सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 636, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ें४८०
सुश्रुतसंहिता
[ अ० ५ ]
शीते शीतप्रसेकार्तै र्लैमिकं कफकृद्धिषम् । वामयेद्वमनैस्तीक्ष्णैस्तथा मूर्च्छामदान्वितम् ॥३६॥
शीतकाल में, शीत प्रसेक से पीड़ित कफ प्रकृति में कफ-कारक विष हो तो उसे तीक्ष्ण वमनों से वमन कराये । मूर्च्छा मदवाले को भी वमन कराये ॥३६॥
कोष्ठदाहुरुधाधमानमूत्रसङ्करुगन्वितम् । विरचेयच्छुक्रुद्धायुसङ्कपित्तातुरं नरम् ॥४०॥
कोष्ठ में दाह, पीड़ा, आम्भान, मूत्रावरोध की पीड़ावाले, मल-वायु के अवरोधवाले, पित्तप्रकृति मनुष्य को विरेचन देवे ॥
शुनाक्षिकृटं निद्रातं विवर्णाविल्लोचनम् । विवर्णं चापि पश्यन्तमञ्जनैः समुपाचरेत् ॥४१॥
पलकों के नीचे जिसमें सृजन आ गई हो, नींद से पीड़ित आँखें विवर्ण और मैली हो गई हों तथा नाना प्रकार के वर्ण जो देखता हो, उसकी अंजनों से चिकित्सा करे ॥ १॥
शिरोरुग्मौरवाल्स्यहनुस्तम्भगलग्रह । जिरो विरेचयेत् क्षिप्रं मन्यास्तम्भे च दारुणे ॥४२॥
नष्टसंज्ञं विवृत्ताक्षं भ्रमन्म्रीवं विरेचनैः । चूर्णैः प्रधमनैस्तीक्ष्णैर्विषातं समुपाचरेत् ॥४३॥
ताडयेच्छ सिराः क्षिप्रं तस्य शाखाललाटजाः । तास्वप्रसिच्यमानासु मूर्ध्नं, शोष्ठं शव्वित् ॥४४॥
कुर्वात् काकपदाकारं व्रणमेवं स्रवन्ति ताः । सरत्कं चर्म मांसं वा निक्षिपेच्छास्य मूर्धनि ॥४५॥
चर्मवृक्षकषायं वा कल्कं वा कुशलो भिषक् । वादयच्छचागदैलिप्त्वा दुन्दुभीस्तस्य पाश्चव्योः ॥४६॥
लब्धसंज्ञं पुनश्चेतमध्वं चाधश्च शोधयेत् । निःशेषं निहरेच्छेचं विषं परमदुर्जयम् ॥४७॥
अल्पमप्यवशिष्टं हि भूयो वेगाय कल्पते । कुर्याद्वा साद्वैवपण्यंवरकासजिरोरुजः ॥४८॥
शोफशोषप्रतिशयायतिमिरारुचिपीनसान् । तेषु चापि यथादोषं प्रतिकर्म प्रयोजयेत् ॥४९॥
विषातौपद्रवाश्चापि यथास्वं समुपाचरेत् । शिरं वेदना, भारीपन, आलस्य, हनुस्तम्भ, गलग्रह, या भयानक मन्यास्तम्भ होने पर तुरन्त शिरोविरेचन देवे । संज्ञा नष्ट होने पर आँखें वाहर (या खुली) आ गई हों, म्रीवा लटक गई हो, उस विषवाले रोगी को तीक्ष्ण प्रधमन चूर्णों से शिरो-विरेचन देवे । शाखा और ललाट में जानेवाली सिराओं पर तुरन्त ताइन (वेधन) करे । उनसे यदि रक्त न आये तो शाख को समझनेवाला वैद्य तुरन्त बाह्र से शिरपर काकपद का चिह्न बनाये । इस प्रकार व्रण करने से उनमें से रक्त बहने लगता है । काकपद व्रण में रक्तवाला चर्म या मांस शिर में रख देवे ।
अथवा चर्म वृक्ष (बामेर । इधेली-गुजराती नाम-इससे चमड़ा रंगते हैं) के कषाय या कल्क को वहाँ रख देवे । रोगी के पास में दुन्दुभि को अगदों से लेपकर बचाये । चेतना आने पर इसे फिर वमन विरेचन देवे । अतिशय दुर्जन्य विष को सम्पूर्णरूप में निकाल देवे । क्योंकि थोड़ा भी बचा विष फिर वेग उत्पन्न करता है । अथवा शिथिलता, विवर्णता, ज्वर, कास, विरोरोग उत्पन्न करता है । शोक, शोष, प्रतिशयाय, तिमिर, अस्चि, पीनस करता है । इनमें भी दोष के अनुसार चिकित्सा करे । विष से पीड़ित व्यक्ति के उपद्रवों की भी चिकित्सा उसके अपने दोषों के अनुसार करनी चाहिये ॥४२-४६॥
अथारिष्टां विमुच्यतासु प्रच्छयित्वाऽङ्कितं तया ॥५०॥ दृष्टान्तर विषं स्कन्तं भूयो वेगाय कल्पते । अरिष्टा को खोलकर दंश स्थान पर पाछकर वहाँ तुरन्त अगदों से लेप करे । क्योंकि वहाँ पर जभा (रुका) विष फिर वेग उत्पन्न कर देता है ॥५०॥
एवमौषधिभिर्मन्त्रैः क्रियायोगैश्च यन्ततः ॥५१॥ विषे हतगुणे देहाद्यदा दोषः प्रकुप्यति । तदा पवनमुद्भवत् स्नेहाद्यैः समुपाचरेत् ॥५२॥ तैलमत्स्यकुलथास्त्वव्यैर्विषहरायुतैः । पित्तज्वरहरैः पित्तं कषायस्तेहवस्तिभिः ॥५३॥ कफमारुवधायेन सक्षौद्रेण गणेन तु । इलैमन्त्रैरगदैश्चैव तिक्तै रूक्षैश्च भोजनैः ॥५४॥
इस प्रकार औषधियों से, मंत्रों से, चिकित्सा के उपचार से शरीर में विष के निकाल देने पर यदि दोष प्रकुपित होता है, तब कुपित (बूस्ते स्थान पर गई) वायु की स्नेहन, वमन, आदि से चिकित्सा करे । इसमें तैल, मछली, कुलथी, खटई (कांजी) को छोड़कर विषनाशक वस्तुओं के साथ स्नेहन, वमन कराये । पित्त को पित्तज्वर नाशक कषाय, स्नेह, वस्ति से शान्त करे । कफ को आरुवधादिगुण में मधु मिलाकर देने से, कफनाशक अगदों से, रूक्ष और तिक्त भोजनों से शान्त करे ॥५१-५४॥
वृक्षप्रपातविषमपतितं मृतमम्भसि । उद्भवद् च मृतं सद्यश्चिकित्सेन्नष्टसंज्ञवत् ॥५५॥ वृक्ष से, प्रपात (नदी तट या झरने से), विषम (ऊँचे) स्थान से गिरे, जल में डूबकर मरे, फाँसी लगाकर मरे मनुष्य की चिकित्सा तुरन्त नष्ट संज्ञा (बेहोश हुए) विधि से करे ॥
गाढं बद्धवेऽरिष्टया प्रच्छिते वा तीक्ष्णैर्लैपैस्तद्विषैर्वाऽवशिष्टैः । शूनं गात्रं किलन्तमत्यर्थपूति ज्रयं मांसं तद्विषात् पूति कष्टम् ॥५६॥
१ इनकी चिकित्सा न्याय वैषक में देखिये ।