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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० ४ ]

कल्पस्थानम्

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दर्भपुष्प, वेल्लतिक। इनमें पहले तीन का विष राजिमान् सोंपों की भाँति, शेषों का विष मण्डलि के समान होता है। इस प्रकार से अस्सी सोंपों का व्याख्यान हो गया ॥३४॥

तत्र महानेत्रजिह्वास्थिरसः पुमांसः, सूक्ष्मनेत्रजिह्वास्थिरसः क्षियः, उभयलक्षणं मन्दविषा अक्रोधा नपुंसका इति ॥३५॥

इनमें बड़ी नेत्र, जिह्वा मुख और शिरवाले पुरुष जाति हैं। सूक्ष्मनेत्र-जिह्वा-मुख और शिरवाले स्त्री जाति हैं। दोनों जाति के लक्षणधाले, मन्द विष एवं क्रोध रहित नपुंसक हैं ॥३५॥

तत्र सर्वेषां सर्पाणां सामान्यत एव दृष्टलक्षणं वक्ष्यामः। किं कारणं? विषं हि निशितनिश्चिशागनि-हुतवहदेश्यमाशुकारि मुहूर्तमप्युपेक्षितमातुरमतिपातयति, न चावकाशोऽस्ति वाक्समूहमुपसत्तु प्रत्येकमपि दृष्ट-लक्षणेऽभिहिते सर्वत्र त्रैविध्यं भवति, तस्मात् त्रैविध्यमेव वक्ष्यामः, एतद्व्यातुरहितमसंभोहकरं च, अपि चात्रैव सर्वसर्पव्यञ्जनावरोधः ॥३६॥

सब सोंपों के दृष्टलक्षणों को सामान्यरूप में कहेंगे। क्योंकि—विष तीक्ष्ण तलवार की भाँति, विजली, अग्नि के तुल्य शीघ्र व्यापक शील है, मुहूर्तभर (क्षणभर) की उपेक्षा करने से रोगी को मार देता है। वाषी से कहने का भी समय नहीं रहता। प्रत्येक सर्प से काटने पर भी तीन प्रकार के लक्षण होते हैं। इसलिये तीन प्रकार से ही कहेंगे। ये कहे लक्षण रोगी के हितकारी और वैद्य को किसी प्रकार का भ्रम नहीं होने देते। इन्हीं लक्षणों में सब सोंपों के लक्षण आ जाते हैं ॥३६॥

तत्र, दर्वीकरविषेण त्वच्छूनयननखदशनवदनमूत्रपुरीष-दंशकुण्ठत्वं रौक्ष्यं शिरसा गौरवं सन्धिवेदना कटीपृष्ठ-म्रीवादौर्वल्यं जूर्मभ्रंषं वेपथुः स्वरवासादौ घुघुरको जडता शुष्कोद्वारः कासश्वासौ हिक्का वायोरुध्वगमनं शूलोद्वेष्टनं तृष्णा लालाक्षावः फेनागमनं स्रोतोऽवररोध-स्तास्ताश्च वातवेदना भवन्ति, मण्डलिविषेण त्वगादीनां पीतत्वं शीताभिलाषः परिधूपनं दाहस्तृष्णा मदो मूर्च्छा ज्वरः जोगितागमनमूर्ध्वमधश्च मांसातमावशातनं श्वय-शुदंशकोथः पीतरूपदर्शनमाशुकोपस्वारताश्च पित्तवेदना भवन्ति, राजिमद्विषेण शुक्लत्वं त्वगादीनां शीतज्वरो रोमहर्षः स्तब्धत्वं गात्राणामंशोफः सान्द्रकफसेकरुद्ध-द्विरभीदण्मदण्मोः कण्डूः कण्ठे श्वयशुघुर्घुरकं उच्छ्वासा-निरोधस्तमःप्रवेगस्तास्ताश्च कफवेदना भवन्ति ॥३७॥

इनमें—दर्वीकर विष से त्वचा, नख, आँख, दाँत, मुख, मूत्र, मल और दंश स्थान काले पड़ जाते हैं। रुक्षता, शिर में भारीपन, सन्धियों में वेदना, कटि-पीठ-म्रीवा में दुर्बलता,

