तीन हैं। चित्रितमण्डलि-राजिमान्-वैकरञ्जों से उत्पन्न सांप सात हैं (मण्डलि से चार, राजिमान से तीन)।

वक्तव्य—दर्वी-कड़छी, कर-फण, कड़छी के समान फण (थिर) वाले, फनियर। मण्डलि—गोल-गोल मण्डलवाले। राजिमान्-राजि-रेखा-धारीवाले। निर्विष—थोड़े विषवाले।

४४

कल्पस्थानम्

१७३

वि० मन्तव्य—वैकरक्ष नामक सर्प—संकीर्ण जात अर्थात् वर्णसंकर हैं। भिन्न जाति की सर्पियों में भिन्न जाति के सर्प से उत्पन्न हैं। और वैकरक्षों से उत्पन्न सर्प विचित्र विचित्र मण्डलों तथा राजियोंवाले होते हैं ॥१६-१२॥

पादाभिष्टुष्टा दुष्टा वा कुट्टा ग्रासाधिनोऽपि वा ॥११॥ ते दशन्ति महाक्रोधास्त्रिविधं भीमदर्शनाः ॥

पेर से छूने पर, स्वभाव से दुष्ट, कूट्ट हुष्ट, ग्रास (भोजन) की इच्छा से, ये अतिशय क्रोधी, भीम दर्शनवाले सांप काटते हैं। इनका काटना तीन प्रकार का है-॥१३॥ यथा—

सर्पितं रदितं चापि तृतीयमथ निर्विषम् ॥

सर्पाङ्गाभिहतं केचिद्विच्छन्ति खलु तद्विदः ॥१४॥

पदानि यत्र दन्तानामेकं द्रे वा बहूनि वा ।

निमग्नान्यमरपत्तानि यान्यदुष्टुत्य करोति हि ॥१५॥

चञ्चुमालकयुक्तानि वैकृत्यकरणानि च ।

सङ्क्षिप्तानि सशोफानि विद्यान्तु सर्पितं भिषक् ॥१६

राज्यः सलोहिता यत्र नीलाः पीताः सितास्तथा ।

विजेष्यं रदितं तत्तु ज्ञेयमल्पविषं च तत् ॥१७॥

अशोफमल्पदुष्टासूक्तं प्रकृतिस्थस्य देहिनः ।

पदं पदानि वा विद्याद्विषं तस्त्रिक्तसकः ॥१८॥

सर्पसृष्टुष्टस्य भीरोहिं भयेन कुपितोऽनिलः ।

कस्यचित् कुरुते शोफं सर्पाङ्गाभिहतं तु तत् ॥१९॥

सर्पित, रदित और तीसरा निर्विष काटना। सांप के काटने के समझनेवाले कुछ व्यक्ति सर्पाङ्गाभिहत ( सांप का छू जाना ) भी गिनते हैं। जहाँ पर एक, दो या बहुत से दन्तों के चिह्न गहरे गये, थोड़े रक्तवाले होते हैं, जिन चिह्नों को सांप उलटकर करता है, चञ्चुमालक युक्त, विकार उत्पन्न करनेवाले सूक्ष्म, शोफयुक्त होते हैं, उनको वैद्य सर्पित दंश समझे। जहाँ पर रेखायें सुख या नीली या पीली अथवा श्वेत हों, उसे रदित जानना, यह अल्पविष होता है। जहाँ पर सूजन थोड़ा हो, रक्त थोड़ा दूषित हो, रोगी स्वस्थ रहे, वहाँ पर एक चिह्न या बहुत चिह्न होने पर भी वैद्य इसको निर्विष समझे। डरपोक व्यक्ति में सांप के छूने मात्र से कुपित हुई वायु किसी में सूजन उत्पन्न कर देती है, इसको सर्पाङ्गाभिहत कहते हैं।

वक्तव्य—साँप की दाढ़ ऊपर में दो, प्रत्येक पार्श्व में एक होती है। यह दाढ़ औरों से लम्बी होती है। इनका अग्रभाग कुछ झुका एवं नोकदार होता है। यही विषैला दांत होता है। इसके पीछे एक थैली रहती है। थैली का मुख इस दांत में खुलता है। नीचे की तरफ थैली ऊपर के जवाड़े में रहती है। इसलिये दांत के निशान भ्रण के दोनों ओर (०) (०) एक-एक होते हैं। यदि भ्रण के दोनों ओर दो दो निशान हों तो वह उतना विषैला नहीं होता। सर्पाङ्गाभिहत को चरक में—

“दुर्नमकारे दष्टस्य केनचिद् विषशङ्क्या । विषोद्देगाज्ज्वरश्छर्दि- मृच्छां दाहोऽपि वा भवेत् ॥ ग्लानिमोहोऽतीक्षारो वा प्येतच्छङ्गा- विषं मतम् ॥१४-१६॥

व्याधितोद्दिग्मन्दधानि ज्ञेयान्यल्पविषाणि तु । तथाऽतिवृद्धवालाभिदष्टमल्पविषं स्मृतम् ॥२०॥ सुपर्णदेवब्रह्मर्षियक्षसिद्धनिषेविते । विषदन्तोपधियुक्तं च देशे न क्रमते विषम् ॥२१॥ रोगी या उद्विग्मन् ( घबराये ) हुये सांप से काटे हुष्ट पुरुषों में विष थोड़ा चढ़ता है। इसी प्रकार अति वृद्ध, बालक के काटने पर भी थोड़ा विष चढ़ता है। गरुड़, देवता, ब्रह्मर्षि, यक्ष, सिद्धों से सेवित एवं विषदन्त औषधियुक्त स्थान में विष का संचार नहीं होता ॥२०-२१॥

रथाङ्गलाङ्गलच्छत्रस्वस्तिकाङ्कगुप्धारिणः । ज्ञेया दर्वाकराः सर्पाः फणिनः शीघ्रगामिनः ॥२२॥ मण्डलेर्विषैर्वैश्वित्राः पृथवो मन्दरगामिनः । ज्ञेया मण्डलिनः सर्पा ज्वलनाकंसमप्रभाः ॥२३॥ स्तिग्धा विविधवर्णाभिसित्यर्गमूर्ध्वं च राजिमिः । चित्रिता इव ये भान्ति राजिमन्तस्तु ते स्मृताः ॥२४॥ चक्र, हल, छत्र, स्वस्तिक, अंकुश का चिह्न धारण करनेवाले, फणवाले और शीघ्रगामी सांप दर्वाकर हैं। नानाप्रकार के मण्डलों से चित्रित, चपड़े, धीमे चलनेवाले, अग्नि और सूर्य के समान कान्तिवाले सांप मण्डली हैं। चिकनी, नानाप्रकार के वर्णों की, तिरछी एवं ऊपर पड़ी रेखाओं से चित्रित जो शोभित होते हैं, वे साँप राजिमान् हैं ॥२२-२४॥

मुक्तारूप्यप्रभा ये च कपिला ये च पन्नगाः । सुगन्धयः सुवर्णाभास्ते जात्या ब्राह्मणाः स्मृताः ॥२५॥ क्षत्रियाः स्तिग्धवर्णास्तु पन्नगा भूशकोपनाः । सूर्यचन्द्राकृतिच्छत्रद्वयं तेषां यथाऽन्मुखम् ॥२६॥ कृष्णा वज्रनिभा ये च लोहिता वर्णतस्तथा । धूम्राः पारावताभाश्च वैश्यस्ते पन्नगाः स्मृताः ॥२७॥ महिषद्वीपिवर्णाभास्तथैव पशुवत्त्वचः । भिन्नवर्णाश्च ये केचिच्छूद्रास्ते परिकीर्तिताः ॥२८॥

जो साँप मोती, चाँदी की प्रभा के या जो कपिल वर्ण होते हैं, सुगन्धित होते हैं, सुवर्ण की कान्ति के होते हैं, वे साँप ब्राह्मण जाति के हैं। जो साँप स्तिग्धवर्ण, अतिशयक्रोधी, सूर्य, चन्द्र की आकृति के या छत्र के चिह्नवाले अथवा कमल के चिह्नवाले हैं, वे क्षत्रिय जाति के हैं। काले, वज्र के समान लाल वर्ण के धूम्रवर्ण या पारावत ( धरेलू कबूतर ) के होते हैं वे साँप वैश्य जाति के हैं, भैंस, चीता के वर्ण के, कठोर त्वचा के, नानाप्रकार के चितकबरे रंगों के जो होते हैं, वे साँप शूद्र जाति के हैं।

वक्तव्य— भारतीय संस्कृति में सब विभाग ब्राह्मण, क्षत्रिय,

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० १ ]

वैश्य, शूद्र इसी रूप में किया गया है। अश्रक्त, वज्र आदि को भी, विष को भी उन्होंने इसी रूप में विभक्त किया है। गीता में भी कहा है “चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागाशः” ॥

कोपयन्त्यनिलं जन्तोः फणिनः सर्व एव तु।

पित्तं मण्डलितश्चापि कफं चानेकराजयः ॥२९॥

अपत्यमसवर्णाभ्यां द्विदोषकरलक्षणम्।

ज्ञेयो दोषैश्च दम्पत्योविशेषश्चात्र वदत्ये ॥३०॥

सब फणिश्च (दर्वीकर) सॉप वायु को कुपित करते हैं। मण्डलि सॉप पित्त को और राजिमान् सॉप कफ को कुपित करते हैं। असमानवर्ण माता-पिता की संतान दो दोषों के (संसर्ग रूप में) लक्षणों को उत्पन्न करनेवाली होती है ॥२९, ३०॥

रजन्याः पश्चिमे यामे सर्पाश्चित्राश्चरन्ति हि

श्रेषेषूक्ता मण्डलिनो दिवा दर्वीकराः स्मृताः ॥३१॥

इसमें और मेदों को कहते हैं—रात के पिछले भाग में राजिमान् सर्प घूमते हैं। शेष रात्रि में (रात्रि के पहले दूसरे, तीसरे पहर में) मण्डलि सॉप, दिन में दर्वीकर सॉप घूमते हैं ॥

दर्वीकरास्तु तरुणा वृद्धा मण्डलितस्तथा।

राजिमन्तो वयोमध्ये जायन्ते मृत्युहेतवः ॥३२॥

दर्वीकर सॉप तरुणावस्था में, मण्डलि सॉप वृद्धावस्था में, राजिमान् सॉप मध्यवय में मृत्यु के कारण होते हैं ॥३२॥

नकुलाकुलिता बाला वारिविप्रहृताः कृमाः।

वृद्धा मुक्तत्वचो भीता सर्पास्तत्वपिषाः स्मृता ॥३३॥

नेवले से धवराये, बालक, जल के वेग से ताड़ित, कुश, वृद्ध, केंचुली उतारे, डरे हुए सॉप अल्प विषवाले कहे हैं ॥

चरक में—“वारिविप्रहृताः क्षीणा भीता नकुलनिजिताः।

वृद्धा बालस्तच्चो मुक्ताः सर्पा मन्दविषाः स्मृताः ॥” ॥३३

तत्र, दर्वीकराः—कृष्णसर्पों, महाकृष्णः, कृष्णोदरः, श्वेतकपोतों, महाकपोतों, बलाहक, महासपः, गङ्गकपालों, लोहितताक्षों, गवेधुकः, परिसर्पः, खण्डफणाः, ककुदः पक्षों, महापक्षों, दुर्भपुष्पों, दधिमुखः, पुण्डरीको, भ्रुकुटीमुखों, विष्किरः, पुष्पाभिकीणों, गिरिसर्पः, श्रुजुसर्पः, श्वेतोदरो, महाशिरो, अलगदः, आशीविष इति ( १ ),

मण्डलितस्तु—आदर्शमण्डलः, श्वेतमण्डलो, रक्तमण्डलः चित्रमण्डलः, पृषतो, रोध्रपुष्पों, मिलिन्दको, गोनसों, वृद्धगोनसः पनसों, महापनसों, वेणुपत्रकः, शिशुको, मदनः, पालिन्दिरः, पिङ्गलः, तन्तुकः, पुष्पपाण्डुः, षडङ्गों, अनिकों, बभ्रुः, कषायः, कलुषः पारावतो, हस्ताभरणः, चित्रकः एणीपद इति ( २ );

राजिमन्तस्तु—पुण्डरीको राजिचित्रो, अङ्गुलराजिः, बिन्दुराजिः, कर्दमकः, तृणशोषकः, सर्पपकः, श्वेतहतुः, दुर्भपुष्पश्रक्तको गोधूमकः, किंकिसाद इति ( ३ ),

निर्विषास्तु—गलगोली, शूकपत्रों, अजगरों, दिव्यकों, वर्षाहिकः, पुष्पशकली, ज्योतीरथः, क्षीरिकापुष्पकों, अहिपताकों, अन्धाहिकों, गौराहिकों, वृत्तेशय इति ( ४ ),

वैकरञ्जास्तु त्रयाणां दर्वीकरादीनां व्यतिकराजजाताः तद्यथा—माकुलिः, पोटागलः, स्निग्धराजिरिति। तत्र, कृष्णसर्पण गोनस्यां वैपरीत्येन वा जातो माकुलिः, राजिलेन गोनस्यां वपरीत्येन वा जातः पाटागलः, कृष्णसर्पण राजिमस्यां वैपरीत्येन वा जातः स्निग्धराजिरिति। तेषामाद्यस्य पितृवद्विषोत्कर्षो, द्वयोर्मातृवदित्येके ( ५ );

इनमें ( दर्वीकर सॉप )—कृष्णसर्प, महाकृष्ण, कृष्णोदर, श्वेतकपोत, महाकपोत, बलाहक, महासप, शंखकपाल, लोहितताक्ष, गवेधुक, परिसर्प, खण्डफणा, ककुद, पक्ष, महापक्ष, दम्पुष्प, दधिमुख, पुण्डरीक, भ्रुकुटीमुख, विष्किर, पुष्पाभिकीण, गिरिसर्प, श्रुजुसर्प, श्वेतोदर, महाशिरो, अलगद आशीविष। ( मण्डलि सर्प )—आदर्शमण्डल, श्वेतमण्डल, रक्तमण्डल, चित्रमण्डल, पृषत, रोध्रपुष्प, मिलिन्दक, गोनस, वृद्धगोनस, पनस, महापनस, वेणुपत्रक, शिशुको, मदन, पालिन्दिर, पिङ्गल, तन्तुक, पुष्पपाण्डु, षडङ्ग, अनिक, बभ्रु, कषाय, कलुष, पारावत, हस्ताभरण, चित्रक, एणीपद। राजिमान् सर्प—पुण्डरीक, राजिचित्र, अंगुलराजि, बिन्दुराजि, कर्दमक, तृणशोषक, सर्पपक, श्वेतहतु, दुर्भपुष्प, चित्रक, गोधूमक, किंकिसाद। निर्विषसर्प—गलगोली, शूकपत्रक, अजगर, दिव्यक, वर्षाहिक, पुष्पशकली, ज्योतिरथ, क्षीरिका पुष्पक, अहिपताक, अन्धाहिक, वृत्तेशय। वैकरञ्जसॉप—दर्वीकर आदि तीनों प्रकार के सर्पों में विपरीत जाति से उत्पन्न सॉप यथा—माकुली, पोटागल, स्निग्धराजी। इनमें काले सॉप द्वारा गोनस में विपरीत जाति से या विपरीतता से माकुली उत्पन्न होता है। पोटागल सॉप राजिमान् सॉप से गोनस में या विपरीतता से उत्पन्न होता है। स्निग्धराजी सॉप कृष्ण सर्प से राजिमान् में विपरीतता से उत्पन्न होता है। इनसे पहला सॉप पिता की भाँति तेजस्वी होता है, और शेष दो माता के समान तेजस्वी होते हैं।

वक्तव्य—गोह को भी सर्प जाति में गिना है। सॉप की जीभ बीच में चोरी होने से इसको दिजिहा कहा जाता है। गोह की जीभ भी इसी प्रकार बीच से चिरी होती है, यह भी दिजिहा होने से सर्प में गिनी है ॥१-५॥

त्रयाणां वैकरञ्जानां पुनर्दिन्येलकरोध्रपुष्पकराजिचित्रकपोटागलपुष्पाभिकीणदुर्भपुष्पवेखितकाः सप्तः तेषामाद्याद्यो राजिलवत्, शेषा मण्डलिवत्, एवमेतेषां सर्पाणामशीतिन्याख्याता ॥३४॥

तीनों वैकरञ्ज सॉपों के मेद सात हैं, यथा—दिव्यलक, रोध्रपुष्पक, राजिचित्रक, कपोटागल, पुष्पाभिकीण,

अ० ४ ]

कल्पस्थानम्

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दर्भपुष्प, वेल्लतिक। इनमें पहले तीन का विष राजिमान् सोंपों की भाँति, शेषों का विष मण्डलि के समान होता है। इस प्रकार से अस्सी सोंपों का व्याख्यान हो गया ॥३४॥

तत्र महानेत्रजिह्वास्थिरसः पुमांसः, सूक्ष्मनेत्रजिह्वास्थिरसः क्षियः, उभयलक्षणं मन्दविषा अक्रोधा नपुंसका इति ॥३५॥

इनमें बड़ी नेत्र, जिह्वा मुख और शिरवाले पुरुष जाति हैं। सूक्ष्मनेत्र-जिह्वा-मुख और शिरवाले स्त्री जाति हैं। दोनों जाति के लक्षणधाले, मन्द विष एवं क्रोध रहित नपुंसक हैं ॥३५॥

