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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० ५ ]

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कल्पस्थानम्

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करने से छठा, पित्त और शुक्र की कला का अतिक्रमण करने से सातवाँ वेग माना है। पुरीषधरा कला ही अस्थिधरा कला है, पित्तधरा कला ही मज्जधरा कला है ॥४०॥

येनान्तरेण तु कलां काल्कल्पं भिनत्ति हि। समीरणेनोद्यमानं तत्तु वेगान्तरं स्मृतम् ॥४१॥ वायु से प्रेरित हुआ विष जितने समय में कला को पार करता है, उतने समय को वेगान्तर कहा है ॥४१॥

शुनाङ्कः प्रथमे वेगे पशुध्यायति दुःखितः। लालाखावो द्वितीये तु कृष्णाङ्कः पीड्यते हृदि ॥४२॥ तृतीये च शिरोदुःखं कण्ठग्रीवं च भव्यते। चतुर्थे वेपते मूढः खादन् दन्तान् जहात्यस्मून् ॥४३॥

केचिद्देगत्रयं प्राहुरन्तं चैतेषु तद्विदः। ध्यायति प्रथमे वेगे पक्षी सुहात्यतः परम् ॥४४॥ द्वितीये विह्वलः प्रोक्तस्तृतीये मृत्युभृच्छति।

केचिद्देकं विहङ्क्रेषु विषवेगमुन्नति हि। माजोरनकुलादीनां विषं याति प्रवर्तते ॥४५॥

विष के प्रथम वेग में पशु दुःखी होकर शोक करता है, अंग सूज जाता है। दूसरे वेग में अंग काला पड़ जाता है, मुख से लालाखाव होता है, हृदय में वेदना होती है। तीसरे में शिर में दर्द, कण्ठ और ग्रीवा दूट जाते हैं। चौथे वेग में काँपता है, मूठ हो जाता है, दाँतों को काटता हुआ प्राणों को छोड़ देता है। कई आचार्य पशुओं में तीन ही वेग मानते हैं। विष के प्रथम वेग में पक्षी चिन्ता करता है, मूर्च्छित हो जाता है। इसके आगे दूसरे वेग में बेचैन बन जाता है। तीसरे वेग में मर जाता है। कई आचार्य पक्षियों में विष का एक ही वेग मानते हैं। बिल्ली, नेवले आदि में साँप का विष नहीं चढ़ता ॥४२-४५॥

वक्तव्य—चरक में भी पशुओं में चार और पक्षियों में तीन वेग माने हैं। यथा—“चतुष्पदादीनां स्याच्चतुर्विषः पक्षिणां त्रिविषः ॥च० चि० अ० २३। चरक में विष के वेग आठ माने हैं, यथा—अष्टवेगं दशगुणं चतुर्विंशति उपक्रमम् ॥ इति सुश्रुतसंहितायां कल्पस्थाने सर्पदष्टविषविज्ञानीयं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥

पञ्चमोऽध्यायः ।

अथातः सर्पदष्टविषचिकित्सतं कल्पं व्याख्यास्यामः ॥१॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अब इसके आगे सर्पदष्टविषचिकित्सितकल्प का व्याख्यान करेंगे—जैसा भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥१,२॥

सर्वैरेवादितः सर्पैः शाखादष्टस्य देहिनः। दंशस्योपरि बन्धीयादरिष्टाश्चतुरङ्गुले ॥३॥

प्लोतचर्मान्तर्वल्कानां भुटुनाऽन्यतमेन वै। न गच्छति विषं देहभरिष्टाभिनिवारितम् ॥४॥ सभी साँपों में सबसे प्रथम, हाथ-पैर (शाखाओं) में काटे हुए मनुष्य में दंशस्थान से चार अंगुल ऊपर में एक 'अरिष्टा' बांधनी चाहिये। यह अरिष्टा कपड़े की लीर, चमड़े, वृक्ष की अन्तः छाल अथवा अन्य किसी कोसल वस्तु (रबड़ की नली, रबड़ आदि) से बाँधनी चाहिये। अरिष्टा से रोका हुआ विष ऊपर नहीं चढ़ता ॥

चरक में विष के लिये—दंशात्तु विषं दष्टस्याविर्भूतं वेणिंकां भिषक् बद्ध्वा। निष्पीडयेद्भुशं दंशमुदरेस्मर्मवजं वा ॥ अरिष्टा द्विविधा—मंत्रेण रज्वादिभिर्वा विषोपरिवन्धः ॥ इसके सिवाय चौबीस उपक्रम कहे हैं। यथा—मंत्रारिष्टोक्तर्चननिष्पीडन-चूषणगिनपरिषिकाः। अवगाह्यनरुक्तमोक्षणवमनविरेकोपधानानि ॥ दृढयावरणार्जजननस्य धूम्लेहौषधप्रशमनानि। प्रतिसारणं प्रतिविषं संवस्थापनं लेपः ॥ मृतसंजीवनमेव च विशतिरेते चतुर्भिर्पिषिकाः ॥ च० चि० अ० २३।३३। ३, ४॥

दहेहंमथोत्कृत्य यत्र बन्धो न जायते। आचूषणच्छेददाहाः सर्वत्रैव तु पूजिताः ॥५॥ जहाँ पर अरिष्टा बाँधी नहीं जा सके, वहाँ पर दंश को काटकर स्थान अनि से जला देवे। आचूषण (चूसना), छेदन और दाह यह सब में विषेय हैं। (इसमें मण्डलि साँप में दाह का निषेध है, चूँकि वह पित्त का प्रकोपक है) ॥५॥

प्रतिपूर्व मुखं वस्त्रैर्हितमाचूषणं भवेत्। स दष्टव्योऽथवा सर्पों लोष्टो वाऽपि हि तत्क्षणम् ॥६॥ मुख को वस्त्रों से भरकर चूषण करना उत्तम है। अथवा उसी साँप को तुरन्त काट ले, या मिट्टी के ढेले को तुरन्त काटे। (चरक में—तं दंशं वा चूषयेन्मुखेन यवचूषणं।शुपूर्णेन)।

वि० मन्तव्य—तत्काल सर्प को दष्ट मानव द्वारा काटना—सर्वसाधारण के लिये असम्भव है और भाग जानने पर दुष्कर भी है, परन्तु सपेरे ऐसा कर सकते हैं उनके लिये यह सब सम्भव है ॥ ६ ॥

अथ मण्डलिना दष्टं न कथंचन दाहयेत्। स पित्तबाहुल्यविषाईशो दाहाद्विसर्पते ॥७॥ मण्डलि साँप से काटे हुए व्यक्ति में मूलकर भी दाह न करे। क्योंकि वह दंश पित्त की अधिकता के कारण दाह से फैलता है ॥७॥

अरिष्टासपि मन्त्रैश्च बन्धीयामन्त्रकोविदः। सा तु रज्ज्वादिभिर्वद्वा विषप्रतिकरी मता ॥८॥ मंत्र को जाननेवाला वैद्य अरिष्टा को भी मंत्रों से बाँधे। इस प्रकार रज्जु आदि से बाँधी अरिष्टा विष को रोकती है। (मंत्र के बिना भी बाँधी अरिष्टा विष को रोकती है)।