सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ४ ]
अन्यान्य मृतों के समान आवेश होता है मृत विद्या नामक तन्त्र (सू० स्था० अ० १४) में नाग भी गिना गया है और नाग सर्प का नाम है तथा उत्तर तन्त्र अ० ६ श्लोक १३ में-सुजङ्गमेन जुष्टः लिखा है और इस रोगी की सब चेष्टायें सर्प के समान लिखी हैं ॥१२॥
तत्र सर्वेषां सर्पाणां विषस्य सप्त वेगा भवन्ति । तत्र दर्वीकराणां प्रथमे वेगे विषं शोणितं दूषयति, तत् प्रदुष्टं कृष्णतामुपैति, तेन काण्यं पिपीलिकापरिसर्पण-मिव चाङ्गे भवति; द्वितीये मांसं दूषयति, तेनात्यर्थं कृष्णता ओफो ग्रन्थयश्चाङ्गे भवन्ति; तृतीये मेदो दूषयति, तेन दंशकलेदः शिरोगौरवं स्वेदश्चलुर्महणं च; चतुर्थे कोष्ठमनुप्रविश्य कफप्रधानान् दोषान् दूषयति, तेन तन्द्वाप्रसेकसन्धिविरलेषा भवन्ति; पञ्चमेऽस्थीन्यनु-प्रविशति प्राणमर्गिनं च दूषयति तेन पर्वमेदो हिक्का दाहश्च भवति; षष्ठे मज्जानमनुप्रविशति ग्रहणीं चात्यर्थं दूषयति, तेन मात्राणां गौरवमतासारो हृत्पीडा मूर्च्छा च भवति, सप्तमे शुक्रमनुप्रविशति व्यानं चात्यर्थं कोपयति कर्कं च सूक्ष्मस्रोतोभ्यः प्रख्यावयति, तेन श्लेष्मवर्तिप्रादुर्भावं कटोपुष्टभङ्गः सर्ववेशविधातो लाळास्वेदयोरतिप्रवृत्तिरुच्छवासनिरोधश्च भवति । मण्डलिनां प्रथमे वेगे विषं शोणितं दूषयति, तत् प्रदुष्टं पीततामुपैति, तत्र परिदाहः पीतावभासता चाङ्गानां भवति; द्वितीये मांसं दूषयति, तेनात्यर्थं पीततापरिदाहो दंशे श्वयथुश्च भवति, तृतीये मेदो दूषयति तेन पूर्ववच्च-लुर्महणं तृष्णा दंशकलेदः स्वेदश्च, चतुर्थे कोष्ठमनुप्रविश्य ज्वरमापादयति, पञ्चमे परिदाहं सर्वगत्रेषु करोति । षष्ठसप्तमयोः पूर्ववत् । राजिमतां प्रथमे वेगे विषं शोणितं दूषयति, तत् प्रदुष्टं पाण्डुतामुपैति, तेन रोमहर्षः शुक्लावभासश्च पुरुषो भवति, द्वितीये मांसं दूषयति तेन पाण्डुताऽत्यर्थं जाळ्यं शिरःशोफश्च भवति; तृतीये मेदा दूषयति, तेन चलुर्महणं दंशकलेदः स्वेदो घ्राणाक्षिसावश्च भवति, चतुर्थे कोष्ठमनुप्रविश्य मन्वास्तम्भं शिरोगौरवं चापादयति, पञ्चमे वाक्मुक्तं शीतज्वरं च करोति, षष्ठसप्तमयोः पूर्ववदिति ॥१३॥
सब प्रकार के सर्पों के विष के सात वेग होते हैं । यथा-दर्वीकर सर्पों के प्रथम वेग में विष रक्त को दूषित करता है, यह दूषित रक्त काला पड़ जाता है । इससे अंगों में कालापन और चिऊंटियों के रेंगने की प्रतीति होती है । विष दूसरे वेग में मांस को दूषित करता है, इससे अतिशय कृष्णता सृजन और अंग में गंठि उत्पन्न हो जाती है । तीसरे वेग में विष मेद को दूषित करता है, इससे दंश स्थान सड़ता है, शिर में भारीपन, पसीना, आँखों से न दीखना होता है । चौथे वेग में