तत्र सर्वेषां सर्पाणां सामान्यत एव दृष्टलक्षणं वक्ष्यामः। किं कारणं? विषं हि निशितनिश्चिशागनि-हुतवहदेश्यमाशुकारि मुहूर्तमप्युपेक्षितमातुरमतिपातयति, न चावकाशोऽस्ति वाक्समूहमुपसत्तु प्रत्येकमपि दृष्ट-लक्षणेऽभिहिते सर्वत्र त्रैविध्यं भवति, तस्मात् त्रैविध्यमेव वक्ष्यामः, एतद्व्यातुरहितमसंभोहकरं च, अपि चात्रैव सर्वसर्पव्यञ्जनावरोधः ॥३६॥

सब सोंपों के दृष्टलक्षणों को सामान्यरूप में कहेंगे। क्योंकि—विष तीक्ष्ण तलवार की भाँति, विजली, अग्नि के तुल्य शीघ्र व्यापक शील है, मुहूर्तभर (क्षणभर) की उपेक्षा करने से रोगी को मार देता है। वाषी से कहने का भी समय नहीं रहता। प्रत्येक सर्प से काटने पर भी तीन प्रकार के लक्षण होते हैं। इसलिये तीन प्रकार से ही कहेंगे। ये कहे लक्षण रोगी के हितकारी और वैद्य को किसी प्रकार का भ्रम नहीं होने देते। इन्हीं लक्षणों में सब सोंपों के लक्षण आ जाते हैं ॥३६॥

तत्र, दर्वीकरविषेण त्वच्छूनयननखदशनवदनमूत्रपुरीष-दंशकुण्ठत्वं रौक्ष्यं शिरसा गौरवं सन्धिवेदना कटीपृष्ठ-म्रीवादौर्वल्यं जूर्मभ्रंषं वेपथुः स्वरवासादौ घुघुरको जडता शुष्कोद्वारः कासश्वासौ हिक्का वायोरुध्वगमनं शूलोद्वेष्टनं तृष्णा लालाक्षावः फेनागमनं स्रोतोऽवररोध-स्तास्ताश्च वातवेदना भवन्ति, मण्डलिविषेण त्वगादीनां पीतत्वं शीताभिलाषः परिधूपनं दाहस्तृष्णा मदो मूर्च्छा ज्वरः जोगितागमनमूर्ध्वमधश्च मांसातमावशातनं श्वय-शुदंशकोथः पीतरूपदर्शनमाशुकोपस्वारताश्च पित्तवेदना भवन्ति, राजिमद्विषेण शुक्लत्वं त्वगादीनां शीतज्वरो रोमहर्षः स्तब्धत्वं गात्राणामंशोफः सान्द्रकफसेकरुद्ध-द्विरभीदण्मदण्मोः कण्डूः कण्ठे श्वयशुघुर्घुरकं उच्छ्वासा-निरोधस्तमःप्रवेगस्तास्ताश्च कफवेदना भवन्ति ॥३७॥

इनमें—दर्वीकर विष से त्वचा, नख, आँख, दाँत, मुख, मूत्र, मल और दंश स्थान काले पड़ जाते हैं। रुक्षता, शिर में भारीपन, सन्धियों में वेदना, कटि-पीठ-म्रीवा में दुर्बलता,

जम्माई आना, कम्पन, स्वर का बैठना, गले में घर्षराइट, जडता, सूखे उद्वार, कास, श्वास, हिक्का, वायु का ऊपर को जाना, शूल, ऐंटन, प्यास, लाला खाव, क्षाग का आना, स्रोतों का बन्द होना और वातजन्य नाना प्रकार की वेदनायें होती हैं। मण्डलि विष से त्वचा, नख, मल, मूत्र आदि पीले हो जाते हैं। शीत की चाह, परिधूपन (सर्वांग-वन्ताप), दाह, प्यास, मद, मूर्च्छा, ज्वर, रक्त का ऊर्ध्वमार्ग और अशोमार्ग से आना, मांस का विदीर्ण होना, सूजन, दंश का सड़ना, पीले रूपों को देखना, विष का जल्दी कुपित होना, और चित्तजन्य नाना प्रकार की वेदनायें (ओष-चोष आदि) होती हैं। राजि-मान् सर्प से त्वचा, नख आदि श्वेत हो जाते हैं, शीतपूर्वक ज्वर, रोम हर्ष, अङ्गों में जडता, दंश के चारों ओर सूजन, घट्ट कफ का मुख से गिरना, बार-बार वमन, आँखों में कण्डू गले में सूजन, घर्षराइट, श्वास का रुकना, अन्धेरो आना, और कफजन्य नाना प्रकार की वेदनायें होती हैं ॥३७॥

पुरुषाभिदष्ट ऊर्ध्वं प्रेक्षते, अधस्तात् क्षिया, सिराश्वोत्तिष्ठन्ति ललाटे, नपुंसकाभिदष्टस्तित्येकप्रेक्षी भवति, गर्भिण्या पाण्डुमुखो ध्मातश्च, सूतिकया कुक्षि-शुल्कतः सरुधिरं मेहृत्युपजिह्विका चास्य भवति, प्रासा-र्थिनाऽत्रं काङ्क्षति, घुट्टेन चिरान्मन्दाश्च वेगाः, बाले-नाशु मृदवश्च, निर्विषेणाविषलिङ्गं, अन्धाहिकेनान्धत्व-मिल्येके, प्रसनात् अजगरः शरीरप्राणहरो न विषात्। तत्र सद्यःप्राणहराहिदष्टः पतति अन्धाशनिहत इव भूमौ, क्षस्ताङ्गः स्वपिति ॥३८॥

पुरुष सर्प से काटा रोगी ऊपर को देखता है, स्त्री सर्प से काटा रोगी नीचे देखता है, माथे में सिरायें ऊपर आती हैं, नपुंसक सर्प से काटा रोगी तिरछा (पार्श्व में) देखता है। गर्भवती से काटे हुए मनुष्य का मुख पाण्डुवर्ण एवं सूजा (शोथ) होता है। सूतिकां (प्रसव की हुई) सर्पिणी से काटे हुए मनुष्य को उदरशूल होता है, रक्तयुक्त मूत्र आता है, उपजिह्विका रोग हो जाता है। प्रासार्थि सर्प से काटा मनुष्य अब की चाह करता है। घुट्ट सर्प से काटने पर विष का वेग मन्द रहता है, और देर में चढ़ता है। बालक सर्प से काटने पर विष जल्दी चढ़ता है, परन्तु मन्द रहता है। निर्बिष सर्प के काटने पर विष के लक्षण नहीं होते। अन्धे सर्प से काटने पर मनुष्य अन्धा हो जाता है, ऐसा कई मानते हैं। अजगर सर्प निगलने से प्राणनाशक होता है, विष से नहीं होता। परन्तु इनमें प्राणहर सर्प से काटा हुआ मनुष्य-शस्त्र या विजलो से मारे हुए मनुष्य की भाँति तुरन्त जमीन पर गिर पड़ता है, अङ्ग ढीले पड़ जाते हैं, सो जाता है।

वि० मन्तव्य—इन लक्षणों से प्रतीत होता है कि सर्प का

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ४ ]

अन्यान्य मृतों के समान आवेश होता है मृत विद्या नामक तन्त्र (सू० स्था० अ० १४) में नाग भी गिना गया है और नाग सर्प का नाम है तथा उत्तर तन्त्र अ० ६ श्लोक १३ में-सुजङ्गमेन जुष्टः लिखा है और इस रोगी की सब चेष्टायें सर्प के समान लिखी हैं ॥१२॥

तत्र सर्वेषां सर्पाणां विषस्य सप्त वेगा भवन्ति । तत्र दर्वीकराणां प्रथमे वेगे विषं शोणितं दूषयति, तत् प्रदुष्टं कृष्णतामुपैति, तेन काण्यं पिपीलिकापरिसर्पण-मिव चाङ्गे भवति; द्वितीये मांसं दूषयति, तेनात्यर्थं कृष्णता ओफो ग्रन्थयश्चाङ्गे भवन्ति; तृतीये मेदो दूषयति, तेन दंशकलेदः शिरोगौरवं स्वेदश्चलुर्महणं च; चतुर्थे कोष्ठमनुप्रविश्य कफप्रधानान् दोषान् दूषयति, तेन तन्द्वाप्रसेकसन्धिविरलेषा भवन्ति; पञ्चमेऽस्थीन्यनु-प्रविशति प्राणमर्गिनं च दूषयति तेन पर्वमेदो हिक्का दाहश्च भवति; षष्ठे मज्जानमनुप्रविशति ग्रहणीं चात्यर्थं दूषयति, तेन मात्राणां गौरवमतासारो हृत्पीडा मूर्च्छा च भवति, सप्तमे शुक्रमनुप्रविशति व्यानं चात्यर्थं कोपयति कर्कं च सूक्ष्मस्रोतोभ्यः प्रख्यावयति, तेन श्लेष्मवर्तिप्रादुर्भावं कटोपुष्टभङ्गः सर्ववेशविधातो लाळास्वेदयोरतिप्रवृत्तिरुच्छवासनिरोधश्च भवति । मण्डलिनां प्रथमे वेगे विषं शोणितं दूषयति, तत् प्रदुष्टं पीततामुपैति, तत्र परिदाहः पीतावभासता चाङ्गानां भवति; द्वितीये मांसं दूषयति, तेनात्यर्थं पीततापरिदाहो दंशे श्वयथुश्च भवति, तृतीये मेदो दूषयति तेन पूर्ववच्च-लुर्महणं तृष्णा दंशकलेदः स्वेदश्च, चतुर्थे कोष्ठमनुप्रविश्य ज्वरमापादयति, पञ्चमे परिदाहं सर्वगत्रेषु करोति । षष्ठसप्तमयोः पूर्ववत् । राजिमतां प्रथमे वेगे विषं शोणितं दूषयति, तत् प्रदुष्टं पाण्डुतामुपैति, तेन रोमहर्षः शुक्लावभासश्च पुरुषो भवति, द्वितीये मांसं दूषयति तेन पाण्डुताऽत्यर्थं जाळ्यं शिरःशोफश्च भवति; तृतीये मेदा दूषयति, तेन चलुर्महणं दंशकलेदः स्वेदो घ्राणाक्षिसावश्च भवति, चतुर्थे कोष्ठमनुप्रविश्य मन्वास्तम्भं शिरोगौरवं चापादयति, पञ्चमे वाक्मुक्तं शीतज्वरं च करोति, षष्ठसप्तमयोः पूर्ववदिति ॥१३॥

सब प्रकार के सर्पों के विष के सात वेग होते हैं । यथा-दर्वीकर सर्पों के प्रथम वेग में विष रक्त को दूषित करता है, यह दूषित रक्त काला पड़ जाता है । इससे अंगों में कालापन और चिऊंटियों के रेंगने की प्रतीति होती है । विष दूसरे वेग में मांस को दूषित करता है, इससे अतिशय कृष्णता सृजन और अंग में गंठि उत्पन्न हो जाती है । तीसरे वेग में विष मेद को दूषित करता है, इससे दंश स्थान सड़ता है, शिर में भारीपन, पसीना, आँखों से न दीखना होता है । चौथे वेग में

विष कोष्ठ में पहुँचकर कफ प्रधान दोषों को दूषित करता है, इससे तन्द्वा, कफ का मुख से गिरना, सन्धियों में दीलापन होता है । पाँचवें में विष अस्थियों में प्रविष्ट होता है, प्राण और अग्नि को दूषित करता है, इससे पंखों का टूटना, हिक्का और दाह होता है । छठे में विष मज्जा में पहुँचता है और ग्रहणी (पित्तरा कला) को अतिशय दूषित करता है । इससे शरीर के अङ्गों में भारीपन, अतिसार, हृदय में पीड़ा, और मूर्च्छा होती है । सातवें वेग में विष शुक्र में पहुँच जाता है, व्यान वायु को अतिशय कुपित करता है, कफ को सूक्ष्म स्रोतों से निकालता है । इससे घट कफ मुख से निकलता है, कटि-पीठ टूट जाती है, सब चेष्टायें रुक जाती हैं । लाळा और पसीना बहुत आता है, उच्छ्वास (श्वास) रुक जाता है ।

मण्डलि सर्प के प्रथम वेग में विष रक्त को दूषित करता है, यह दूषित रक्त पीला हो जाता है । इससे जलन, अङ्गों में पीलापन हो जाता है । दूसरे वेग में मांस को दूषित करता है इससे अतिशय पीलापन, जलन और दंश में सृजन होती है । तीसरे वेग में मेद को दूषित करता है, इससे दर्वीकर सर्प की भाँति आँखों से न दिखाई देना, तृष्णा, दंश का सड़ना पसीना होता है । चौथे में विष कोष्ठ में पहुँचकर ज्वर उत्पन्न करता है । पाँचवें में विष सब अंगों में दाह करता है । छठे और सातवें वेग के लक्षण दर्वीकर के समान हैं ।

राजिमान्सर्प के प्रथम वेग में विष रक्त को दूषित करता है । यह दूषित रक्त पाण्डुवर्ण (श्वेत) हो जाता है, इससे रोमहर्ष, अंगों में श्वेत वर्ण हो जाता है । दूसरे वेग में विष मांस को दूषित करता है, इससे अतिशय पाण्डुता, जडता और शिरः सृजन होती है । तीसरे में विष मेद को दूषित करता है, इससे अन्वापन, दंश का सड़ना, पसीना, नाक और आँख से साव होता है । चौथे में विष कोष्ठ में पहुँचकर मन्वास्तम्भ और शिर में भारीपन उत्पन्न करता है । पाँचवें में वाणी का अवरोध और शीतज्वर करता है । छठे और सातवें वेग के लक्षण दर्वीकर सर्प की भाँति हैं ॥१३॥

भवन्ति चात्र—

धातवन्तरेषु याः सप्त कलाः संपरिकीर्तिताः ।

तास्वैकैकामतिक्रम्य वेगं प्रकुरुते विषम् ॥१४॥

धातुओं के बीच बीच में जो सात कलायें कही हैं, उनमें से एक एक को अतिक्रमण करके विष, वेग को उत्पन्न करता है ॥

वक्तव्य—रस और रक्त के बीच की कला का अतिक्रमण करने से प्रथम वेग, रक्त और मांस की कला का अतिक्रमण करने से दूसरा वेग, मांस और मेद की कला का अतिक्रमण करने से तीसरा वेग, इसी तरह से आगे । ढल्हण ने—मेद और कफ की कला का अतिक्रमण करने से चौथा, कफ और पुरीष की बीच की कला का अतिक्रमण करने से पाँचवाँ, पुरीष और पित्त की कला का अतिक्रमण

अ० ५ ]

७२

कल्पस्थानम्

५७७

करने से छठा, पित्त और शुक्र की कला का अतिक्रमण करने से सातवाँ वेग माना है। पुरीषधरा कला ही अस्थिधरा कला है, पित्तधरा कला ही मज्जधरा कला है ॥४०॥

येनान्तरेण तु कलां काल्कल्पं भिनत्ति हि। समीरणेनोद्यमानं तत्तु वेगान्तरं स्मृतम् ॥४१॥ वायु से प्रेरित हुआ विष जितने समय में कला को पार करता है, उतने समय को वेगान्तर कहा है ॥४१॥

शुनाङ्कः प्रथमे वेगे पशुध्यायति दुःखितः। लालाखावो द्वितीये तु कृष्णाङ्कः पीड्यते हृदि ॥४२॥ तृतीये च शिरोदुःखं कण्ठग्रीवं च भव्यते। चतुर्थे वेपते मूढः खादन् दन्तान् जहात्यस्मून् ॥४३॥

केचिद्देगत्रयं प्राहुरन्तं चैतेषु तद्विदः। ध्यायति प्रथमे वेगे पक्षी सुहात्यतः परम् ॥४४॥ द्वितीये विह्वलः प्रोक्तस्तृतीये मृत्युभृच्छति।

केचिद्देकं विहङ्क्रेषु विषवेगमुन्नति हि। माजोरनकुलादीनां विषं याति प्रवर्तते ॥४५॥

विष के प्रथम वेग में पशु दुःखी होकर शोक करता है, अंग सूज जाता है। दूसरे वेग में अंग काला पड़ जाता है, मुख से लालाखाव होता है, हृदय में वेदना होती है। तीसरे में शिर में दर्द, कण्ठ और ग्रीवा दूट जाते हैं। चौथे वेग में काँपता है, मूठ हो जाता है, दाँतों को काटता हुआ प्राणों को छोड़ देता है। कई आचार्य पशुओं में तीन ही वेग मानते हैं। विष के प्रथम वेग में पक्षी चिन्ता करता है, मूर्च्छित हो जाता है। इसके आगे दूसरे वेग में बेचैन बन जाता है। तीसरे वेग में मर जाता है। कई आचार्य पक्षियों में विष का एक ही वेग मानते हैं। बिल्ली, नेवले आदि में साँप का विष नहीं चढ़ता ॥४२-४५॥

वक्तव्य—चरक में भी पशुओं में चार और पक्षियों में तीन वेग माने हैं। यथा—“चतुष्पदादीनां स्याच्चतुर्विषः पक्षिणां त्रिविषः ॥च० चि० अ० २३। चरक में विष के वेग आठ माने हैं, यथा—अष्टवेगं दशगुणं चतुर्विंशति उपक्रमम् ॥ इति सुश्रुतसंहितायां कल्पस्थाने सर्पदष्टविषविज्ञानीयं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥

पञ्चमोऽध्यायः ।

अथातः सर्पदष्टविषचिकित्सतं कल्पं व्याख्यास्यामः ॥१॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अब इसके आगे सर्पदष्टविषचिकित्सितकल्प का व्याख्यान करेंगे—जैसा भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥१,२॥

सर्वैरेवादितः सर्पैः शाखादष्टस्य देहिनः। दंशस्योपरि बन्धीयादरिष्टाश्चतुरङ्गुले ॥३॥

