सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ५ ]
वि० मन्तव्य—अरिष्टा-पट्टी इतनी कसकर बांधनी चाहिये जिससे सिरा में रक्त का स्वाभाविक प्रवाह रुक जाय। जब रक्त रुक जाता है, तो रक्त में मिला विष भी शरीर में नहीं पहुँच पाता। शरीर में विष फैलने-चढ़ने के पूर्व ही अरिष्टा बाँधने से लाभ होता है, और दाह भी तथा आचूषण भी इसी दशा में लाभप्रद होते हैं। और मंत्रों का प्रयोग तो आरोग्य लाभ पर्यन्त किया जाता है। आचूषण यथा सम्भव मुख से करना ही नहीं चाहिये अपितु सिंगी अथवा तुम्भी द्वारा करे और अंगुली अंगूठा आदि पर भी नलिका से आचूषण करे ॥
देवब्रह्मर्षिभिः प्रोक्ता मन्त्राः सत्यतपोमयाः।
भवन्ति नान्यथा क्षिप्रं विषं हन्युः सुदुस्तर्मम् ॥९॥
विषं तेजोमयैर्मन्त्रैः सत्यब्रह्मतपोमयैः।
यथा निवार्यते क्षिप्रं प्रयुक्तैर्न तथौषधैः ॥१०॥
किसी सत्यवादी, तपस्वी, देवर्षि और ब्रह्मर्षियों से कहे हुए मंत्र न्यर्थ नहीं होते। ये मंत्र भयानक विष को भी क्षीम नष्ट कर देते हैं। सत्य परायण, ज्ञानी एवं तपस्वी तथा तेजस्वी ऋषियों के मंत्रों से विष जितनी जल्दी नष्ट होता है, उतनी जल्दी औषधियों से दूर नहीं होता ॥९, १०॥
मन्त्राणां ग्रहणं कार्यं क्षीमांसमधुवर्जिना।
मिताहारिण शुचिना कुत्रास्तरणशायिना ॥११॥
गन्धमाल्योपहारैश्च बलिभिश्चापि देवताः।
पूजयेन्मन्त्रसिद्धयर्थं जपहोमैश्च यत्नतः ॥१२॥
छौ, मांस और मधु ( मद्य ) का सेवन छोड़कर मंत्र को सीखना चाहिये। मंत्र सीखते समय आहार अल्प करना चाहिये, पवित्र (मन-शरीर से) रहना चाहिये, कुशा के विस्तर पर सोना चाहिये। गन्ध, माला, उपहार और बलि से देवताओं का पूजन मंत्र सिद्धि के लिये तथा जप एवं होम से यत्नपूर्वक करना चाहिये।
वक्तव्य—मधु शब्द मद्य के लिये यहाँ है। मधु मद्य का भेद है, यथा मद्यवर्ग में चरक—“रीचनं दीपनं हृद्यं बल्यं पितावरोधि च। विबन्धनं कफनं च मधुलध्वलमाक्षतम् ॥
चरक० सू० अ० २७। १८६ ॥११, १२॥
मन्त्रास्त्वविधिना प्रोक्ता हीना वा स्वरवर्णतः।
यस्मात्त सिद्धिमायान्ति तस्माद्योऽयोऽगदक्रमः ॥१३॥
विना विधि के या स्वर अथवा वर्ण से हीन प्रयुक्त मंत्र सफलता नहीं देते, इसलिये अगद उपचार बरतना चाहिये।
वक्तव्य—महाभाष्य में व्याकरण पढ़ने का प्रयोजन बताते हुए लिखा है कि असुर लोग हे अरयः यह शुद्ध न कहने से (हेलया-हेलया कहते हुए) देवताओं से पराजित हुए। इस-लिये शुद्ध उच्चारण के लिये व्याकरण पढ़े ॥१३॥
समन्ततः सिरा दंगाद्विध्येत् कुण्डलो भिषक्।
शाखाभे वा छलाटे वा व्यध्यास्ता विस्तृते विषे ॥१४॥
रक्ते निहिंयमाणे तु कुत्सनं निहिंयते विषम्।
तस्माद्विज्ञावयेद्भक्तं सा ह्यस्य परमा क्रिया ॥१५॥
समन्तादगदेर्दुर्गं प्रच्छयित्वा प्रलेपयेत्।
चन्दनोशीरयुक्तैनेन वारिणा परिषेचयेत् ॥१६॥
कुशल वैद्य दंश के चारों ओर सिराओं का वेधन करे।
विष के फैल जाने पर सिराओं को हाथ पैर के अग्रभाग में अथवा माथे पर वेधन करे। रक्त के निकलने से सम्पूर्ण विष भी निकल जाता है। इसलिये रक्त का विखावण करे, क्योंकि यही इसकी श्रेष्ठ विक्रिस्ता है। दंश के चारों ओर पाछकर अगदों से लेप करे। चन्दन और खस मिले पानी से परिषेक करे।
वि० मन्तव्य—सिरावेध से रक्त के साथ साथ विष भी निकल जाता है परन्तु शेष विष का शमन अगदों द्वारा भी करना चाहिये ॥१४-१६॥
पाययेतागदास्तंस्तान् क्षीरक्षौद्रघृतादिभिः।
तदलाभे द्विता वा स्यात् कृष्णा बल्मीकमृत्तिका ॥१७॥
कोविदारशिरीषार्ककटभीर्वाऽपि भक्षयेत्।
अगदों को दूध, मधु और घी में मिलाकर पिलाये। अगदों के अभाव में काली मिट्टी या बम्बी की मिट्टी को दूध, घी, मधु के साथ पिलाये। कचनार, शिरीष, आक, कोयल (अपराजिता) इनको खाये ॥१७॥
न पिबेतैलकौलथमद्यसौवीरकाणि च ॥१८॥
द्रवमन्यत्तु यत्किञ्चित् पीत्वा, पीत्वा तदुद्भवेत्।
प्रायो हि वमनेनैव सुखं निहिंयते विषम् ॥१९॥
तैल, कुलर्थी का यूप, मद्य या कांजी को न पीये। इतने विवाय कोई दूसरा द्रव पीपीकर बार बार वमन करे। क्योंकि प्रायः वमन से विष सुखपूर्वक निकल जाता है ॥१८, १९॥
फणिनां विषवेगे तु प्रथमे शोणितं हरेत्।
द्वितीये मधुसर्पिभ्यां पाययेतागदं भिषक् ॥२०॥
नस्यकर्मोञ्जने युष्ज्यात्तृतीये विषनाशने।
वान्तं चतुर्थे पूर्वोक्तां यवागू्मथ दापयेत् ॥२१॥
शोतेपचारं कृत्वाऽऽदौ भिषक् पञ्चमपष्ठयोः।
पाययेच्छोघनं तीक्ष्णं यवागू् चापि कीर्तिताम् ॥२२॥
सप्तमे त्ववपीडेन शिरस्तीक्ष्णेन शोधयेत्।
तीक्ष्णमेवाञ्जनं दद्यात् तीक्ष्णशस्त्रेण मूर्ध्नि च ॥२३॥
कृत्वा काकपदं चर्मं सासुरवा पिजितं क्षिपेत्।
दवीकर मांघों के प्रथम विष वेग में रक्त को निकाले। विष के दूसरे वेग में मधु और घी के साथ अगद को वैद्य