जम्माई आना, कम्पन, स्वर का बैठना, गले में घर्षराइट, जडता, सूखे उद्वार, कास, श्वास, हिक्का, वायु का ऊपर को जाना, शूल, ऐंटन, प्यास, लाला खाव, क्षाग का आना, स्रोतों का बन्द होना और वातजन्य नाना प्रकार की वेदनायें होती हैं। मण्डलि विष से त्वचा, नख, मल, मूत्र आदि पीले हो जाते हैं। शीत की चाह, परिधूपन (सर्वांग-वन्ताप), दाह, प्यास, मद, मूर्च्छा, ज्वर, रक्त का ऊर्ध्वमार्ग और अशोमार्ग से आना, मांस का विदीर्ण होना, सूजन, दंश का सड़ना, पीले रूपों को देखना, विष का जल्दी कुपित होना, और चित्तजन्य नाना प्रकार की वेदनायें (ओष-चोष आदि) होती हैं। राजि-मान् सर्प से त्वचा, नख आदि श्वेत हो जाते हैं, शीतपूर्वक ज्वर, रोम हर्ष, अङ्गों में जडता, दंश के चारों ओर सूजन, घट्ट कफ का मुख से गिरना, बार-बार वमन, आँखों में कण्डू गले में सूजन, घर्षराइट, श्वास का रुकना, अन्धेरो आना, और कफजन्य नाना प्रकार की वेदनायें होती हैं ॥३७॥

पुरुषाभिदष्ट ऊर्ध्वं प्रेक्षते, अधस्तात् क्षिया, सिराश्वोत्तिष्ठन्ति ललाटे, नपुंसकाभिदष्टस्तित्येकप्रेक्षी भवति, गर्भिण्या पाण्डुमुखो ध्मातश्च, सूतिकया कुक्षि-शुल्कतः सरुधिरं मेहृत्युपजिह्विका चास्य भवति, प्रासा-र्थिनाऽत्रं काङ्क्षति, घुट्टेन चिरान्मन्दाश्च वेगाः, बाले-नाशु मृदवश्च, निर्विषेणाविषलिङ्गं, अन्धाहिकेनान्धत्व-मिल्येके, प्रसनात् अजगरः शरीरप्राणहरो न विषात्। तत्र सद्यःप्राणहराहिदष्टः पतति अन्धाशनिहत इव भूमौ, क्षस्ताङ्गः स्वपिति ॥३८॥

पुरुष सर्प से काटा रोगी ऊपर को देखता है, स्त्री सर्प से काटा रोगी नीचे देखता है, माथे में सिरायें ऊपर आती हैं, नपुंसक सर्प से काटा रोगी तिरछा (पार्श्व में) देखता है। गर्भवती से काटे हुए मनुष्य का मुख पाण्डुवर्ण एवं सूजा (शोथ) होता है। सूतिकां (प्रसव की हुई) सर्पिणी से काटे हुए मनुष्य को उदरशूल होता है, रक्तयुक्त मूत्र आता है, उपजिह्विका रोग हो जाता है। प्रासार्थि सर्प से काटा मनुष्य अब की चाह करता है। घुट्ट सर्प से काटने पर विष का वेग मन्द रहता है, और देर में चढ़ता है। बालक सर्प से काटने पर विष जल्दी चढ़ता है, परन्तु मन्द रहता है। निर्बिष सर्प के काटने पर विष के लक्षण नहीं होते। अन्धे सर्प से काटने पर मनुष्य अन्धा हो जाता है, ऐसा कई मानते हैं। अजगर सर्प निगलने से प्राणनाशक होता है, विष से नहीं होता। परन्तु इनमें प्राणहर सर्प से काटा हुआ मनुष्य-शस्त्र या विजलो से मारे हुए मनुष्य की भाँति तुरन्त जमीन पर गिर पड़ता है, अङ्ग ढीले पड़ जाते हैं, सो जाता है।

वि० मन्तव्य—इन लक्षणों से प्रतीत होता है कि सर्प का