प्लोतचर्मान्तर्वल्कानां भुटुनाऽन्यतमेन वै। न गच्छति विषं देहभरिष्टाभिनिवारितम् ॥४॥ सभी साँपों में सबसे प्रथम, हाथ-पैर (शाखाओं) में काटे हुए मनुष्य में दंशस्थान से चार अंगुल ऊपर में एक 'अरिष्टा' बांधनी चाहिये। यह अरिष्टा कपड़े की लीर, चमड़े, वृक्ष की अन्तः छाल अथवा अन्य किसी कोसल वस्तु (रबड़ की नली, रबड़ आदि) से बाँधनी चाहिये। अरिष्टा से रोका हुआ विष ऊपर नहीं चढ़ता ॥

चरक में विष के लिये—दंशात्तु विषं दष्टस्याविर्भूतं वेणिंकां भिषक् बद्ध्वा। निष्पीडयेद्भुशं दंशमुदरेस्मर्मवजं वा ॥ अरिष्टा द्विविधा—मंत्रेण रज्वादिभिर्वा विषोपरिवन्धः ॥ इसके सिवाय चौबीस उपक्रम कहे हैं। यथा—मंत्रारिष्टोक्तर्चननिष्पीडन-चूषणगिनपरिषिकाः। अवगाह्यनरुक्तमोक्षणवमनविरेकोपधानानि ॥ दृढयावरणार्जजननस्य धूम्लेहौषधप्रशमनानि। प्रतिसारणं प्रतिविषं संवस्थापनं लेपः ॥ मृतसंजीवनमेव च विशतिरेते चतुर्भिर्पिषिकाः ॥ च० चि० अ० २३।३३। ३, ४॥

दहेहंमथोत्कृत्य यत्र बन्धो न जायते। आचूषणच्छेददाहाः सर्वत्रैव तु पूजिताः ॥५॥ जहाँ पर अरिष्टा बाँधी नहीं जा सके, वहाँ पर दंश को काटकर स्थान अनि से जला देवे। आचूषण (चूसना), छेदन और दाह यह सब में विषेय हैं। (इसमें मण्डलि साँप में दाह का निषेध है, चूँकि वह पित्त का प्रकोपक है) ॥५॥

प्रतिपूर्व मुखं वस्त्रैर्हितमाचूषणं भवेत्। स दष्टव्योऽथवा सर्पों लोष्टो वाऽपि हि तत्क्षणम् ॥६॥ मुख को वस्त्रों से भरकर चूषण करना उत्तम है। अथवा उसी साँप को तुरन्त काट ले, या मिट्टी के ढेले को तुरन्त काटे। (चरक में—तं दंशं वा चूषयेन्मुखेन यवचूषणं।शुपूर्णेन)।

वि० मन्तव्य—तत्काल सर्प को दष्ट मानव द्वारा काटना—सर्वसाधारण के लिये असम्भव है और भाग जानने पर दुष्कर भी है, परन्तु सपेरे ऐसा कर सकते हैं उनके लिये यह सब सम्भव है ॥ ६ ॥

अथ मण्डलिना दष्टं न कथंचन दाहयेत्। स पित्तबाहुल्यविषाईशो दाहाद्विसर्पते ॥७॥ मण्डलि साँप से काटे हुए व्यक्ति में मूलकर भी दाह न करे। क्योंकि वह दंश पित्त की अधिकता के कारण दाह से फैलता है ॥७॥

अरिष्टासपि मन्त्रैश्च बन्धीयामन्त्रकोविदः। सा तु रज्ज्वादिभिर्वद्वा विषप्रतिकरी मता ॥८॥ मंत्र को जाननेवाला वैद्य अरिष्टा को भी मंत्रों से बाँधे। इस प्रकार रज्जु आदि से बाँधी अरिष्टा विष को रोकती है। (मंत्र के बिना भी बाँधी अरिष्टा विष को रोकती है)।

१७८

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ५ ]

वि० मन्तव्य—अरिष्टा-पट्टी इतनी कसकर बांधनी चाहिये जिससे सिरा में रक्त का स्वाभाविक प्रवाह रुक जाय। जब रक्त रुक जाता है, तो रक्त में मिला विष भी शरीर में नहीं पहुँच पाता। शरीर में विष फैलने-चढ़ने के पूर्व ही अरिष्टा बाँधने से लाभ होता है, और दाह भी तथा आचूषण भी इसी दशा में लाभप्रद होते हैं। और मंत्रों का प्रयोग तो आरोग्य लाभ पर्यन्त किया जाता है। आचूषण यथा सम्भव मुख से करना ही नहीं चाहिये अपितु सिंगी अथवा तुम्भी द्वारा करे और अंगुली अंगूठा आदि पर भी नलिका से आचूषण करे ॥

देवब्रह्मर्षिभिः प्रोक्ता मन्त्राः सत्यतपोमयाः।

भवन्ति नान्यथा क्षिप्रं विषं हन्युः सुदुस्तर्मम् ॥९॥

विषं तेजोमयैर्मन्त्रैः सत्यब्रह्मतपोमयैः।

यथा निवार्यते क्षिप्रं प्रयुक्तैर्न तथौषधैः ॥१०॥

किसी सत्यवादी, तपस्वी, देवर्षि और ब्रह्मर्षियों से कहे हुए मंत्र न्यर्थ नहीं होते। ये मंत्र भयानक विष को भी क्षीम नष्ट कर देते हैं। सत्य परायण, ज्ञानी एवं तपस्वी तथा तेजस्वी ऋषियों के मंत्रों से विष जितनी जल्दी नष्ट होता है, उतनी जल्दी औषधियों से दूर नहीं होता ॥९, १०॥

मन्त्राणां ग्रहणं कार्यं क्षीमांसमधुवर्जिना।

मिताहारिण शुचिना कुत्रास्तरणशायिना ॥११॥

गन्धमाल्योपहारैश्च बलिभिश्चापि देवताः।

पूजयेन्मन्त्रसिद्धयर्थं जपहोमैश्च यत्नतः ॥१२॥

छौ, मांस और मधु ( मद्य ) का सेवन छोड़कर मंत्र को सीखना चाहिये। मंत्र सीखते समय आहार अल्प करना चाहिये, पवित्र (मन-शरीर से) रहना चाहिये, कुशा के विस्तर पर सोना चाहिये। गन्ध, माला, उपहार और बलि से देवताओं का पूजन मंत्र सिद्धि के लिये तथा जप एवं होम से यत्नपूर्वक करना चाहिये।

वक्तव्य—मधु शब्द मद्य के लिये यहाँ है। मधु मद्य का भेद है, यथा मद्यवर्ग में चरक—“रीचनं दीपनं हृद्यं बल्यं पितावरोधि च। विबन्धनं कफनं च मधुलध्वलमाक्षतम् ॥

चरक० सू० अ० २७। १८६ ॥११, १२॥

मन्त्रास्त्वविधिना प्रोक्ता हीना वा स्वरवर्णतः।

यस्मात्त सिद्धिमायान्ति तस्माद्योऽयोऽगदक्रमः ॥१३॥

विना विधि के या स्वर अथवा वर्ण से हीन प्रयुक्त मंत्र सफलता नहीं देते, इसलिये अगद उपचार बरतना चाहिये।

वक्तव्य—महाभाष्य में व्याकरण पढ़ने का प्रयोजन बताते हुए लिखा है कि असुर लोग हे अरयः यह शुद्ध न कहने से (हेलया-हेलया कहते हुए) देवताओं से पराजित हुए। इस-लिये शुद्ध उच्चारण के लिये व्याकरण पढ़े ॥१३॥

समन्ततः सिरा दंगाद्विध्येत् कुण्डलो भिषक्।

शाखाभे वा छलाटे वा व्यध्यास्ता विस्तृते विषे ॥१४॥

रक्ते निहिंयमाणे तु कुत्सनं निहिंयते विषम्।

तस्माद्विज्ञावयेद्भक्तं सा ह्यस्य परमा क्रिया ॥१५॥

समन्तादगदेर्दुर्गं प्रच्छयित्वा प्रलेपयेत्।

चन्दनोशीरयुक्तैनेन वारिणा परिषेचयेत् ॥१६॥

कुशल वैद्य दंश के चारों ओर सिराओं का वेधन करे।

विष के फैल जाने पर सिराओं को हाथ पैर के अग्रभाग में अथवा माथे पर वेधन करे। रक्त के निकलने से सम्पूर्ण विष भी निकल जाता है। इसलिये रक्त का विखावण करे, क्योंकि यही इसकी श्रेष्ठ विक्रिस्ता है। दंश के चारों ओर पाछकर अगदों से लेप करे। चन्दन और खस मिले पानी से परिषेक करे।

वि० मन्तव्य—सिरावेध से रक्त के साथ साथ विष भी निकल जाता है परन्तु शेष विष का शमन अगदों द्वारा भी करना चाहिये ॥१४-१६॥

पाययेतागदास्तंस्तान् क्षीरक्षौद्रघृतादिभिः।

तदलाभे द्विता वा स्यात् कृष्णा बल्मीकमृत्तिका ॥१७॥

कोविदारशिरीषार्ककटभीर्वाऽपि भक्षयेत्।

अगदों को दूध, मधु और घी में मिलाकर पिलाये। अगदों के अभाव में काली मिट्टी या बम्बी की मिट्टी को दूध, घी, मधु के साथ पिलाये। कचनार, शिरीष, आक, कोयल (अपराजिता) इनको खाये ॥१७॥

न पिबेतैलकौलथमद्यसौवीरकाणि च ॥१८॥

द्रवमन्यत्तु यत्किञ्चित् पीत्वा, पीत्वा तदुद्भवेत्।

प्रायो हि वमनेनैव सुखं निहिंयते विषम् ॥१९॥

तैल, कुलर्थी का यूप, मद्य या कांजी को न पीये। इतने विवाय कोई दूसरा द्रव पीपीकर बार बार वमन करे। क्योंकि प्रायः वमन से विष सुखपूर्वक निकल जाता है ॥१८, १९॥

फणिनां विषवेगे तु प्रथमे शोणितं हरेत्।

द्वितीये मधुसर्पिभ्यां पाययेतागदं भिषक् ॥२०॥

नस्यकर्मोञ्जने युष्ज्यात्तृतीये विषनाशने।

वान्तं चतुर्थे पूर्वोक्तां यवागू्मथ दापयेत् ॥२१॥

शोतेपचारं कृत्वाऽऽदौ भिषक् पञ्चमपष्ठयोः।

पाययेच्छोघनं तीक्ष्णं यवागू् चापि कीर्तिताम् ॥२२॥

सप्तमे त्ववपीडेन शिरस्तीक्ष्णेन शोधयेत्।

तीक्ष्णमेवाञ्जनं दद्यात् तीक्ष्णशस्त्रेण मूर्ध्नि च ॥२३॥

कृत्वा काकपदं चर्मं सासुरवा पिजितं क्षिपेत्।

दवीकर मांघों के प्रथम विष वेग में रक्त को निकाले। विष के दूसरे वेग में मधु और घी के साथ अगद को वैद्य

अ० ४ ]

कल्पस्थानम्

४७६

पिलाये । तीसरे वेग में विषनाशक नस्य कर्म और अंजन करे । चौथे वेग में रोगी को वमन करा के स्थावर विष में कही यवागू पीने को देवे । पांचवें और छठे वेग में प्रथम शीतल उपचार करे । फिर तीक्ष्ण विरेचन देकर पूर्वांक यवागू पिलाये । सातवें वेग में तीक्ष्ण अवपीडन नस्य से शिर का शोधन करे, तीक्ष्ण ही अंजन देवे और तीक्ष्ण शस्त्र से शिर पर काकपद बनाकर उसमें रक्त मिश्रित मांस या ताजा चर्म धर देवे, (जिससे विष इसमें आ जाये) ।

वक्तव्य—यह किंवदन्ती है कि रोगी की गुदा पर मुर्गे की गुदा रक्खे । विष से मुर्गा मर जायेगा, फिर दूसरा मुर्गा रक्खे, तीसरा रक्खे, इस प्रकार जब तक मुर्गे मरते जायें, तब तक रक्खे । इस तरह करने से विष निकल जाता है ॥२०-२३॥

पूर्व मण्डलिनां वेगे दर्वाकरवदाचरेत् ॥२४॥ अगदं मधुसर्पिभ्यां द्वितीये पाययेत च । वामयित्वा यवागू च पूर्वात्कामथ दापयेत् ॥२५॥ तृतीये शोधितं तीक्ष्णैर्यवागू पाययेद्विताम् । चतुर्थे पञ्चमे चापि दर्वाकरवदाचरेत् ॥२६॥ काकोल्यादिर्हितः षष्ठे पेयश्च मधुरोऽगदः । हितोऽवपीडे त्वगदः सप्तमे विषनाशनः ॥२७॥

मण्डलि सांप के प्रथम वेग में दर्वाकर सांपों की भांति चिकित्सा करे । दूसरे में अगद को घी मधु के साथ पिलाये । पीछे से पूर्वांक यवागू को पिलाये । तीसरे में तीक्ष्ण विरेचनों से शोधन होने पर यवागू को पिलाये । चौथे और पांचवें वेग में भी दर्वाकर के समान चिकित्सा करे । छठे वेग में काकोल्यादि मधुर गण या अगद पिलाये । सातवें वेग में विषनाशक अगद अवपीडन में उत्तम है ॥२४-२७॥

पूर्वं राजिमतां वेगेऽत्तावृभिः शोणितं हरेत् । अगदं मधुसर्पिभ्यां संयुक्तं पाययेत च ॥२८॥ वान्तं द्वितीये त्वगदं पाययेद्विषनाशनम् । तृतीयादिषु त्रिज्वेवं विधिर्दर्वाकरो हितः ॥२९॥ षष्ठेऽञ्जनं तीक्ष्णतसमवपीडश्च सप्तमे ।

राजिमान् सांपों के प्रथम वेग में तुम्बी से रक्त निकाले । मधु और घी से मिश्रित अगद पीने को देवे । दूसरे वेग में वमन कराके विष नाशक अगद देवे । तीसरे आदि वेगों में दर्वाकर सांपों के समान उपचार बरते । छठे वेग में तीक्ष्ण अंजन और सातवें में अवपीडन, नष्टसंज्ञा उपचार करे ॥२८, २९॥ गभिणीबाल्युद्धानां सिराण्यधनवजितम् ॥३०॥ विषातानां यथोद्दिष्टं विषानं शस्यते मृदु । विष से पीड़ित गर्भवती, बालक या वृद्ध में सिरा वेधन करना निषिद्ध है । इनमें कहे हुए उपचार कोमल रूप में बरते ॥

रक्तावसेकाञ्जनानि नरतुल्यान्यजाविके ॥३१॥ त्रिगुणं महिषे सोष्ट्रे गवाश्चै द्विगुणं तु तत् । चतुर्गुणं तु नागानां, वकरी और भेड़ में रक्तावसेचन, अंजन, मनुष्य के समान है । भैंस और ऊँट में तीन गुने, गाय और बोड़े में दो गुने, हाथियों में चार गुनी मात्रा में बरते ॥३१॥

केवलं सर्वेपक्षिणाम् ॥३२॥ परिषेकान् प्रदेहांश्च सुगीतानवचारयेत् । माषकं त्वञ्जनस्थेष्टं द्विगुणं नस्यतो हितम् ॥ पाने चतुर्गुणं पथ्यं वमनेष्टगुणं पुनः ॥३३॥ पक्षियों में सम्पूर्ण परिषेक और प्रदेह अतिशीतल द्रव्यों से करे । अंजन में मात्रा एक मांसा, नस्य में दुगुनी, पीने में चार गुणी और वमन में आठ गुनी मात्रा पथ्य है ।

वक्तव्य—विष में सदा उत्तम मात्रा का उपयोग होता है । यथा—अहोरात्रादसंदुष्टा या मात्रा परिजीर्यती । सा च कुष्ठविषोन्मादग्रहापस्मारनाशिनी ॥ ( २ ) गुल्मोदावत्संवीसर्प सर्पदंशाभिपीडितैः । उन्मत्तैः कुन्डलुमूत्रैश्च महती शीघ्रमेव सा ॥ कल्क, मोदक, चूर्ण की बड़ी मात्रा एक पल है । वमन द्रव्य की श्रेष्ठ मात्रा तीन पल है । क्वाथ की मात्रा चार पल है ॥

देशप्रकृतिसारम्यतुर्विषवेगबलावलम् । प्रधार्य निपुणं बुद्ध्या ततः कर्म समाचरेत् ॥३४॥ देश, प्रकृति, सत्य, मृदु, वेग, बल, अबल को निपुण बुद्धि से विचारकर पीछे से कार्य करे ॥३४॥

वेगानुपूर्व्यां कर्मात्कर्मिदं विषविनाशनम् । कर्मोवस्थाविशेषेण विषयोरुभयोः श्रृणु ॥३५॥ वेगों के अनुक्रम से यह विष नाशक चिकित्सा कह दी है । अवस्था विशेष से स्थावर और जंगम दोनों विषों की चिकित्सा सुनी ॥३५॥

विवर्णं कठिने शूने सरुजेऽङ्ग्रे विषान्विते । तूर्णं विस्त्रावर्णं कायमुक्तेन विधिना ततः ॥३६॥ विषान्वित अंग में विवर्णता, कठिन्य, सूजन या पीड़ा होने पर तुरन्त कही हुई विधि से रक्तमोक्षण करना चाहिये ॥ सुधार्तमनिलप्रायं तद्विषातं समाहितः । पाययेत रसं सपिः शुक्तं श्लोदं तथा दधि ॥३७॥

