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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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पृष्ठ 635

अ० ४ ]

कल्पस्थानम्

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पिलाये । तीसरे वेग में विषनाशक नस्य कर्म और अंजन करे । चौथे वेग में रोगी को वमन करा के स्थावर विष में कही यवागू पीने को देवे । पांचवें और छठे वेग में प्रथम शीतल उपचार करे । फिर तीक्ष्ण विरेचन देकर पूर्वांक यवागू पिलाये । सातवें वेग में तीक्ष्ण अवपीडन नस्य से शिर का शोधन करे, तीक्ष्ण ही अंजन देवे और तीक्ष्ण शस्त्र से शिर पर काकपद बनाकर उसमें रक्त मिश्रित मांस या ताजा चर्म धर देवे, (जिससे विष इसमें आ जाये) ।

वक्तव्य—यह किंवदन्ती है कि रोगी की गुदा पर मुर्गे की गुदा रक्खे । विष से मुर्गा मर जायेगा, फिर दूसरा मुर्गा रक्खे, तीसरा रक्खे, इस प्रकार जब तक मुर्गे मरते जायें, तब तक रक्खे । इस तरह करने से विष निकल जाता है ॥२०-२३॥

पूर्व मण्डलिनां वेगे दर्वाकरवदाचरेत् ॥२४॥ अगदं मधुसर्पिभ्यां द्वितीये पाययेत च । वामयित्वा यवागू च पूर्वात्कामथ दापयेत् ॥२५॥ तृतीये शोधितं तीक्ष्णैर्यवागू पाययेद्विताम् । चतुर्थे पञ्चमे चापि दर्वाकरवदाचरेत् ॥२६॥ काकोल्यादिर्हितः षष्ठे पेयश्च मधुरोऽगदः । हितोऽवपीडे त्वगदः सप्तमे विषनाशनः ॥२७॥

मण्डलि सांप के प्रथम वेग में दर्वाकर सांपों की भांति चिकित्सा करे । दूसरे में अगद को घी मधु के साथ पिलाये । पीछे से पूर्वांक यवागू को पिलाये । तीसरे में तीक्ष्ण विरेचनों से शोधन होने पर यवागू को पिलाये । चौथे और पांचवें वेग में भी दर्वाकर के समान चिकित्सा करे । छठे वेग में काकोल्यादि मधुर गण या अगद पिलाये । सातवें वेग में विषनाशक अगद अवपीडन में उत्तम है ॥२४-२७॥

पूर्वं राजिमतां वेगेऽत्तावृभिः शोणितं हरेत् । अगदं मधुसर्पिभ्यां संयुक्तं पाययेत च ॥२८॥ वान्तं द्वितीये त्वगदं पाययेद्विषनाशनम् । तृतीयादिषु त्रिज्वेवं विधिर्दर्वाकरो हितः ॥२९॥ षष्ठेऽञ्जनं तीक्ष्णतसमवपीडश्च सप्तमे ।

राजिमान् सांपों के प्रथम वेग में तुम्बी से रक्त निकाले । मधु और घी से मिश्रित अगद पीने को देवे । दूसरे वेग में वमन कराके विष नाशक अगद देवे । तीसरे आदि वेगों में दर्वाकर सांपों के समान उपचार बरते । छठे वेग में तीक्ष्ण अंजन और सातवें में अवपीडन, नष्टसंज्ञा उपचार करे ॥२८, २९॥ गभिणीबाल्युद्धानां सिराण्यधनवजितम् ॥३०॥ विषातानां यथोद्दिष्टं विषानं शस्यते मृदु । विष से पीड़ित गर्भवती, बालक या वृद्ध में सिरा वेधन करना निषिद्ध है । इनमें कहे हुए उपचार कोमल रूप में बरते ॥

रक्तावसेकाञ्जनानि नरतुल्यान्यजाविके ॥३१॥ त्रिगुणं महिषे सोष्ट्रे गवाश्चै द्विगुणं तु तत् । चतुर्गुणं तु नागानां, वकरी और भेड़ में रक्तावसेचन, अंजन, मनुष्य के समान है । भैंस और ऊँट में तीन गुने, गाय और बोड़े में दो गुने, हाथियों में चार गुनी मात्रा में बरते ॥३१॥

केवलं सर्वेपक्षिणाम् ॥३२॥ परिषेकान् प्रदेहांश्च सुगीतानवचारयेत् । माषकं त्वञ्जनस्थेष्टं द्विगुणं नस्यतो हितम् ॥ पाने चतुर्गुणं पथ्यं वमनेष्टगुणं पुनः ॥३३॥ पक्षियों में सम्पूर्ण परिषेक और प्रदेह अतिशीतल द्रव्यों से करे । अंजन में मात्रा एक मांसा, नस्य में दुगुनी, पीने में चार गुणी और वमन में आठ गुनी मात्रा पथ्य है ।

वक्तव्य—विष में सदा उत्तम मात्रा का उपयोग होता है । यथा—अहोरात्रादसंदुष्टा या मात्रा परिजीर्यती । सा च कुष्ठविषोन्मादग्रहापस्मारनाशिनी ॥ ( २ ) गुल्मोदावत्संवीसर्प सर्पदंशाभिपीडितैः । उन्मत्तैः कुन्डलुमूत्रैश्च महती शीघ्रमेव सा ॥ कल्क, मोदक, चूर्ण की बड़ी मात्रा एक पल है । वमन द्रव्य की श्रेष्ठ मात्रा तीन पल है । क्वाथ की मात्रा चार पल है ॥

देशप्रकृतिसारम्यतुर्विषवेगबलावलम् । प्रधार्य निपुणं बुद्ध्या ततः कर्म समाचरेत् ॥३४॥ देश, प्रकृति, सत्य, मृदु, वेग, बल, अबल को निपुण बुद्धि से विचारकर पीछे से कार्य करे ॥३४॥

वेगानुपूर्व्यां कर्मात्कर्मिदं विषविनाशनम् । कर्मोवस्थाविशेषेण विषयोरुभयोः श्रृणु ॥३५॥ वेगों के अनुक्रम से यह विष नाशक चिकित्सा कह दी है । अवस्था विशेष से स्थावर और जंगम दोनों विषों की चिकित्सा सुनी ॥३५॥

विवर्णं कठिने शूने सरुजेऽङ्ग्रे विषान्विते । तूर्णं विस्त्रावर्णं कायमुक्तेन विधिना ततः ॥३६॥ विषान्वित अंग में विवर्णता, कठिन्य, सूजन या पीड़ा होने पर तुरन्त कही हुई विधि से रक्तमोक्षण करना चाहिये ॥ सुधार्तमनिलप्रायं तद्विषातं समाहितः । पाययेत रसं सपिः शुक्तं श्लोदं तथा दधि ॥३७॥

फिर मूल लगने पर, वायु को अधिकता होने पर विष रोगी को सावधानों से मांसरस, दही, मधु, घी या शुक्त (तक-कांजी) पिलाये ॥३७॥

रुद्धदाहधर्मसंभोहे पैंतं पैंतविषातुरम् । शौतेः संवाहनस्तानमैदैहैः समुपाचरेत् ॥३८॥ पैतिकविष से पीड़ित पित्तप्रकृति को प्यास, दाह, भीष्म काल होने पर अथवा मूच्छा आने पर शीतल द्रव्यों से संवाहन (मणि, रत्न, कांसी का स्पर्श), स्नान एवं प्रलेप लगाये ॥३८॥