सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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कल्पस्थानम्
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अरिष्टा को बहुत कसकर बांधने से, पाछने से, तीक्ष्ण क्षेपों से इसी प्रकार के अन्य कारणों के बचे रहने से, शरीर में सृजन आजाने पर मांस गल जाता है, और इसमें बहुत सडांद होती है। यह विष के कारण सड़ता है, कष्ट साध्य होता है ॥ सद्यो विद्धं निःश्वेतं कृष्णरक्तं
पाकं यायादृष्टते चाप्यभीक्ष्यम्।
कृष्णीभूतं किलन्तमत्यर्थपूति
शीर्णं मांसं यात्यजस्व क्षताच्छ ॥५७॥
तृष्णा मूर्च्छां भ्रान्तिदाहौ स्वरश्च
यस्य स्थुस्तं दिग्धविद्धं व्यवस्थेत ॥
विषैले बाण आदि से वेधन होने पर तुरन्त काला रक्त निकलता है। पक जाता है, बार-बार इसमें जलन होती है। बार-बार पकता भी है। क्षत (व्रण) में से निरन्तर काला, सड़ा, दुर्गन्धवाला मांस निरन्तर गिरता (झड़ता) रहता है। रोगी को प्यास, मूर्च्छा, भ्रान्ति, दाह और ज्वर होता है, जिसमें ये लक्षण हों, उसे विषयुक्त वस्तु से विद्ध हुआ जानें। (भ्रान्तिः-वस्तुनामन्यथा प्रतीतिः) ॥५७॥
पूर्वोद्दिष्टं लक्षणं सर्वभेते-
ज्जुष्टं यस्यालं विषेण व्रणाः स्थुः ॥५८॥
लूतादृष्टा दिग्धविद्धा विषैर्वा
जुष्टाः प्रायस्ते व्रणाः प्रीतिमांसाः।
जिस मनुष्य में शत्रु से अचचारित विष के कारण ये व्रण विशेष रूप में होते हैं, उसमें ये सब पूर्वोक्त लक्षण मिलते हैं। क्योंकि जो व्रण मकड़ी के काटने से, विषैले बाण आदि शस्त्र से या विष से होते हैं, वे ही प्रायः सड़े मांसवाले होते हैं ॥५८॥
तेषां युक्त्या प्रीतिमांसान्यपोक्ष
वार्योकोभिः शोणितं चापहृत्य ॥५९॥
हृत्वा दोषान् क्षिप्रमूर्ध्वं त्वधश्च-
सम्यक् सिद्धेत् क्षोरिणां त्वक्पायैः।
अन्तर्वर्धं दापयेच्च प्रदेहान्
शीतेर्द्रव्यैराज्ययुक्तैर्विषघ्नेः ॥६०॥
इन व्रणों में से युक्ति से सड़े मांसों को निकाल कर, जलो-काओं से रक्त को निकालें। वमन, विरेचन से दोषों को तुरन्त जल्दी से निकालकर बरगद आदि क्षीर वृक्षों की त्वचा के कपाय से सेचन करें। पित्र विषयोंक्त शीतल वीर्य एवं स्पर्श-वाले द्रव्यों को तथा विषनाशक द्रव्यों को घी में मिलाकर इनसे वस्त्र को लपेटकर व्रण के अन्दर देवे। इनसे बने प्रदेह लगाये। (शी-शतघीत घृत ले) ॥५९,६०॥
भिन्ने त्वस्थना दुष्टजातेन कार्यः
पूर्वो मार्गः पैत्तिके यो विषे च।
अस्थि विष के कारण से उत्पन्न व्रण में पूर्वोक्त चिकित्सा करें। पैत्तिक विष की भी चिकित्सा करें।
त्रिबुद्धिशल्ये मधुकं हरिद्रं
रक्ता नरेन्द्रो लवणश्च वर्गः ॥६१॥
कटुत्रिकं चैव सुचूर्णितानि
शृंगे निदध्यान्मधुसंयुतानि।
एषोऽगदो हन्ति विषं प्रयुक्तः
पानाञ्जनाभ्यञ्जननस्ययोगः ॥६२॥
अवार्णवीयो विषवेगहन्ता
महागदो नाम महाप्रभावः।
महागद-निशोय, कलिहारी, मुलेहटी, हल्दी, दाहहल्दी, मजीठ, अमलतास, पाँचों नमक, त्रिकटु (सोठ, मरिच, पीपल) इन सब का बारीक चूर्ण बनाकर मधु में मिलाकर सींग के पात्र में रक्खें। यह अगद-पान, अर्भग, अंजन और नत्य में प्रयोग करने पर विष को नष्ट करता है। इसकी शक्ति अपरा-जित है, विषवेग को नष्ट करने में अद्वितीय है, महाप्रभाव-शाली यह महागद है ॥६१,६२॥
विडंगपाठात्रिफलाजमोदा-
हिङ्गूनि वक्रं त्रिकटूनि चैव ॥६३॥
सर्वश्व वर्गो लवणः सुसूक्ष्मः
सचित्रकः क्षौद्रयुतो निवेयः।
शृङ्गे गवां शृङ्गमयेन चैव
प्रच्छादितः पक्षमुपेक्षितश्च ॥६४॥
एषोऽगदः स्थावरजङ्गमानां
जेता विषाणामजितो हि नाम्ना।
अजित अगद-विडंग, पाठा, त्रिफला, अजवायन, हींग, तगर, त्रिकटु, सब नमक और चित्रक इन सब का बारीक चूर्ण बनाये। इस चूर्ण को मधु के साथ मिलाकर गाय के सींग में रखकर सींग के दक्कन से ही दांप दे। पन्द्रह दिन के पीछे, यह अजित अगद स्थावर और जंगम विषों को नष्ट करनेवाला हो जाता है। इसका नाम अजित अगद है ॥६३,६४॥
प्रपोण्डरीकं सुरदारु मुस्ता
काठानुसायां कटुरोहणी च ॥६५॥
स्थौण्यकध्यामकगुग्गुलूनि
पुन्तागताडीशमुर्वचिकाश्च।
कुटन्तटैलासितसिन्धुवाराः
श्लेययुक्ते तगरं प्रियङ्गुः ॥६६॥
रोध्रं जलं काञ्चनगैरिकं च
समागधं चन्दनसैन्धवं च।
सूरुमाणि चूर्णानि समानि कृत्वा
शृङ्गे निदध्यान्मधुसंयुतानि ॥६७॥