फिर मूल लगने पर, वायु को अधिकता होने पर विष रोगी को सावधानों से मांसरस, दही, मधु, घी या शुक्त (तक-कांजी) पिलाये ॥३७॥

रुद्धदाहधर्मसंभोहे पैंतं पैंतविषातुरम् । शौतेः संवाहनस्तानमैदैहैः समुपाचरेत् ॥३८॥ पैतिकविष से पीड़ित पित्तप्रकृति को प्यास, दाह, भीष्म काल होने पर अथवा मूच्छा आने पर शीतल द्रव्यों से संवाहन (मणि, रत्न, कांसी का स्पर्श), स्नान एवं प्रलेप लगाये ॥३८॥

४८०

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ५ ]

शीते शीतप्रसेकार्तै र्लैमिकं कफकृद्धिषम् । वामयेद्वमनैस्तीक्ष्णैस्तथा मूर्च्छामदान्वितम् ॥३६॥

शीतकाल में, शीत प्रसेक से पीड़ित कफ प्रकृति में कफ-कारक विष हो तो उसे तीक्ष्ण वमनों से वमन कराये । मूर्च्छा मदवाले को भी वमन कराये ॥३६॥

कोष्ठदाहुरुधाधमानमूत्रसङ्करुगन्वितम् । विरचेयच्छुक्रुद्धायुसङ्कपित्तातुरं नरम् ॥४०॥

कोष्ठ में दाह, पीड़ा, आम्भान, मूत्रावरोध की पीड़ावाले, मल-वायु के अवरोधवाले, पित्तप्रकृति मनुष्य को विरेचन देवे ॥

शुनाक्षिकृटं निद्रातं विवर्णाविल्लोचनम् । विवर्णं चापि पश्यन्तमञ्जनैः समुपाचरेत् ॥४१॥

पलकों के नीचे जिसमें सृजन आ गई हो, नींद से पीड़ित आँखें विवर्ण और मैली हो गई हों तथा नाना प्रकार के वर्ण जो देखता हो, उसकी अंजनों से चिकित्सा करे ॥ १॥

शिरोरुग्मौरवाल्स्यहनुस्तम्भगलग्रह । जिरो विरेचयेत् क्षिप्रं मन्यास्तम्भे च दारुणे ॥४२॥

नष्टसंज्ञं विवृत्ताक्षं भ्रमन्म्रीवं विरेचनैः । चूर्णैः प्रधमनैस्तीक्ष्णैर्विषातं समुपाचरेत् ॥४३॥

ताडयेच्छ सिराः क्षिप्रं तस्य शाखाललाटजाः । तास्वप्रसिच्यमानासु मूर्ध्नं, शोष्ठं शव्वित् ॥४४॥

कुर्वात् काकपदाकारं व्रणमेवं स्रवन्ति ताः । सरत्कं चर्म मांसं वा निक्षिपेच्छास्य मूर्धनि ॥४५॥

चर्मवृक्षकषायं वा कल्कं वा कुशलो भिषक् । वादयच्छचागदैलिप्त्वा दुन्दुभीस्तस्य पाश्चव्योः ॥४६॥

लब्धसंज्ञं पुनश्चेतमध्वं चाधश्च शोधयेत् । निःशेषं निहरेच्छेचं विषं परमदुर्जयम् ॥४७॥

अल्पमप्यवशिष्टं हि भूयो वेगाय कल्पते । कुर्याद्वा साद्वैवपण्यंवरकासजिरोरुजः ॥४८॥

शोफशोषप्रतिशयायतिमिरारुचिपीनसान् । तेषु चापि यथादोषं प्रतिकर्म प्रयोजयेत् ॥४९॥

विषातौपद्रवाश्चापि यथास्वं समुपाचरेत् । शिरं वेदना, भारीपन, आलस्य, हनुस्तम्भ, गलग्रह, या भयानक मन्यास्तम्भ होने पर तुरन्त शिरोविरेचन देवे । संज्ञा नष्ट होने पर आँखें वाहर (या खुली) आ गई हों, म्रीवा लटक गई हो, उस विषवाले रोगी को तीक्ष्ण प्रधमन चूर्णों से शिरो-विरेचन देवे । शाखा और ललाट में जानेवाली सिराओं पर तुरन्त ताइन (वेधन) करे । उनसे यदि रक्त न आये तो शाख को समझनेवाला वैद्य तुरन्त बाह्र से शिरपर काकपद का चिह्न बनाये । इस प्रकार व्रण करने से उनमें से रक्त बहने लगता है । काकपद व्रण में रक्तवाला चर्म या मांस शिर में रख देवे ।

अथवा चर्म वृक्ष (बामेर । इधेली-गुजराती नाम-इससे चमड़ा रंगते हैं) के कषाय या कल्क को वहाँ रख देवे । रोगी के पास में दुन्दुभि को अगदों से लेपकर बचाये । चेतना आने पर इसे फिर वमन विरेचन देवे । अतिशय दुर्जन्य विष को सम्पूर्णरूप में निकाल देवे । क्योंकि थोड़ा भी बचा विष फिर वेग उत्पन्न करता है । अथवा शिथिलता, विवर्णता, ज्वर, कास, विरोरोग उत्पन्न करता है । शोक, शोष, प्रतिशयाय, तिमिर, अस्चि, पीनस करता है । इनमें भी दोष के अनुसार चिकित्सा करे । विष से पीड़ित व्यक्ति के उपद्रवों की भी चिकित्सा उसके अपने दोषों के अनुसार करनी चाहिये ॥४२-४६॥

अथारिष्टां विमुच्यतासु प्रच्छयित्वाऽङ्कितं तया ॥५०॥ दृष्टान्तर विषं स्कन्तं भूयो वेगाय कल्पते । अरिष्टा को खोलकर दंश स्थान पर पाछकर वहाँ तुरन्त अगदों से लेप करे । क्योंकि वहाँ पर जभा (रुका) विष फिर वेग उत्पन्न कर देता है ॥५०॥

एवमौषधिभिर्मन्त्रैः क्रियायोगैश्च यन्ततः ॥५१॥ विषे हतगुणे देहाद्यदा दोषः प्रकुप्यति । तदा पवनमुद्भवत् स्नेहाद्यैः समुपाचरेत् ॥५२॥ तैलमत्स्यकुलथास्त्वव्यैर्विषहरायुतैः । पित्तज्वरहरैः पित्तं कषायस्तेहवस्तिभिः ॥५३॥ कफमारुवधायेन सक्षौद्रेण गणेन तु । इलैमन्त्रैरगदैश्चैव तिक्तै रूक्षैश्च भोजनैः ॥५४॥

इस प्रकार औषधियों से, मंत्रों से, चिकित्सा के उपचार से शरीर में विष के निकाल देने पर यदि दोष प्रकुपित होता है, तब कुपित (बूस्ते स्थान पर गई) वायु की स्नेहन, वमन, आदि से चिकित्सा करे । इसमें तैल, मछली, कुलथी, खटई (कांजी) को छोड़कर विषनाशक वस्तुओं के साथ स्नेहन, वमन कराये । पित्त को पित्तज्वर नाशक कषाय, स्नेह, वस्ति से शान्त करे । कफ को आरुवधादिगुण में मधु मिलाकर देने से, कफनाशक अगदों से, रूक्ष और तिक्त भोजनों से शान्त करे ॥५१-५४॥

वृक्षप्रपातविषमपतितं मृतमम्भसि । उद्भवद् च मृतं सद्यश्चिकित्सेन्नष्टसंज्ञवत् ॥५५॥ वृक्ष से, प्रपात (नदी तट या झरने से), विषम (ऊँचे) स्थान से गिरे, जल में डूबकर मरे, फाँसी लगाकर मरे मनुष्य की चिकित्सा तुरन्त नष्ट संज्ञा (बेहोश हुए) विधि से करे ॥

गाढं बद्धवेऽरिष्टया प्रच्छिते वा तीक्ष्णैर्लैपैस्तद्विषैर्वाऽवशिष्टैः । शूनं गात्रं किलन्तमत्यर्थपूति ज्रयं मांसं तद्विषात् पूति कष्टम् ॥५६॥

१ इनकी चिकित्सा न्याय वैषक में देखिये ।

३० ५]

कल्पस्थानम्

१८१

अरिष्टा को बहुत कसकर बांधने से, पाछने से, तीक्ष्ण क्षेपों से इसी प्रकार के अन्य कारणों के बचे रहने से, शरीर में सृजन आजाने पर मांस गल जाता है, और इसमें बहुत सडांद होती है। यह विष के कारण सड़ता है, कष्ट साध्य होता है ॥ सद्यो विद्धं निःश्वेतं कृष्णरक्तं

पाकं यायादृष्टते चाप्यभीक्ष्यम्।

कृष्णीभूतं किलन्तमत्यर्थपूति

शीर्णं मांसं यात्यजस्व क्षताच्छ ॥५७॥

तृष्णा मूर्च्छां भ्रान्तिदाहौ स्वरश्च

यस्य स्थुस्तं दिग्धविद्धं व्यवस्थेत ॥

विषैले बाण आदि से वेधन होने पर तुरन्त काला रक्त निकलता है। पक जाता है, बार-बार इसमें जलन होती है। बार-बार पकता भी है। क्षत (व्रण) में से निरन्तर काला, सड़ा, दुर्गन्धवाला मांस निरन्तर गिरता (झड़ता) रहता है। रोगी को प्यास, मूर्च्छा, भ्रान्ति, दाह और ज्वर होता है, जिसमें ये लक्षण हों, उसे विषयुक्त वस्तु से विद्ध हुआ जानें। (भ्रान्तिः-वस्तुनामन्यथा प्रतीतिः) ॥५७॥

पूर्वोद्दिष्टं लक्षणं सर्वभेते-

ज्जुष्टं यस्यालं विषेण व्रणाः स्थुः ॥५८॥

लूतादृष्टा दिग्धविद्धा विषैर्वा

जुष्टाः प्रायस्ते व्रणाः प्रीतिमांसाः।

जिस मनुष्य में शत्रु से अचचारित विष के कारण ये व्रण विशेष रूप में होते हैं, उसमें ये सब पूर्वोक्त लक्षण मिलते हैं। क्योंकि जो व्रण मकड़ी के काटने से, विषैले बाण आदि शस्त्र से या विष से होते हैं, वे ही प्रायः सड़े मांसवाले होते हैं ॥५८॥

तेषां युक्त्या प्रीतिमांसान्यपोक्ष

वार्योकोभिः शोणितं चापहृत्य ॥५९॥

हृत्वा दोषान् क्षिप्रमूर्ध्वं त्वधश्च-

सम्यक् सिद्धेत् क्षोरिणां त्वक्पायैः।

अन्तर्वर्धं दापयेच्च प्रदेहान्

शीतेर्द्रव्यैराज्ययुक्तैर्विषघ्नेः ॥६०॥

इन व्रणों में से युक्ति से सड़े मांसों को निकाल कर, जलो-काओं से रक्त को निकालें। वमन, विरेचन से दोषों को तुरन्त जल्दी से निकालकर बरगद आदि क्षीर वृक्षों की त्वचा के कपाय से सेचन करें। पित्र विषयोंक्त शीतल वीर्य एवं स्पर्श-वाले द्रव्यों को तथा विषनाशक द्रव्यों को घी में मिलाकर इनसे वस्त्र को लपेटकर व्रण के अन्दर देवे। इनसे बने प्रदेह लगाये। (शी-शतघीत घृत ले) ॥५९,६०॥

भिन्ने त्वस्थना दुष्टजातेन कार्यः

पूर्वो मार्गः पैत्तिके यो विषे च।

अस्थि विष के कारण से उत्पन्न व्रण में पूर्वोक्त चिकित्सा करें। पैत्तिक विष की भी चिकित्सा करें।

त्रिबुद्धिशल्ये मधुकं हरिद्रं

रक्ता नरेन्द्रो लवणश्च वर्गः ॥६१॥

कटुत्रिकं चैव सुचूर्णितानि

शृंगे निदध्यान्मधुसंयुतानि।

एषोऽगदो हन्ति विषं प्रयुक्तः

पानाञ्जनाभ्यञ्जननस्ययोगः ॥६२॥

अवार्णवीयो विषवेगहन्ता

महागदो नाम महाप्रभावः।

महागद-निशोय, कलिहारी, मुलेहटी, हल्दी, दाहहल्दी, मजीठ, अमलतास, पाँचों नमक, त्रिकटु (सोठ, मरिच, पीपल) इन सब का बारीक चूर्ण बनाकर मधु में मिलाकर सींग के पात्र में रक्खें। यह अगद-पान, अर्भग, अंजन और नत्य में प्रयोग करने पर विष को नष्ट करता है। इसकी शक्ति अपरा-जित है, विषवेग को नष्ट करने में अद्वितीय है, महाप्रभाव-शाली यह महागद है ॥६१,६२॥

विडंगपाठात्रिफलाजमोदा-

हिङ्गूनि वक्रं त्रिकटूनि चैव ॥६३॥

सर्वश्व वर्गो लवणः सुसूक्ष्मः

सचित्रकः क्षौद्रयुतो निवेयः।

शृङ्गे गवां शृङ्गमयेन चैव

प्रच्छादितः पक्षमुपेक्षितश्च ॥६४॥

एषोऽगदः स्थावरजङ्गमानां

जेता विषाणामजितो हि नाम्ना।

अजित अगद-विडंग, पाठा, त्रिफला, अजवायन, हींग, तगर, त्रिकटु, सब नमक और चित्रक इन सब का बारीक चूर्ण बनाये। इस चूर्ण को मधु के साथ मिलाकर गाय के सींग में रखकर सींग के दक्कन से ही दांप दे। पन्द्रह दिन के पीछे, यह अजित अगद स्थावर और जंगम विषों को नष्ट करनेवाला हो जाता है। इसका नाम अजित अगद है ॥६३,६४॥

प्रपोण्डरीकं सुरदारु मुस्ता

काठानुसायां कटुरोहणी च ॥६५॥

स्थौण्यकध्यामकगुग्गुलूनि

पुन्तागताडीशमुर्वचिकाश्च।

कुटन्तटैलासितसिन्धुवाराः

श्लेययुक्ते तगरं प्रियङ्गुः ॥६६॥

रोध्रं जलं काञ्चनगैरिकं च

समागधं चन्दनसैन्धवं च।

सूरुमाणि चूर्णानि समानि कृत्वा

शृङ्गे निदध्यान्मधुसंयुतानि ॥६७॥

४८२

मुश्रुतसंहिता

[ अ० ५ ]

एषोऽगदस्ताद्यर्थ इति प्रदिष्टो

विषं विह्न्यादापि तक्षकस्य ।

ताद्यर्थ अगद—प्रपोण्डरीक, देवदारु, मुस्ता, कालानुसारी, कुटकी, स्योणेयक, कच्छुण, गुगुलु, नागकेसर, इलायची, श्वेत निर्गुण्डी, तालीशपत्र, सुवर्चिका (हुलहुल), श्योनाक, शिला-रस, कुष्ठ, तगर, प्रियंगु, लोघ, वालक, स्वर्ण गैरिक, पिप्पली, चन्दन, सेन्धव, इनका बारीक चूर्ण बनाकर मधु में मिलाकर सींग में रख देवे । इस अगद का नाम ताद्यर्थ अगद है, यह अगद तक्षक के विष को भी नष्ट कर देता है ॥६५-६७॥

मांसीहरेणुत्रिफलासुरङ्गी-

रक्तालतायष्टिकपद्मकानि ॥६८॥

विडङ्गतालीशसुगन्धि कैला-

स्वकुकुष्ठपत्राणि सचन्दनानि ।

भागीं पटोलं किणिही सपाठा

सृगदनी कर्कटिका पुरश्च ॥६९॥

पालिन्द्यशोको कमुकं सुरस्याः

प्रसूतमारुण्करजं च पुष्पम् ।

सूक्ष्मानि चूर्णानि समानि श्रृङ्गे

न्यसेत् सपित्तानि समाक्षिकाणि ॥७०॥

बराहगोधाशिविशल्लकीनां

माजार्जजं पाषतनाकुले च ।

यस्यागदोऽयं सुकृतो गृहे स्या-

न्तान्तर्षभा नाम नरपभस्य ॥७१॥

न तत्र सपाः कृत एव कोटा-

स्त्यजन्ति वीर्याणि विषाणि चैव ।

एतेन भेयः पटहाश्च दिग्धा

नानद्यमाना विषमाशु हन्युः ॥७२॥

दिग्धाः पताकाश्च निरोक्ष्य सद्यो

विषाभिभूता ह्यविषा भवन्ति ।

श्रृषभ अगद—जटमांसी, हरेणु, त्रिफला, शोभांजन, मंजीठ, लता (प्रियंगु), मुलैहटी, पत्राख, विडंग, तालीशपत्र, सर्पगन्धा, इलायची, दालचीनी, कूट, तेजपत्र, चन्दन, भागीं परवल, चिरचिटा, पाठा, इन्द्रायण, कर्कटिका (कर्कटशृङ्गी), गुगुलु, निशोय, अशोक, सुपारी, तुलसी के फूल, इनका बारीक चूर्ण करके पित्त और मधु के साथ मिलाकर सींग में रख देवे । पित्त-सुअर, गोह, मोर, सेह, बिन्नी, चित्तलहरिण, नेवले का लेना चाहिये । जिस भाग्यवान् राजा के घर में यह श्रृषभ अगद रहता है, वहाँ पर न तो सर्प न कीट बीथं (शक्ति) या विष का त्याग नहीं करते । इस अगद से लेप किये भेरी और नगाड़े बजाने पर विष को शीघ्र नष्ट कर देते हैं । इस अगद से लिप्त पताकाओं को देखकर विष से पीड़ित मनुष्य तुरन्त निरोग हो जाते हैं ॥६८-७२॥