विष कोष्ठ में पहुँचकर कफ प्रधान दोषों को दूषित करता है, इससे तन्द्वा, कफ का मुख से गिरना, सन्धियों में दीलापन होता है । पाँचवें में विष अस्थियों में प्रविष्ट होता है, प्राण और अग्नि को दूषित करता है, इससे पंखों का टूटना, हिक्का और दाह होता है । छठे में विष मज्जा में पहुँचता है और ग्रहणी (पित्तरा कला) को अतिशय दूषित करता है । इससे शरीर के अङ्गों में भारीपन, अतिसार, हृदय में पीड़ा, और मूर्च्छा होती है । सातवें वेग में विष शुक्र में पहुँच जाता है, व्यान वायु को अतिशय कुपित करता है, कफ को सूक्ष्म स्रोतों से निकालता है । इससे घट कफ मुख से निकलता है, कटि-पीठ टूट जाती है, सब चेष्टायें रुक जाती हैं । लाळा और पसीना बहुत आता है, उच्छ्वास (श्वास) रुक जाता है ।
मण्डलि सर्प के प्रथम वेग में विष रक्त को दूषित करता है, यह दूषित रक्त पीला हो जाता है । इससे जलन, अङ्गों में पीलापन हो जाता है । दूसरे वेग में मांस को दूषित करता है इससे अतिशय पीलापन, जलन और दंश में सृजन होती है । तीसरे वेग में मेद को दूषित करता है, इससे दर्वीकर सर्प की भाँति आँखों से न दिखाई देना, तृष्णा, दंश का सड़ना पसीना होता है । चौथे में विष कोष्ठ में पहुँचकर ज्वर उत्पन्न करता है । पाँचवें में विष सब अंगों में दाह करता है । छठे और सातवें वेग के लक्षण दर्वीकर के समान हैं ।
राजिमान्सर्प के प्रथम वेग में विष रक्त को दूषित करता है । यह दूषित रक्त पाण्डुवर्ण (श्वेत) हो जाता है, इससे रोमहर्ष, अंगों में श्वेत वर्ण हो जाता है । दूसरे वेग में विष मांस को दूषित करता है, इससे अतिशय पाण्डुता, जडता और शिरः सृजन होती है । तीसरे में विष मेद को दूषित करता है, इससे अन्वापन, दंश का सड़ना, पसीना, नाक और आँख से साव होता है । चौथे में विष कोष्ठ में पहुँचकर मन्वास्तम्भ और शिर में भारीपन उत्पन्न करता है । पाँचवें में वाणी का अवरोध और शीतज्वर करता है । छठे और सातवें वेग के लक्षण दर्वीकर सर्प की भाँति हैं ॥१३॥
भवन्ति चात्र—
धातवन्तरेषु याः सप्त कलाः संपरिकीर्तिताः ।
तास्वैकैकामतिक्रम्य वेगं प्रकुरुते विषम् ॥१४॥
धातुओं के बीच बीच में जो सात कलायें कही हैं, उनमें से एक एक को अतिक्रमण करके विष, वेग को उत्पन्न करता है ॥
वक्तव्य—रस और रक्त के बीच की कला का अतिक्रमण करने से प्रथम वेग, रक्त और मांस की कला का अतिक्रमण करने से दूसरा वेग, मांस और मेद की कला का अतिक्रमण करने से तीसरा वेग, इसी तरह से आगे । ढल्हण ने—मेद और कफ की कला का अतिक्रमण करने से चौथा, कफ और पुरीष की बीच की कला का अतिक्रमण करने से पाँचवाँ, पुरीष और पित्त की कला का अतिक्रमण