लाक्षा हरेणुनलदं प्रियङ्गः

अिम द्रव्यं यष्टिकगृध्रिकाश्च ॥७३॥

चूर्णांकृतोऽयं रजनीविमिश्रो

सर्पिर्मधुभ्यां सहितो निधेयः ।

श्रृङ्गे गवां पूर्ववदापिधान-

स्ततः प्रयोक्त्योऽञ्जननस्यपानैः ॥७४॥

संजीवनो नाम गतासुकल्पा-

नेषोऽगदो जीवयतीह मर्यान् ।

संजीवन अगद—लाक्षा, हरेणु, जटमांसी, प्रियंगु, मीठा सहजन, कडुआ सहजन, मुलैहटी, बड़ी इलायची, हरदी इनका चूर्ण करके घी और मधु में मिलाकर गाय के सींग में टॉपकर रख देना चाहिये । पन्द्रह दिन पीछे अंजन, नस्य, पान में बरता हुआ संजीवन अगद मृत तुल्य मनुष्यों को भी जीवित कर देता है ॥७३,७४॥

ऋक्षमातकीकटफलमातुलुङ्ग्यः

ऋवेता गिरिहा किणिही सिता च ॥७५॥

सतण्डुलीयोऽगद एष मुख्यो

विषेषु दर्वीकरराजितानाम् ।

लट्टा, कटफल, बिजौरा, कोयल श्वेत, चिरचिटा, शर्करा (सिता-श्वेतवच भी) इनको चौलाई से मिलाकर बनाया अगद, दर्वीकर और राजिमान् सर्पों के विषों में मुख्य है ॥७५॥

द्राक्षा सुगन्धा नगवृत्तिका च

ऋवेता समझा समभागयुक्ता ॥७६॥

देयो द्विभागः सुरसान्छदस्य

कपित्थबिरुवादिपि दाडिमान्च ।

तथाऽर्धभागः सितसिन्धुवारा-

दङ्कोठमूलादिपि गैरिकान्च ॥७७॥

एषोऽगदः क्षौद्रयुतो निहन्ति

विशेषतो मण्डलिनो विषाणि ।

द्राक्षा, सर्पगन्धा, नगवृत्तिका (शल्लकी, अथवा नगमृत्तिका पाठ में पहाड़ की मिट्टी) श्वेत कोयल, मजीठ ये प्रत्येक समान भाग, तुलसी के पत्ते, कैथ बिल्ब, अनार के पत्र-ये प्रत्येक दो दो भाग, श्वेत निर्गुण्डी, अंकोठ मूल और गेरु ये आधा आधा भाग मिलाये । इसमें मधु मिलाकर बनाया यह अगद मण्डलि सर्पों के विष को विशेष रूप में नष्ट करता है ॥७६,७७॥

वंशत्वगाद्रीऽऽमलकं कपित्थं

कटुत्रिकं हैमवती सकुष्ठा ॥७८॥

करञ्जबोजं तगरं शिरीष-

पुष्पं च गोपित्तयुतं निहन्ति ।

विषाणि लूतोन्दुरपन्नगानां

कैटं च लेपाञ्जननस्यपानैः ॥७९॥

पुरीषमृत्रानिलगर्भसङ्गा-

न्तिहन्ति वत्स्यञ्जनान्भिलेपैः ।

अ० ६ ]

कल्पस्थानम्

४८३

काचामर्कोथान् पटलांश्वरोथान्

पुष्पं च हन्त्यञ्जननस्ययोगैः ॥८०॥

गिले बाँस की छाल, आँवला, कैथ, सोंठ, मरिच, पीपल, वच, कूठ, करंज के बीज, तगर, शिरीष के फूल, इनको गाय के पित्त में मिलाये । इसका लेप, अंजन और नस्त्र करने पर मक्की, चूहे, साँप और कीटों का विष नष्ट हो जाता है । वृत्ति, अंजन, नामिलेप से यह मल-मूत्र-वायु के तथा गन्ध के अवरोध की नष्ट करता है । आँख के काच, अर्म्, सडाँद, पटल के भयानक रोगों को और पुष्प को यह अंजन एवं नस्त्र में बरतने से नष्ट करता है ॥७८-८०॥

समूलपुष्पाङ्कुरवल्कबीजात्

क्वाथः शिरीषात् त्रिकदुग्मगाढः ।

सलावणः क्षौद्रयुतोऽथ पीतो

विशेषतः कीटविषं निहन्ति ॥८१॥

शिरीष के मूल, फूल, कोमल पत्ते, लाल, बीज, इनका क्वाथ करके उसमें प्रचुर मात्रा में सोंठ, मरिच, पीपल, मधु और लवण मिलाकर पीने से, यह क्वाथ कीट विषों को विशेष करके नष्ट करता है ॥८१॥

कुष्ठं त्रिकदुक् दावीं मधुकं लवणद्वयम् ।

माळती नागपुष्पं च सर्वाणि मधुराणि च ॥८२॥

कपित्थरसपिष्टोऽयं शर्कराक्षौद्रसंयुतः ।

विषं हन्त्यगदः सर्वं मूषकाणां विशेषतः ॥८३॥

कूठ, त्रिकदु, दारुहल्दी, मुलेहटी, सैन्धव, सौवर्चल, चमेली, नागकेसर, काकोल्यादि मधुराण इनको कैथ के रस के साथ पीसकर शर्करा और मधु में मिलाकर बरतने से यह अगद सब विषों को विशेषकर चूहों के विषों को नष्ट करता है ॥

सोमराजीफलं पुष्पं कटभी सिन्धुवारकः ।

चौरको वरुणः कुष्ठं सर्पगन्धा ससतला ॥८४॥

पुनर्नवा शिरीषस्य पुष्पमारुवर्धार्कजम् ।

स्यामाऽम्बद्याविद्वज्ज्ञानि तथाऽऽम्रासन्तकानि च ॥

भूमौ कुरवकश्चैव गण एकसरः स्मृतः ।

एकजो द्वित्रिशो वाऽपि प्रयोक्तव्यो विषापहः ॥८६॥

बावची, बावची का फूल, श्वेतकोयल, निर्गुण्डी, चौरक, वरणा, कूठ, सर्पगन्धा, ससला (यवतिका), पुनर्नवा, शिरीष का फूल, अमलतास का फूल, आक का फूल, निशोथ, पाठा, विडंग, आम, अश्वमन्तक, वल्मीक की काली मिट्टी, कुरवक (लाल कटसरेया) —इस समूह का नाम एकसर गण है । ये औषध समूह अकेले अकेले या दो दो या तीन तीन मिलाकर बरतने पर भी विष नाशक हैं ॥८४-८६॥

इति सुश्रुतसंहितायां कल्पस्थाने सर्पदण्डविषविकिसितं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥१५॥

षष्ठोऽध्यायः

अथातो दुन्दुभिस्वनीयं कल्पं व्याख्यास्यामः ॥१॥ यथोवाच धन्वन्तरिः ॥२॥

इसके आगे दुन्दुभिस्वनीय कल्प का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥१,२॥

धवाश्रकणं शिरीषतिनशपलाशपिचुमर्दपाटलिपारि - भद्रकाश्रोदुम्बरकरहटकाजुनककुभसर्जकपीतनरुलेष्मात - काङ्क्रेठामलकप्रग्रहकुटजशमीकपित्थासन्तकार्कचिरित्व- महावृक्षारुणकारालुमधुकमधुग्रिधुशकगोर्जुमूर्वाभूर्जति - ल्वकेलुरुकगोपघोण्टारिमेदानां भस्मान्याहृत्य गवां मूत्रेण क्षारकल्पेन परिस्रांय विपचेत् दवाश्चात्र पिपळी- मूलतण्डुलीयकवराङ्गचोचमल्लिघाकरल्लिघाहस्तिपिपळी - मरिचविडंगगृह्यमानन्तासोमसरलाबाह्नीकुगुहाकोशाम्र - श्वेतसर्पवरुणलवणपल्लक्षनिचुलकवज्जलकालवर्धमान - पुत्रश्रेणीसप्तपण्डुकेल्लवालुकनागदन्त्यतिविषाभया - भद्रदारुकुष्ठहरिद्रावचाचूर्णाणि लोहानां च समभागानि, ततः क्षारवदागतपाकमवताय लोहकुम्भे निदध्यात् ॥३॥

धावड़ी, अश्वकणं, शिरीष, साँदन, डाक, नीम, पाटला, फरहद, आम, गूलर, मेनफल, अजुन, ककुभ, सर्ज (राख), कपीतन (पारस पीपल) लसूडा, अंकोट, आँवला, करंज, कूडा, शमी कैथ, अश्वमन्तक, आक, नाटकरंज, सेहण्ड, मिलावा, श्योनाक, मुलेहटी, मीठा सहजन, सागीन, गाजवां, मूर्वा, मूजपत्र, तिल्वक, तालमखाना, गोपण्डा (झनझनिया), अरि- मेद (विटखदिर), इनकी भस्म को लेकर गोमूत्र में क्षार विधि से इक्कीस बार नितारकर पकाये । पकाते समय इनमें—पिप्पलीमूल, चौलाई, दालचीनी, चोच (तज-मोटे छिलके की) मंजीठ, करंज, गजपिपळी, मरिच, विडंग, घर का धुँवासा, सारिवा, कटफल, चौड़, जलबैतस, वेंत, केसर, साल्पणी, कोशाम्र, श्वेतसरसों, वरणा, नमक, पिल्लवन, तगर, हरताल, एरण्ड, द्रवन्ती, (मोगलह एरण्ड), सप्तगण, श्योनाक, एल्लालुक, नागदन्ती (हन्दवारुणी या बड़ा जमाळगोठा), अतीष, हरड, देवदारु, कूठ, हल्दी वच इनको चूर्ण और लोहा-ताम्र आदि के चूर्ण जो मिल सकें, वे मिलाकर क्षार की भाँति पकाये । जब क्षार की भाँति बन जाये तो उतारकर लोहे के घड़े में रख देवे ॥३॥

अनेन दुन्दुभिं लिप्तेत् पताकां तोरणानि च । श्रवणाद्दशनात् स्पर्शात् विषात् संप्रतिमुच्यते ॥४॥

एष क्षारागदो नाम शर्करास्वरुमरीषु च । अश्वसु वातगुल्मेषु कासगुल्लोदरेषु च ॥५॥

अजीर्णं ग्रहणीदोषे भक्तद्वेषे च दारुणे । शोफे सर्वसरे चापि देयः श्वासे च दारुणे ॥६॥

सदा सर्वविषातीनां सर्वश्वेनोपयुज्यते । एष तक्षकमुख्यानामपि दपोङ्कशोडागदः ॥७॥

१८४

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ६ ]

इस अगद से दुन्दुभि, पताका, तोरण पर ठेप करे । इनके सुनने, दर्शन, और स्पर्श करने पर विष से मुक्त हो जाता है । यह क्षार अगद शर्करा, अरमरी, अर्श, वातगुल्म, कास, शूल, उदर, अजीर्ण, ग्रह्यीरोग, और भोजन की भयानक अरुचि में, शोक में; सर्वस्वर शोक में; भयानक श्वास में उत्तम है । सब प्रकार के विषों से पीड़ित पुरुषों में पान, नस्य, अभ्यंग आदि सब में बरता जाता है । तक्षक जिनमें मुख्य है, ऐसे सपों के दर्प के लिये यह अगद अंकुश रूप में है ॥४-७॥

विडङ्गत्रिफलादन्तीभद्रदारुहरेणवः । तालीशपत्रमंडिजघाकेशरोत्पलपद्मकम् ॥८॥ दाडिमं मालतीपुष्पं रजन्मौ सारिवे स्थिरे । प्रियकुस्तगरं कुष्ठं बृहत्सौ चैलवालुकम् ॥९॥ सचन्दनगवाक्षीभिरैतैः सिद्धं विषापहम् । सर्पिः कल्याणकं ह्येतद्ग्रहपस्मारनाशनम् ॥१०॥ पाण्डुवामयगरश्वासमन्दानिञ्चवरकासनुत । ओषिणामल्पशुक्राणां वन्ध्यानां च प्रशस्यते ॥११॥

कल्याणकभूत—विडंग, त्रिफला, दन्ती, देवदारु, हरेण, तालीशपत्र, मंजीठ, केशर, उत्पल (कमल), पद्माख, दाडिमी, चमेली के फूल, हल्दी, दारुहल्दी, सारिवा, काली सारिवा, शालपर्णी, पुश्पिपर्णी, प्रियंगु, तगर, कूठ, बड़ी कटेरी, ऐलवालुक, चन्दन, इन्द्रायण इनसे सिद्ध किया यह कल्याणकभूत विषनाशक, ग्रहनाशक, एवं अपस्मार नाशक है । पाण्डुरोग, गर, श्वास, मन्दगनि, ज्वर, कास नाशक है । शोषरोगी, अलशुक्वाले और वन्याओं के लिये उत्तम है ॥

अपामार्गस्य बीजानि शिरोषस्थ च माषकान् । श्वेतै द्वे काकमाचीं च गवां मूत्रण पेययेत् ॥१२॥ सर्पिरैतैस्तु संसिद्धं विषसंशमनं परम् । अमृतं नाम विख्यातमपि संजोवयेन्मृतम् ॥१३॥ अपामार्गं (चिरचिते) के बीज, शिरीष के बीज, श्वेत और नीलीश्वेता (अपराजिता—कोयल), मकोय इनको गोमूत्र से पीसे । इनसे सिद्ध किया (गोमूत्र में) घृत-विष के नाश करने में श्रेष्ठ है । इस घृत का नाम अमृत घृत है, यह मृत मनुष्य को भी जीवित करता है ॥१३॥

चन्दनगुरूपी कुष्ठं तगरं तिलपर्णिकम् । प्रपौण्डरीकं नलदं सरलं देवदारु च ॥१४॥ भद्रश्रियं यवफलं भागीं नीलीं सुगन्धिकाम् । कालेयकं पद्मकं च मधुकं नागरं जटाम् ॥१५॥ पुन्नागैलैलवालूनि गैरिकं ध्यासकं बलाम् । तोयं सजैरसं मांसीं शतपुष्पां हरैणुकाम् ॥१६॥ तालीशपत्रं जुहूलां प्रियंगुं सकुट्टन्नटाम् । गिलापुष्पं सञ्जैलेयं पत्रं काठानुसारिवाम् ॥१७॥ कटुत्रिकं शीतशिवं कारस्यं कटुरोहिणीम् । सोमराबीमतिविषां, पृथ्विकामिन्द्रवारुणीम् ॥१८॥

उगीरं वरुणं मुस्तं कुस्तुम्बुरु नखं तथा । श्वेतै हरिद्रै स्त्रीण्यं लाक्षां च लवणानि च ॥१९॥ कुमुदोत्पन्नानि पुष्पं चापि तथाऽर्कजम् । चम्पकाशोककुसुमसस्तिल्वकप्रसवानि च ॥२०॥ पाटलीशालमलौशैलुगिरीषाणां तथैव च । कुसुमं तृणमूल्याश्च सुरभीसिन्धुवारजम् ॥२१॥ धवाश्चकर्णपार्थानां पुष्पाणि तिनित्तस्य च । गुग्गुलं कुड्कुमं बिम्बो सर्पाक्षीं गन्धनाकुलीम् ॥२२॥ एतत् संश्रुत्य संभारं सूदमचूर्णानि कारयेत् । गोपितमधुसर्पिभिर्मुक्तं शुक्ले निधापयेत् ॥२३॥ भग्नस्कन्धं विद्युत्ताक्षं मृत्योर्दृष्टान्तरं गतम् । अनेनागदमुख्येन मनुष्यं पुनराहरेत् ॥२४॥ एवोऽनिकल्पं दुर्वारं कुट्टस्यामिततेजसः । विषं नागपतेर्हन्त्यात् प्रसभं वासुकेरपि ॥२५॥ महासुगन्धिनामाऽयं पञ्चचारतीयङ्गसंयुतः । राजाऽगदानां सर्वेषां राज्ञो हस्ते भवेत् सदा ॥२६॥ स्नातानुलिप्तम् नृपो भवेत् सर्वजनप्रियः । श्राजिण्वृत्तां च लभते शत्रुमध्यगतोऽपि सन् ॥२७॥ महासुगन्धि अगद—चन्दन, अगद, कुष्ठ, तगर, हुल्हुल्, प्रपौण्डरीक, उशीरमेद, चीड़, देवदारु, श्वेत चन्दन, यवफला, भागीं, नीली, सर्वगन्धा, कालेयक (पीलाचन्दन), पद्माल, सुलेहटी, सौठ, जटामांसी, नागकेसर, इलायची, ऐलवालुक, गेरु, कस्तूण, बला, बालक, राल, लैलछडीला, सौफ, हरेण, तालीशपत्र, छोटी इलायची, प्रियंगु, केवड़ी मोथा, शिला (मैनसिल), पुष्प (पुष्प कासीस), शिलारस, तेजपत्र, काठानु, सारिवा, निकटु, शितशिव (कर्पूर), गम्भारी, कुटकी, बावची, अतीश, मोटा जीरा, इन्द्रायण, खस, वरणा, मुस्ता, धनिया, नख, श्वेत और नीली अपराजिता, हल्दी, दारुहल्दी, स्त्रीण्य, लाख, पाँचों नमक, कुमुद, उत्पल, नीलाकमल, आक का फूल, चम्पक और अशोक के फूल, तिल्वक के फूल, पाटली-सिम्बल-लसुडा शिरीष इनके भी फूल, केवड़ा, सुरभी (रास्ना या शल्लुकी) और निर्गुण्डी के फल, धव, अश्चकर्ण, अर्जुन और सौंदन के पत्ते, गुग्गुलु, केसर, कन्दूरी, सर्पाक्षी, गन्धनाकुली (सुगन्ध मूल, रास्ना), इन सबको एकत्रित करके इनका सूक्ष्म चूर्ण बनाये । इस चूर्ण को गाय के पिच्छे, मधु और घी में मिलाकर गाय के सींग में रख देवे । कन्धे तिर जाने पर, आँखें खुली रह जाने पर, मृत्यु के पंजे में फँसे हुए मनुष्य को भी इस मुख्य अगद से वापिस खींच लाये । यह अगद अग्नि के समान अप्रतिहतशक्ति कुट्ट के समान महान् तेजस्वी, सपों के राजा वासुकी के विष को नष्ट कर देता है । इसका नाम महासुगन्धि है, इसमें पच्चासी औषधियाँ हैं । यह सब अगदों का राजा है । राजा को सदा हाथ में धारण करना चाहिये । स्नान करके इसका ठेप करने से राजा सब

अ० ७ ७४

कल्पस्थानम्

५८५

जनों का प्रिय होता है। शत्रुओं के बीच में फंसा हुआ भी तेजस्वी रहता है ॥२७॥

उष्णवज्रयो विधिः कार्यों विषार्तानां विजानात।

मुक्त्वा कीटविषं तद्धि शोतेनाभिप्रवर्धते ॥२८॥

विष से पीड़ित व्यक्तियों में उष्ण को छोड़कर सब विधि वरतनी चाहिये। कीटविष में उष्ण विधि वरते, क्योंकि यह कीटविष शीत से बढ़ता है ॥२८॥

अन्नपानविधातुक्तमुपधायं शुभाशुभम्।

शुभं देयं विषार्तभ्यो विरुद्धंभ्यश्च वारयेत् ॥२९॥

फागिर्तं ज़िग्युसौवीरमजीर्णध्यजन् तथा।

वज्रयेच्च समासेन नवधान्यादिकं गणम् ॥३०॥

दिवास्वप्नं न्यवार्यं च न्यायाम् क्रोधमातपम्।

सुरातिलकुल्लथाश्च वज्रयेद्धि विधातुरः ॥३१॥

अन्नपान विधि में कहा हुआ हित-अहित विचार करके विषपीड़ित व्यक्तियों को हितकारी अन्न दे। और विरोधि हानि-कारक वस्तुओं से रोके। रात्रि, सुहाजन, कांजी, अजीर्ण, अध्य-शन, एवं संज्ञेप से नवधान्यादिगण इनसे बचाये। दिन में सोना, मेषुन, व्यायाम, क्रोध, धूप, सुरा, तिल, कुलस्थी इनको विष से पीड़ित व्यक्ति छोड़ देवे ॥२९-३१॥

प्रसन्नदोषं प्रकृतिस्थधातुमन्नाभिकाङ्क्षं समसूत्रजिह्वम्।

प्रसन्नवर्णन्द्रियचित्तचेष्टैवैद्योऽवगच्छेदविषं मनुष्यम् ३२

अविष मनुष्य—स्वभाव में स्थित वातादि दोष, होने पर रसादि धातु और मल अपने स्वभाव में आने पर, अन्न की रूचि होने पर, मन के साथ उचितरूप में रस को ग्रहण करने-वाली जिह्वा के होने पर, वर्ण-इन्द्रिय-चित्त और चेष्टा के प्रसन्न (स्वाभाविक) हो जाने पर, वैद्य मनुष्य को विषरहित जानें ॥

वक्तव्य—विषयुक्त मनुष्य के लक्षण—प्रवृद्धदोषविकृति-स्थधातुमनन्नकाङ्क्षं क्षतसूत्रजिह्वम्। विरुद्धवर्णन्द्रियचित्तचेष्टैवैद्योऽवगच्छेत् सविषं मनुष्यम् ॥ समसूत्रजिह्वम् के स्थान पर “समसूत्रवित्कम्” पाठ हैं वह ठीक है, मल मूत्रमौक रूप में ही।

इति सुश्रुतसंहितायां कल्पस्थाने दुन्दुभिस्त्वनीयकल्प्यो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥६॥

सप्तमोऽध्यायः

अथातो मूषिककल्पं न्याख्यास्यासमः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अब इसके आगे मूषिक कल्प का न्याख्यान करेंगे—जैसा भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥१,२॥

पूर्वं मुक्त्रविषा उक्ता मूषिका ये समासतः।

नामलक्षणभेषज्यैरष्टादश निबोध मे ॥३॥

लालनः पुत्रकः कृष्णो हंसिरश्मिक्वि (क्वि) रस्तथा।

लुच्छन्दुरोऽलसश्चैव कषायदशनोऽपि च ॥४॥

कुलिङ्गश्चाजितश्चैव चपलः कपिलस्तथा।

कोकिलोऽरुणसंज्ञश्च महाकृष्णस्तथोन्दुरः ॥५॥

श्वेतैन महता साधं कपिलेनाखुना तथा।

सूषिकश्च कपोताभस्तथैवाष्टादश स्मृताः ॥६॥

शुक्रविषवाले जो चूहे पहिले संज्ञेप में कहे हैं, वे अठारह हैं। उनके नाम, लक्षण और औषध मुझसे सुनो! लालन, पुत्रक, कृष्ण, हंसिर, चिकिर, लुच्छन्दुर, अलस, कषाय दशन, कुलिंग, अजित, चपल, कपिल, कोकिल, अरुण, महाकृष्ण, उन्दुर, महाश्वेत, कपिल, कपोताभ-ये अठारह चूहे हैं।

वि० मन्तव्य—लालन-स्यात् लालन नामक चूहे वे हैं जो पालतू होते हैं। पुत्रक-स्यात् वे हैं जो बहुत छोटे छोटे होते हैं। यह अन्य चूहों की अपेक्षा छोटे रहते हैं। लुच्छन्दुर-इसी नाम से प्रसिद्ध है, इससे अप्रिय गन्ध आती है। महाकृष्ण-इसे पञ्चाव में “धीस” कहते हैं। यह मिट्टी बहुत खोदता है रात्रिभर में ढेर लगा देता है। चपल-बहुत चञ्चल होता है। महाश्वेत-खरगोश जितना बड़ा होता है, किसी २ बड़े घरों में पाला जाता है और श्वेत वर्ण का, कोमल बालोंवाला, लाल आंखों वाला होता है ॥३-६॥

शुक्रं पतति यत्रैषां शुक्रस्पृष्टैः शृण्वन्ति वा।

नखदन्तनादिभिरस्तस्मिन् गात्रे रक्तं प्रदुष्यति ॥७॥

इन चूहों का शुक्र जहां पर गिर जाता है, शुक्रवाली वस्तु का जहां स्पर्श होता है तथा इनके नख, दांत आदि से उस अंग में रक्त दूषित हो जाता है।

तन्नान्तर में—“शुक्रेणाय पुरीषेण मूत्रेणपि नखैस्तथा। दध्वाभिर्वाक्षिपन्तीह मूषिका पञ्चधा विषम्।

वि० मन्तव्य—चूहे-प्रधानतः शुक्र विष होते हैं परन्तु इनके नख एवं दन्त में भी विष होता है, कुछ चूहे निर्विष भी होते हैं। श्री इल्लन ने किसी तन्त्र का वचन उद्धृत किया है—यथा—“गर्भिण्या मूषिकया दधे अम्लादिबोहवः ऋतुमत्या दधे रक्त मेहनं आध्मानं रतिशीलता च” इत्यादि अर्थात् गर्भ-वती चूही द्वारा काटने पर अम्ल आदि द्रव्यों के सेवन की अभिलाषा, ऋतुमती—रजस्वला चूही द्वारा काटने पर मूत्र में रक्त जाना (नारी का रजस्वला होना) अफरा तथा मेषुन की इच्छा होना आदि २ ॥७॥

जायन्ते प्रन्थयः शोफाः कर्णिका मण्डलानि च।

पीडकोपचयश्चोम्रो विसर्पाः किटिभानि च ॥८॥

पूर्वभेदो रजस्तीत्रा मूर्च्छाऽङ्गसदनं ज्वरः।

दौर्बल्यमरुचिः श्वासो वमयुर्लोमहर्षणम् ॥९॥

दण्डरूपं समासोक्तमेवद्वयासमतः शृणु।

इनके काटने से, गांठें, सूजन, कर्णिका (उभार), मण्डल (चंकुरे), फुसियां उत्पन्न होना, भयानक विसर्प, किटिभ, पूर्वभेद, तीवपीडा, मूर्च्छा, अज्ञों की स्थिलता, ज्वर, दुर्बलता,

४८६

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ७ ]

अरुचि, श्वास, वमन, लोमहर्ष ये संज्ञेप में लक्षण होते हैं। विस्तार से सुनो।

वि० मन्तव्य—ग्रन्थयः—श्लैष्मिक ग्रन्थियों का शोथ शोफ-दष्ट स्थान पर शोथ अथवा व्रणशोथ की उत्पत्ति। कर्णिका कमल के बीज कोश का सा शोथ। लक्षणों पर ध्यान देने से “प्लेग” जिसको “प्रन्थिक ज्वर” कहते हैं, का आभास होता है। यद्यपि एलोपेयी का कथन है कि चूहों का विष-पिस्तुओं द्वारा मानव पर आक्रान्त होता है। जो कुछ होता है तो मूसा का ही विष। प्लेग में ५० प्रतिघात वंक्षण सन्धि की ग्रन्थि का शोथ होता है इस ग्रन्थि का नाम लोहितान्नासमर्प है यथा “ऊरु-मूले लोहितार्शं च” सु० शा० अ० ६-२४। मर्मस्थल का शोथ होने के कारण ही प्लेग इतनी भीषण होती है। यह ग्रन्थिक ज्वर कभी २ मरक के रूप में फैलकर जनपद का विद्वंक्ष्वस कर देता है ॥८,६॥

लालासावो लालनेन हिक्का छर्दिश्च जायते ॥१०॥

तण्डुलीयककल्कं तु लिह्यात्तत्र समाश्रिकम्।

लालन चूहे के कारण लालासाव, हिक्की, वमन होती है। इसमें चौलाई के कल्क को मधु के साथ चाटे ॥१०॥

पुत्रकेणाङ्गसादृशं पाण्डुवर्णश्च जायते ॥११॥

चायते प्रन्थिभिक्षाङ्गमाखुगावकसन्निभैः।

शिरौषेङ्कुककल्कं तु लिह्यात्तत्र समाश्रिकम् ॥१२॥

पुत्रक चूहे से अंगों में शिथिलता, पीलापन, चूहे के बच्चे के समान गांठों से अंग भर जाता है। इसमें शिरस और हिगोट का कल्क मधु के साथ चाटे ॥११,१२॥

कृष्णेन दंशे शोफोऽसुकछर्दिः प्रायश्च दुर्दिने।

शिरौषफलकृष्टं तु पिबेत् किशुकभस्मना ॥१३॥

कृष्ण चूहे से काटने पर शोफ और प्रायः करके बादल आने पर रक्त का वमन होता है। इसमें शिरौष के फल और कूट को ढाक के फूल की भस्म के पानी में घोलकर उसके साथ पिये ॥१३॥

हंसिरेणात्रविद्देषो जम्भा रोम्यां च हर्षणम्।

पिवेदारग्वघादिं तु सुवान्तस्तत्र मानवः ॥१४॥

हंसिर चूहे से अन्न में विद्देष, जम्भाई आना, रोमांच होता है। इसमें भली प्रकार वमन करके आरग्वघादि गण को पिये ॥

चिकि (क्कि) रेण शिरोदुःखं शोफो हिक्का वमिस्तथा।

जालिनीमदनाङ्कोठकषायैर्वाभयेत्तु तम् ॥१५॥

यवनालर्षभीक्षारं बृहत्त्योश्चात्र दापयेत्।

चिकिरि से शिर में वेदना, शोफ, हिक्का, वमन होता है। इसमें कडुईतौरी, मेनफल, अंकोट, इनके कषाय से वमन कराये। इसमें जो के नाल (यवक्षार), कौंच और बड़ी कटेरी का खार मिला देवे ॥१५॥

लुन्तुन्दरेण तृट् छर्दिज्वरो दौर्बल्यमेव च ॥१६॥

ग्रीवास्तम्भः प्रुष्टशोफो गन्धार्धानं विस्मृचिका।

चतस्रं हरीतको शुण्टो विडङ्कं पिप्पली मधु ॥१७॥

अङ्कोठबीजं च तथा पिबेदत्र विषापहम्।

लुन्तुन्दर से प्यास, वमन, ज्वर, दुर्बलता, ग्रीवास्तम्भ, पीठ में सूजन, गन्ध का ज्ञान न होना, विस्मृचिका, होती है। इसमें चव्य, हरड, सोंठ, वायविडंग, पिप्पली, अंकोट के बीज, और मधु पिये। यह विष नाशक है ॥१६,१७॥

ग्रीवास्तम्भोऽलसेनोर्ध्ववायुदंशे रुजाः ज्वरः ॥१८॥

महागदं ससर्पिष्वकं लिह्यात्तत्र समाश्रिकम्।

निद्रा कषायदन्तेन हृच्छोषः काश्यमेव च ॥१९॥

क्षौद्रोपेताः शिरौषस्थ लिह्यात् सारफलत्वचः।

कुलिङ्गेन रुजः शोफो राज्यश्च दंशमण्डले ॥२०॥

सहै ससिन्धुवारे च लिह्यात्तत्र समाश्रिके।

अलस से ग्रीवास्तम्भ ऊर्ध्ववायु, दंश में वेदना, ज्वर होता है। इसमें घी और मधु के साथ महागद को चाटे। कषायदन्त चूहे से नींद का आना, हृदयशोष, कुशता, होती है। इसमें शिरस के सार, फल, छाठ को मधु के साथ चाटे। कुलिङ्ग चूहे से वेदना सूजन एवं दंश स्थान पर रेखायें होती हैं। इसमें मुद्रापणी, माषपणी, सिन्धुवार को मधु के साथ चाटे।

अजितेनाङ्गकृष्णत्वं छर्दिर्मूर्च्छा च हृदग्रहः ॥२१॥

स्तुकक्षीरपिष्टां पालिन्दीं मक्षिष्टां मधुना लिहैत्।

अजित से अङ्ग में कालापन, वमन, मूर्च्छा, हृदग्रह होता है। इसमें थोरके दूध में निशोथ, मजीठ को पीसकर मधु से चाटे ॥२१॥

चपलेन भवेच्छर्दिर्मूर्च्छा च सह तृष्णया ॥२२॥

क्षौद्रेण त्रिफलां लिह्याद्ब्रह्मकाष्ठजटांनविताम्।

चपल से वमन, मूर्च्छा और प्यास होती है। इसमें त्रिफला, देवदारु, जटामांसी को मधु के साथ चाटे ॥२२॥

कपिलेन व्रणे कोथो ज्वरो प्रन्थ्युदमः सतृट् ॥२३॥

लिह्यान्मधुयुतां श्वेतां श्वेतां चापि पुनर्नवाम्।

प्रन्थयः कोकिलेनोष्मा ज्वरो दाहश्च दारुणः ॥२४॥

वर्षाभूनोलिनीकवाथकल्कसिद्धं घृतं पिबेत्।

कपिल से व्रण में सड़ना, ज्वर, गांठों का उत्पन्न होना और प्यास होती है। इसमें श्वेत कोयल और श्वेत पुनर्नवा को चाटे। कोकिल से गांठें, तीब्रज्वर, भयानक दाह होता है। इनमें पुनर्नवा, नीलिनी इसके कवाथ और कल्क से सिद्ध घृत पीये ॥२३,२४॥

अरुणेनात्तिलः कृद्दो वातजान् कुस्ते गदात् ॥२५॥

महाकृष्णेन पित्तं च श्वेतैन कफ एव च।

अ० ७ ]

कल्पस्थानम्

५८७

महता कपिलेनासूक् कपोतेन चतुष्टयम् ॥२६॥

भवन्ति चैषां दंशेषु प्रनियमण्डलकर्णिकाः ।

पिडकोपचयश्रोमः ओफ्फ्ध भुञ्जदारुणः ॥२७॥

दधिक्षीरघृतप्रस्थाद्ययः प्रत्येकशो मताः ।

करञ्जारन्धकशोषवृहत्प्युमतीस्थिराः ॥२८॥

निष्कवाध्य चैषां क्वाथस्य चतुर्थोऽंशः पुतर्भवेत् ।

त्रिवृद्गोत्र्यमृतावक्रमसर्पगन्धाः समृत्तिकाः ॥२९॥

कपित्थदाडिमत्स्वक् च श्लक्ष्णपिष्टाः प्रदापयेत् ।

तत् सर्वमेकतः कृत्वा शनैर्भुङ्गिन्तन्ना पचेत् ॥३०॥

पञ्चानामरुणादीनां विषमेतद्वचपोहति ।

काकादनीकाकमाच्योः स्वरसेष्वथवा कृतम् ॥३१॥

सिराश्च स्वावयेत् प्राप्ताः कुर्यात् संशोधनानि च ।

अरुण से कुपितवायु वातजन्य रोगों को करती है । महा-कृष्ण से पित्त और महाश्वेत से कफ कुपित होता है । महा कपिल से रक्त और कपोत से चारों दोष कुपित होते हैं । इसके दंशस्थान में ग्रन्थियाँ, चकत्ते, कर्णिकायें होती हैं । भयानक फुन्सियों की वृद्धि और अतिशय शोफ होता है । इसके लिये-दही, दूध और घी प्रत्येक एक-एक प्रस्थ, करंज, अमलतास, मरिच, पिप्पली, कटेरी, पुरनपर्णी, शालपर्णी इनका क्वाथ करें । इस क्वाथ में क्वाथ का चौथाई—निशोध, गाजवां गिलोय, तगर, सर्पगन्धा, काली मिट्टी, कैथ की छाल और अनार की छाल बारीक पीसकर पिलाये । इन सबको मधु अग्नि से पकाये । अरुण आदि पांचों चूहों के विष को यह नष्ट करता है । अथवा ककादनी (सफेद घेऊँची) और मकोय के स्वरस में घृत को सिद्ध करें । मर्मस्थान की सिराओं को छोड़कर योग्य स्थानों पर सिरामोक्षण करें, वमन-विरेचन आदि संशोधन देवे ॥

सर्वेषां च विधिः कार्या मूषिकाणां विषेष्वयम् ॥३२॥

सब मूषिकाओं के विष में यह विधि (सिरावेषन, संशोधन) करनी चाहिये ॥३२॥

दग्ध्वा विस्त्रावयेदंशं प्रच्छितं च प्रलेपयेत् ।

शिरीषरजनीकुष्ठकुडकुमैरमृतायुतैः ॥३३॥

अग्नि में गरम क्रिये घी से दंश को जलाये, पाछकर दंश में से रक्त निकाले । दंश पर शिरीष, हल्दी, कुष्ठ, कैसर और गिलोय इनसे लेप करें ॥३३॥

छर्दनं जालिनीक्वाथैः शुकाख्याङ्कोठयोरपि ।

शुकाख्याकोषवत्योश्च मूलं मदन एव च ॥३४॥

जालिनी (कड़ई तुरई जिससे पेर रगड़ते हैं), शुकाख्य (शिरीष या श्योनाक) और अंकोट इनके क्वाथ से वमन कराये ॥३४॥

देवदालीफलं चैव दंशना पीत्वा विषं वसेत् ।

सर्वमूषिकदृष्टानामेष योगः सुखावहः ॥३५॥

फलं चन्ना देवदाली कुष्ठं गोमूत्रपेषितम् ।

पूर्वकल्पेन योज्याः स्युः सर्वान्दुहविषच्छिदः ॥३६॥

शिरीष, कड़ई तुरई, इनकी जड़, मैनफल, कुकड़लता का फल इनको दही के साथ पीकर वमन करें । सब चूहों के दंश में यह योग सुखदायक है । मैनफल, बच्च, कुकड़लता, कूठ इनको गोमूत्र में पीसकर दही के साथ पीना चाहिये । सब चूहों के विष को नष्ट करता है ॥३५, ३६॥

विरेचने त्रिवृद्दन्तीत्रिफलाकल्क इष्यते ।

शिरोविरेचने सारः शिरीषस्य फलानि च ॥३७॥

हितक्षिकदुकाव्यश्च गोमयस्वरसोऽञ्जन ।

विरेचन के लिये निशोध, दन्ती (जमालगोटा) और त्रिफला का कल्क बरता जाता है । शिरोविरेचन के लिये शिरस का सार भाग (मध्य भाग), और फल बरते । सौठ, मरिच, पीपल मिलाकर गोबर के स्वरस का अजन करें ॥३७॥

कपित्थगोमयरसौ लिह्यानमाक्षिकसंयुतौ ॥३८॥

रसाञ्जनहरिद्रेन्द्रयवकटवीषु वा कृतम् ।

प्रातः वातिर्बिर्णं कल्कं लिह्यानमाक्षिकसंयुतम् ॥३९॥

तण्डुलीयकमूलेषु सर्पिः सिद्धं विवेन्नर ।

आस्फोटमूलसिद्धं वा पञ्चकापित्थमेव वा ॥४०॥

कैथ का स्वरस या गोबर के रस को मधु के साथ चाटे । रसौत, हल्दी, इन्द्रजो, कट्टाहिणी इनके कल्क को मधु के साथ खाये । अतोस के कल्क को मधु के साथ प्रातःकाल खाये । चौलाई के मूल से सिद्ध हिथा घृत पीये । सारिवा के मूल में या कैथ के पत्ते, फल, मूल, पुष्प और छाल इनके क्वाथ और क्वाथ में सिद्ध घृत पीये ॥३९-४०॥

मूषिकाणां विषं प्रायः कुधृत्यश्रेष्ठनिर्हृतम् ।

तत्राप्येष विधिः कार्या यश्च दूषीविषापहः ॥४१॥

न निकला हुआ चूहों का विष प्रायः करके बादल आनेपर कुपित होता है । वहाँ पर यही वमन विरेचन, शिरोविरेचन आदि विधि और दूषीविष नाशक उपचार बरतना चाहिये ।

वि० मन्तव्य—प्लेग के ४-५ प्रकोपों में देखा गया कि बादल छाने पर इस रोग से अधिक मानव आक्रान्त होते हैं और माघ, फागुन, एवं चैत्र में जब २ प्लेग का प्रकोप अधिक बढ़ा तब २ बादल, वर्षा, बून्दबान्दी आदि अवश्य हुए थे ॥

स्थिराणां सजतां वाडपि व्रणानां कर्णिकां सिषक् ।

पाटयित्वा यथादोषं व्रणवच्छ्वापि ओषयेत् ॥४२॥

स्थिर (न भरनेवाले) अथवा भरते हुए व्रणों की कर्णिका को वैद्य चौरकर दोष के अनुसार एवं व्रण की अवस्थानुसार चिकित्सा करें ।

वि० मन्तव्य—प्लेग की कर्णिका फोड़ा के समान पकती फूटती है, कभी २ चौरा भी लगाना पड़ता है इस व्रण में सब

५८८

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ७ ]

उपचार-व्रण शोध एवं व्रण के समान ही किये जाते हैं ॥४२॥

इवश्रृगात्तरवृक्षस्याप्रादीनां यदाऽनिलः ।

श्लेष्मप्रदुष्टो मुष्णाति संज्ञां संज्ञावहाश्रितः ॥४३॥

तदा प्रसस्तलाङ्गलहनुस्तुक्ण्धोऽतिलालवान् ।

अत्यर्थबधिरोऽन्धश्च सोऽन्योन्यमभिधावति ॥४४॥

तेनोन्मत्तेन दृष्टस्य दंष्ट्रिणा सविषेष तु ।

सुप्तता जायते दंशे कृष्णं चातिष्ठवत्यसूक् ॥४५॥

दिग्धविद्वस्य लिङ्गेन प्रायशश्चोपलक्षितः ।

कुत्ता, गीदड़, तरलु (लकड़ मकड़), रीछ, व्याघ्र आदि में कफ से दूषित बायु जब संज्ञावह लोता का आश्रय करके सत्रा को नष्ट कर देती है, तब पशुकी पूँछ, हनु और कन्धे बहुत ठीले हो जाते हैं (उसका इनपर वश नहीं रहता), मुख से बहुत लाला बहती है, पशु अन्धा, बहरा हो जाता है, वह एक दूसरे की ओर भागता है। उस पागल विषवाले, दंष्ट्रि पशु के काटने से दंश में सुप्तता (बे भान पन) आ जाती है, और काले रंग का रक्त बहुत बहता है। प्रायः करके विषयुक्त शस्त्र से मारे के समान लक्षण उत्पन्न होते हैं।

वि० मन्तव्य—कुत्ता, सियार आदि उन्मत्त-पागल हो जाते हैं, यह उन्हीं का वर्णन है। “अत्यन्तबधिरोऽन्धश्च” के स्थान में “अन्यत्कबधिरान्धश्च” पाठान्तर है, और यही समीचीन भी है क्योंकि—उन्मत्त कुत्ता पूर्णरूप से न बधिर ही होता है और न अन्ध ही होता है, कुछ २ कभी २ सुनता भी है, हल्का होने पर भाग जाता है, और देखता भी है, लाठी आदि देखकर भाग जाता है। वस्तुतः यह उन्मत्त हो जाता है। ऐसे कुत्ता आदि का विष मानव नहीं पशुओं पर भी प्रभाव डालता है और इस विष से मानव एवं पशु भी उन्मत्त हो जाते हैं और काटने लगते हैं। तथा उन्हीं की सी चेष्टाएँ करने लगते हैं ॥४३-४५॥

यन चापि भवेद्वृष्टस्तस्य चेष्टां स्तं नरः ॥४६॥

बहुशः प्रतिकुर्वान्ः क्रियाहीनो विनश्यति ।

जिस प्राणी से काटा गया हो, यदि उसी प्राणी के समान चेष्टा और शब्द का रोगी बार-बार अनुकरण करता हो, एवं अपनी क्रियायें नष्ट हो गई हों, तो वह मनुष्य मर जाता है ॥४६॥

दंष्ट्रिणा येन दृष्टश्च तद्रूपं यस्तु पश्यति ॥४७॥

अस्यु वा यदि वाऽदृशंऽरिष्टं तस्य विनिर्दिशेत् ।

जिस पशु से मनुष्य काटा गया है, उसी पशु के रूप को यदि रोगी, जल में आईने (दर्पण) में देखता है, उसका अरिष्ट मृत्यु लक्षण समझे (वह मरेगा)।

वि० मन्तव्य—इस दंश के पूर्व यदि चिकित्सा हो जाती है तब कोई विकार नहीं होता ॥४७॥

त्रस्यत्यक्स्माद्योऽभीदणं दृष्ट्वा शृण्ववाऽपि वा जलम् ॥४८॥

जलत्रासं तु विद्यात् रिष्टं तदपि कीर्तितम् ।

जो मनुष्य बिना कारण के सहसा ही जल को देखकर या लूकर डर जाता है, उसको भी रिष्ट-मृत्यु सूचक लक्षण जानना। इस अवस्था को जलत्रास कहते हैं।

वि० मन्तव्य—जलत्रास-पागल कुत्ता आदि द्वारा काटने पर प्रातः जलत्रास हो जाता है। और यह दशा असाध्य है परन्तु यदि वैसे ही जलत्रास हो जाता है तो उसकी चिकित्सा हो सकती है (इल्हणाचार्य) ॥४८॥

अदृष्टो वा जलत्रासी न कथञ्चन सिध्यति ॥४९॥

प्रसुमोऽशोथितो वाऽपि स्वस्थच्छस्तो न सिध्यति ।

अथवा दंष्ट्रि पशु से बिना काटे भी जिसमें जलत्रास के लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं, वह भी अच्छा नहीं होता। सोकर पीछे उठने पर जलत्रास हो, या स्वस्थ अवस्था में जलत्रास हो तो वह भी असाध्य है ॥

वक्तव्य—बिना पशु के काटे भी जलत्रास होता है। यथा-बुद्धिस्थानं यदा श्लेष्मा केवलं प्रतिपद्यते। तदा बुद्धौ निरुद्धाय श्लेष्मणाऽधिष्ठितो नरः। जाग्रत् सुप्तोऽथवाऽऽत्मानं मज्जनस्मिन् मन्यते। सलिले त्रस्यति तदा जलत्रासं तु तं विदुः। श्लेष्मज्जं तत्र कर्तव्यं शोषनं शमनानि च ॥ आहारस्य विधानेन यावत् प्रकृतिं व्रजेत् ॥४९॥

दंशं विज्ञान्य तैर्वृष्टे सर्पिषा परिदाहितम् ॥५०॥

प्रदिद्यादगदैः सर्पिः पुराणं पाययेत् च ।

अर्कक्षीरयुक्तं ह्रास्य दद्याच्छूचपि विशेषधनम् ॥५१॥

श्वेतां पुनर्नवां चास्य दद्याद्धूतूरकायुताम् ।

पल्ललं तिलतैलं च रूपिकायाः पयो गुडः ॥५२॥

निहन्ति विषमालकं मेघबुन्दस्मिवातिलः ।

इन पशुओं के काटने पर दंश को दबाकर रक्त निकालकर घी से जलाये। अगरदों से दंश पर लेप करे और पुराना घूँट पिलाये। आक के दूध से मिला विरेचन इसको देवे। चूर्दरे के साथ श्वेत कोयला और पुनर्नवा को दे। पल्लल (तिलकल्क), तिल तैल और आक का दूध, गुड इनको दे। यह पागल जानवरों के विष को ऐसे नष्ट करती है, जैसे कि वायु, बादलों को नष्ट करता है।

वक्तव्य—घूत स्नेह से गहराई में दाह होता है। यथा—अग्निवसंतो हि स्नेहः सूक्ष्मसिरानुषारिवाद् त्वगादीनुप्रविश्य आगु दहति। तस्मात् स्नेहदग्धोऽधिकारुजो भवति ॥५०॥

वि० मन्तव्य—दृष्टस्थान पर तत्काल लाल मरिच अथवा काठी मिरच पीसकर लेप करे। इससे दो लाभ होते हैं १—पता चल जाता है कि काटनेवाला कुत्ता आदि उन्मत्त है या अथवा नहीं क्योंकि उन्मत्त द्वारा काटने पर दृष्ट स्थान से

अ० ७ ]

कल्पस्थानम्

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सुप्ता अर्थात् शय्यता हो जाती है (श्लो० ४५) फलतः मरिच की तीक्ष्णता का अनुभव होता है। इस दशा में तत्काल उचित चिकित्सा में तत्पर हो जाना चाहिये। २—मरिच उच्चकोटि का विषनाशक अतः प्रारम्भिक उपचार हो जाता है ॥५०-५२॥

मूलस्य शरपुङ्गवाः कर्ष धन्वुराधिकम् ॥५३॥

तण्डुलोदकमादाय पेययेत्तण्डुलेः सह।

उन्मत्तकस्य पत्रैस्तु सचेष्टयापूपकं पचेत् ॥५४॥

खादेदौषधकाले तमलर्कविषद्विषितः।

करोति श्वविकारांस्तु तस्मिन्नीयति चौषधे ॥५५॥

विकाराः शिगिरे याप्या गृहे वारिविबर्जिते।

ततः शान्तविकारस्तु स्नात्वा चैवापरेऽहनि ॥५६॥

शालिषष्टिकयोर्भक्तं क्षोरेणोष्णेन भोजयेत्।

दिनत्रये पञ्चमे वा विधिरेषोऽसमात्रया ॥५७॥

कर्तव्यो भिषजाऽवश्यमलर्कविषनाशनः।

कृप्येत् स्वयं विषं यश्य न स जीवति मानवः ॥५८॥

तस्मात् प्रकोपयेदाशु स्वयं यावत् प्रकृप्यति।

शरपुंवा का मूल एक कर्ष, धन्वुरा आधा कर्ष, इनको चावलों के पानी के साथ चावलों के साथ ही देवे। इसको धन्वुर के पत्तों में पिड़ी की तरह भरकर अपूर (कचौरी) बनाये। इनको पागल पशु के विष से दूषित मनुष्य औषधि के समय में खाये। इस औषधि के पचने पर मनुष्य उन्मत्त कुत्ते की भाँति चेष्टाय करता है। पानी रहित शीतल घर में रोगी को ले जाने से विकार शान्त हो जाते हैं। विकार के शान्त हो जाने पर स्नान कराके दूसरे दिन शाली और साँठी के भात को गरम दूध से खाने को देवे। तीसरे दिन या पाँचवें दिन यही विधि आधी मात्रा में बरते। पागल कुत्ते आदि के विष को नष्ट करने के लिये यह विधि अवश्य वैद्य को करनी चाहिये। जिस मनुष्य में विष स्वयं कुपित हो जाता है, वह नहीं बचता। वह स्वयं कुपित हो, इससे पहिले उस विष को वैद्य कुपित करे। (धन्वुरा खिलाकर रोगी को धूप में रखते हैं, जिससे जल्दी प्रभाव हो)।

वि० मन्तव्य—धन्वुर के बीज एवं पत्र के प्रयोग से उन्माद हो जाता है और 'विषस्य विषं औषधं' के अनुसार जंगम विष में स्थावर विष औषध है जो विषम के प्रभाव को नष्ट कर देता है। विकाराः—विवर्जिते—रोगी के विकारों का थापन (शमन के लिये प्रतीक्षा) ऐसे घर में—स्थान में करनी चाहिये जो शीतल हो परन्तु वहाँ जल न हो अर्थात् वह जल द्वारा शीतल न किया गया हो। हम देखते हैं कि कुत्ते की विष की शान्ति के लिये जो २ अस्पताल बने हैं वे सब ऐसे स्थानों पर बनाए गये हैं, जहाँ जल की अधिकता नहीं है, परन्तु शीतल हैं, यथा—शिमला के पास कुसोली पर्वत। यह

ऊँचा है, शीतल है, परन्तु वहाँ जल के झरने नहीं हैं। पाठक ध्यान से देखें कि ये स्थान भगवान् धन्वन्तरि के उपदेशानुसार चुने गये हैं ॥५३-५८॥

बीजरत्नौषधीगर्भः कुम्भैः शोताम्वुपूरितैः ॥५९॥

स्नापयेत्तं नदीतीरे समन्त्रैर्वा चतुष्यथे।

बलि निवेश तत्रापि पिण्याकं पल्लवं दधि ॥६०॥

माल्यानि च विचित्राणि मांसं पकामकं तथा।

अलकाधिपते यक्ष सारमेयगणाधिप ॥६१॥

अलर्कजुष्टमेतन्मे निर्विषं कुरु माचिरात्।

बीज (तिलादि), रत्न, औषधि इनको जलपात्रों में डालकर इनको शीतल जल से भरकर पागल पशु से काटे मनुष्य को नदी के किनारे या चौराहे पर नहलाये। वहाँ पर तिलखल, तिलकरूक, दही की बलि देकर, नाना प्रकार की मालाएँ, कच्चे एवं पके मांस की बलि देवे। हे अलकाधिपति यक्ष, सारमेयगण के राजा! पागल कुत्ते से काटे हुए मुझको शीघ्र निर्विष करो ॥५९-६१॥

दद्यात् संशोधनं तीक्ष्णमेवं स्नातस्य देहितः ॥६२॥

अशुद्धस्य सुरुढेऽपि त्रणे कुप्यति तद्विषम्।

इस प्रकार स्नान किये व्यक्ति को तीक्ष्ण संशोधन देवे। क्योंकि अशुद्ध व्यक्ति में त्रण के भर जाने पर भी विष कुपित हो जाता है ॥६२॥

श्रादयोऽभिहिता न्याला येऽत्र दृष्ट्वाविषा मया ॥६३॥

अतः करोति दृष्टस्तु तेषां चेष्टां रूतं नरः।

बहुशः प्रतिकुर्वाणोन्चिरान्निग्रयेत् च सः ॥६४॥

यहाँ पर कुत्ते आदि दृष्ट्वाविषवाले जो हिंसक पशु मैंने कहे हैं, उनसे काटा हुआ मनुष्य उनके समान ही चेष्टा और शब्द को करता है। जो बार-बार इनका अनुकरण करता है, वह शीघ्र ही मर जाता है ॥६३,६४॥

नखदन्तक्षतं न्यालैर्येक्तुं तद्विषमर्दयेत्।

सिञ्चैत्तेलेन कोष्णेन ते हि वातप्रकोपाः ॥६५॥

हिंसक पशुओं के नख या दाँतों से जो क्षत बना हो, उसको मल देवे, और गरम सुहाते तेल से सेक करे। क्योंकि ये नख और दाँत वायु को प्रकुपित करते हैं।

वि० मन्तव्य—प्रकृतिस्थ—स्वस्थ—सिंह, बानर आदि के नख एवं दन्त के क्षत में विसर्प अर्थात् क्षतज विसर्प हो जाता है। सींग का क्षत भी नखक्षत के समान समझना चाहिये ॥६५॥

इति सुश्रुतसंहितायां कल्पस्थाने मूषिककल्पे

नाम सप्तमोऽध्यायः ॥७॥

‰€० सुश्रतसंहिता

~ अषमाव्वार्यः

अथातः कोटकस्पं व्याख्यास्यामः ॥१॥ यथोवाच भगवान्‌ धन्वन्तरिः ॥२॥ अव्र इसके आगे कौटकल्प का व्याख्यान करंगे-जेखा

कि भगवान्‌ धन्वन्तरि ने कहा था ।

वि° मन्तव्य--कीट-छोटे २ कीड़े इनके नाम तथा इनके

द्वारा काटने पर होनेवाछे विकार एवं उनको चिकित्छा इस अध्याय में वर्णित है ।१,२॥ सपोणां ज्॒छविण्मूत्र्वपूत्यण्डसंभवाः।

वाय्वग्न्यम्बुप्रकृतयः कीरास्तु विविधाः स्ताः ॥३॥

सवंदोषभ्रकृतिभियुंक्तास्ते परिणामतः

कोरटसत्वेऽपि सुघोराः स्युः सवं एव चतुर्विधाः ॥४॥

खापों के शुक्र मल-मूच-शव के सड़ने से तथा अण्डोँसे

उत्पन्न होनेवाठे, वायु-अग्नि (पित्त), अम्बु (कफ) कौ प्रकृति

के कीर नाना प्रकारके कहे हँ । परिणाम से ये कीट सव

दोर्घो की ग्रकृति से युक्त होते हं । कीट होने पर मी (छे

तुच्छ होने पर भी) ये अति भयानक होते, ये चार प्रकार के हे ॥२,४॥।

कुम्भीनसस्तुण्डिकेरी श्ंगी यतछुटीरकः। उचिटिङ्घोऽग्निनामा च चिच्चिटिगो मयूरिक्ा ॥५॥

आवतेकस्तथोरभः सारिकामुखवेदलो ।

शरावञ्र्दोऽमीराजिः परषिश्िचश्चीषकः ॥६॥ उतवाहुख यश्चापि रक्तराजिश्च को्तितः

अष्टादशेति वायन्याः कोटराः पवनकोपनाः ॥७॥ तेमवन्तोह्‌ दष्टानां योगा बातनिमित्तजाः।

कम्भीनख, वण्डोकेरी, शङ्धी, शतकुखीरक, उच्चिरिग

अग्निनामा, चिच्चिटिग, मयूरिका, आवत्तक, उरभ्र, सारिका,

मुखबदली, शरावकुद, अभिराजि, परुष, चित्रशीधक, तबाह,

रक्तराजी, ये अठारह, कोट वात स्वभावके हे, वायु को

कुपित करते हं । इनके काटने से वातजन्य रोग होते हे ॥५ ७.

छक, वर्ध, किटिभ, सूतच्तीद्ख, कृष्णगोधा, काषायवासिकं गदभक, चोरक, ये तेरह कीट सौम्य एवं कफ़ प्रकोपक है | ,

नके काटने से कफजन्य रोग होते ह ॥ १२-१४॥ |

मण्डलपुच्छकः, तुण्डनाभ, सखषपिका, वल्गकि, शम्बूके, अग्न

कीटये बारह प्राण नाद्यक द| इनके काटने पर सोरपोकी

माति वेग होते है। उखी प्रकारक वेदनायं होती दैः ओए

ये सन्निपात के लक्षण उसन्न करते दे। इनका दंश क्षारया

अग्निसे जलने की माँति-खार, पीठा, श्वेत या काला होता ६॥

{| ञ्वरांगमदरोमाश्चवेदनाभिः समन्वितः ।

विश्वम्भरः पच्चशुक्छः पत्चकृष्णोऽथ कोकिंरः | ॥१२॥ अ* |

सेरेयकः प्रचर्कछो वृर्भः किटिसस्तथा । सुचः छृष्णगोधा यश्च काषायवासिकः ॥१३॥ `

कोटो गदेभकश्चेव तथा त्रोरक्‌ एव च । त्रयोदशेते सोम्याः स्युः कीटः रटेष्मप्रकोपणाः ॥१४॥||

तेभवन्तीह्‌ दष्टानां रोगाः कुनिमित्तजाः |

विश्वम्भरः, पञ्चक, _पञ्चङृष्ण, कोकिल, सैरेयक, प्रच

तुंगीनासो विचिखकस्ताखको वाहकस्तथा ॥१५॥ कोश्ठागारी कृमिकयो यङच सण्डलपुच्छकः

तुण्ड (ङः) नाथः सषेपिको वल्गु लिः शम्बुकस्तथा १६

अग्निकोरश्च विज्ञेया द्वाद प्राणनाशनाः। तेभवन्तीह दष्टानां बेगज्ञानानि सपेवत्‌ ॥१५॥

तास्ताश्च वेदनास्तोना सेगा वे सान्निपातिकाः। क्षाराग्निदग्धवहशो रक्तपीतसितारुणः ॥१८॥

तुगीनाख, विचिखुक, कारक, वादक, कोष्ठ।ग[री, कृमिकर, ।


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छयतीसारतृष्णाश्च दाहो मूच्छा विजम्भिका ॥९९॥

वेपथुश्वासहिक्काश्च दाहः सीत्त च दारुणम्‌ । पिडकोपचयः ओष भ्रन्थयो मण्डलानि च ॥२०॥

द्द्रवः कर्णिकाश्चेव बिसपाः किटमानि च ।

तेभेवन्तीह दष्टानां यथास्वं चाप्युपद्रवाः ॥२१॥

- ~नि 2. ~ == नकन ये ~~ ऋक

- गव दन र

बराह्मणिका, विन्दुक, भ्रमर, बाह्मणिका, विच्चट, कुम्भी, वचः

कीट, अरिमेदक, पद्यकीट

पञ्चाटक) पाकमत्स्य, ङष्णवुण्ड, गदभी, कीत, कृमिखारी, `

उत्क्छेशक, ये चोवीस कौर)पित्तपरकृति के हैँ । इनके काटने

` भे पित्तप्रकोपजन्य रोग होते ई ।=-१२॥ |

कोण्डिन्यकः कृणभको वरटी पवृश्चिकः ॥८॥

विनासिका ्ाद्यणिका बिन्दलो अमरस्तथा ।

वाह्यकी पिच्चिटः छुम्भी वचःकीटोऽरिमेदकः ॥€॥ पद्यकीरोदुन्दुभिको मकरः सतपादकः।

पश्चाटकः पाकमत्स्यः कृष्णतुण्डोऽथ गद्भी ॥१५॥

क्टीतः कृमिसरारी च यश्चाप्युक्छेशक्स्तथा। ` एते ह्यग्निप्रकृतयश्चतुर्विंशतिरेव च ॥११॥

` तेभवन्तीह दष्टानां रोगाः पित्तनिमित्तजाः।

कौण्डिन्य, कंणमक, वरटी, पत्नद्रश्चिक, विनासिका

दुन्दुभिक), मकर, शतपादक

येऽन्ये तेषां विशेषास्तु तूण तेषां समादिशेत्‌ । दूषो विभ्रकोपाच्च तथेव विषङेपनात्‌ ॥२२॥

छग तोद्णविषेष्वेतत्‌

इन काटा के तीच्ण विष मे--उ्वर अङ्गां का टध्न।

रोमांच; वेदनाओं के कारण छदि, अतिसार व्रष्णः; द&

मृच्छां, जम्भाई आना, कम्पन, श्वास, हिक्का, दाहः अति शीत, पिड़काओं की बृद्धि, शोफ, गड) मण्डल, दढ!

काय, बिसपं, किटिभ, इनके काटने से दषो के अपन,

उपद्रव होते द ओर जो अन्य उपद्रव हँ, उनके मेदी $ |

इसी विष के लक्षणों से, विषके आहार से, तीच्ण

लक्षण जाने । वि° मन्तव्य--ये चान्ये--उक्त उपद्रवं क “जवो | जो अन्य उपद्रव हो जाते ह अथवा हौ ज

चिकित्सक शीभ्र जान केव तथा रोगी बतला देवे ओ ध |

„1 कीटो मे डुक दूषीबिषवारे कीट भी ` हँ (उकं (५८ ।

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अ० ८

कल्पस्थानम्

५९९

अमुककाल आदि में प्रकोप होने पर उक्त उपद्रव हो जाते हैं तथा विषैले कीटों का लेप करने पर भी उपद्रव हो जाते हैं जैसे शिरन पर लेप लगाने आदि से शूकदोष हो जाते हैं। परन्तु उक्त ज्वर, अङ्गमर्द आदि लक्षण तीक्ष्ण विषवाले कीटों से उत्पन्न होते हैं और मन्द विषवाले कीटों के विष से उत्पन्न होनेवाले लक्षण नीचे श्लो० २३ में देखिये ॥१६-२२॥

च्छृणु सन्दविषैष्वतः।

प्रसेकारोऽवकच्छद्विशिरोगौरवगोतकाः ॥२३॥

पिडकाकोठकण्डूनां जन्म दोषविभागतः।

मन्द विषों को अब सुनो—मुख से लाळाबाब, अरोचक, वमन, घिर में भारीपन, शीत की न्यूनता, पिडका, कोठ, कण्डू की उत्पत्ति यह लक्षण कीटों के दोषों के अनुसार होते हैं ॥२३॥

योगैर्नानाविधरेषां चूर्णाणि गरमादिशेत् ॥२४॥

दूषीविषप्रकाराणां तथा चाप्यनुलेपनात्।

इन कीटों के नानाप्रकार के योगों से बने हुए चूर्णों को गर कहना चाहिये। इसी प्रकार दूषीविष की भाँति लेप करने से भी इनसे गर विष उत्पन्न होता है।

वि० मन्तव्य—जैसे केसुआ, वीरबहूटी, रेगमाही ( बालू में रहनेवाली मछली एवं साँढा आदि प्राणियों का प्रयोग )—यूनानी चिकित्सानुसार योगों—लेपन एवं खाद्य योगों में किया जाता है वैसे ही यदि उक्त विषैले कृमियों का प्रयोग करने पर विष जनित उपद्रव उत्पन्न हो जाते हैं और वह “गर विष” कहलाता है ॥२४॥

एकजातीनतस्तुर्ध्वं कीटान् वक्ष्यामि भेदतः ॥२५॥

सामान्यतो दृष्टिल्लैः साध्यसाध्यकमेव च।

त्रिकण्टः करिणी चापि हस्तिकक्षोऽपराजितः ॥

चत्वार एते कणभा न्याख्यातास्तीव्रवेदनाः ॥२६॥

तैर्वृष्टस्य श्वयशुरङ्गमर्दो गुरुता गात्राणां दंशः कृणश्च भवति ॥२७॥

इसके आगे एक जातिवाले कीटों को सामान्य भेदों, काटने के लक्षणों से, साथ असाध्य की दृष्टि से कहूँगा। त्रिकण्ट, करिणी, हस्तिकक्ष, अपराजित, ये चार कणभ हैं, इनसे तीव्र वेदना होती है। इनके काटने पर शोथ, अङ्गों का द्रव्घ्ना, अङ्गों में भारीपन और दंशस्थान काला होता है ॥२५-२७॥

प्रतिसूर्यकः, पिङ्गाभासो, बहुवर्णो, निरूपमो गोधेरक इति पञ्च गोधेरकाः; तैर्वृष्टस्य शोफो दाहुरजी च भवतः, गोधेरकेणैतदेव प्रनियम्रादुर्भावो ज्वरश्च ॥२८॥

प्रतिसूर्यक, पिङ्गाभास, बहुवर्ण, निरूपम, गोधेरक ये पाँच गोधेरक हैं। इनके काटने से शोफ, दाह और पीड़ा होती है, गोधेरक से इन लक्षणों के साथ ज्वर और प्रनियमों भी उत्पन्न होती हैं ॥२८॥

गलगोली-श्वेता, कृष्णा, रक्तराजी, रक्तमण्डला, सर्वश्वेता, सर्पपिकेत्येवं षट्। ताभिर्दृष्टे सर्पपिकावज

दाहशोफकलेदा भवन्ति, सर्पपिकया हृदयपीडाऽतिसारश्च, तासु मध्ये सर्पपिका प्राणहरी ॥२९॥

गलगोलिका—श्वेता, कृष्णा, रक्तराजी, रक्तमण्डला सर्वश्वेता, सर्पपिका ये छै हैं। इनके काटने पर सर्पपिका को छोड़कर दाह, सूजन और क्लेद होता है। सर्पपिका से हृदय में पीड़ा और अतिसार होता है। इनके मध्य में सर्पपिका प्राणनाशक है ॥२९॥

अतपद्यस्तु-परुषा, कृष्णा, चित्रा, कपिला, पीतिका, रक्ता, श्वेता, अग्निप्रभा इत्यष्टौ, ताभिर्दृष्टे शोफो वेदना दाहश्च हृदये, श्वेताग्निप्रभाभ्यामेतदेव, दाहो मूर्च्छां चातिमात्रं श्वेतपिडकोत्पत्तिश्च ॥३०॥

शतपदी ( गोजर ) पक्ष, कृष्ण, चित्रा, कपिला, पीतिका, रक्ता, श्वेता, अग्निप्रभा, ये आठ प्रकार की हैं। इनके काटने पर शोफ, वेदना, और हृदय में दाह होता है। श्वेता और अग्निप्रभा से दाह और मूर्च्छा इन लक्षणों के साथ विशेष रूप में होते हैं और श्वेत पिडकायें उत्पन्न होती हैं ॥३०॥

मण्डूकाः—कृष्णः, सारः, कुहको, हरितो, रक्तो, यववर्णाभो, भृकुटी, कोटिकश्चेत्यष्टौ, तैर्वृष्टस्य दंशे कण्डु भैवति पीतफेनागमश्च वक्रन्ता भृकुटीकोटिकाभ्यामेतदेव दाहश्चद्विर्भूच्छां चातिमात्रम् ॥३१॥

मण्डूक ( मेण्डक ) कृष्ण, सार, कुहक, हरित, रक्त, यववर्णाभ, भृकुटी, कोटिक ये आठ हैं। इनके काटने पर दंश में कण्डु होती है, पीछे रंग की झग मुख से आती है। भृकुटी और कोटिक से इन लक्षणों के साथ दाह, वमन और मूर्च्छा अधिक मात्रा में होती है ॥३१॥

विश्वम्भरामिर्दृष्टे दंशः सर्पपाकारामिः पिडकामिः सरुजाभिरचीयते, शीतज्वरातीक्ष्ण पुरुषो भवति ॥३२॥

विश्वम्भराम के काटने पर दंश सरसों के आकार की एवं वेदना करनेवाली पिडकाओं से भरा होता है। रोगी को शीत पूर्वक ज्वर आता है ॥३२॥

अहिण्डुकाभिर्दृष्टे तोददाहकण्डुश्वयश्वो भवन्ति सोहन्न, कण्डुमकाभिर्दृष्टे पीताङ्गरुखीतीसारज्वरादिभिरभिहन्त्यते, शूकघ्नताभिर्दृष्टे कण्डकोटाः प्रवर्धन्ते शूकं चान्न लक्ष्यते ॥३३॥

अहिण्डुका के काटने पर तोद, दाह, कण्डु, श्वयश्व और मूर्च्छा होती है। कण्डुमका के काटने पर रोगी के अङ्ग पीछे पड़ जाते हैं, वमन, अतिसार, ज्वर आदि के कारण रोगी मर जाता है। शूक घ्नत के काटने पर कण्डु और कोठ बढ़ते हैं, और दंश स्थान पर शूक ( डंक ) दिखाई देता है ॥३३॥

पिपीलिकाः—स्थूलशीर्षा, संवाहिका, ब्राह्मणिका, अकुलिका, कपिलिका, चित्रवर्णति षट्, ताभिर्दृष्टे दंशे श्वयशुरग्निसर्पशंवादाहशोफो भवतः ॥३४॥