सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 630, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ें५७४
सुश्रुतसंहिता
[ अ० १ ]
वैश्य, शूद्र इसी रूप में किया गया है। अश्रक्त, वज्र आदि को भी, विष को भी उन्होंने इसी रूप में विभक्त किया है। गीता में भी कहा है “चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागाशः” ॥
कोपयन्त्यनिलं जन्तोः फणिनः सर्व एव तु।
पित्तं मण्डलितश्चापि कफं चानेकराजयः ॥२९॥
अपत्यमसवर्णाभ्यां द्विदोषकरलक्षणम्।
ज्ञेयो दोषैश्च दम्पत्योविशेषश्चात्र वदत्ये ॥३०॥
सब फणिश्च (दर्वीकर) सॉप वायु को कुपित करते हैं। मण्डलि सॉप पित्त को और राजिमान् सॉप कफ को कुपित करते हैं। असमानवर्ण माता-पिता की संतान दो दोषों के (संसर्ग रूप में) लक्षणों को उत्पन्न करनेवाली होती है ॥२९, ३०॥
रजन्याः पश्चिमे यामे सर्पाश्चित्राश्चरन्ति हि
श्रेषेषूक्ता मण्डलिनो दिवा दर्वीकराः स्मृताः ॥३१॥
इसमें और मेदों को कहते हैं—रात के पिछले भाग में राजिमान् सर्प घूमते हैं। शेष रात्रि में (रात्रि के पहले दूसरे, तीसरे पहर में) मण्डलि सॉप, दिन में दर्वीकर सॉप घूमते हैं ॥
दर्वीकरास्तु तरुणा वृद्धा मण्डलितस्तथा।
राजिमन्तो वयोमध्ये जायन्ते मृत्युहेतवः ॥३२॥
दर्वीकर सॉप तरुणावस्था में, मण्डलि सॉप वृद्धावस्था में, राजिमान् सॉप मध्यवय में मृत्यु के कारण होते हैं ॥३२॥
नकुलाकुलिता बाला वारिविप्रहृताः कृमाः।
वृद्धा मुक्तत्वचो भीता सर्पास्तत्वपिषाः स्मृता ॥३३॥
नेवले से धवराये, बालक, जल के वेग से ताड़ित, कुश, वृद्ध, केंचुली उतारे, डरे हुए सॉप अल्प विषवाले कहे हैं ॥
चरक में—“वारिविप्रहृताः क्षीणा भीता नकुलनिजिताः।
वृद्धा बालस्तच्चो मुक्ताः सर्पा मन्दविषाः स्मृताः ॥” ॥३३
तत्र, दर्वीकराः—कृष्णसर्पों, महाकृष्णः, कृष्णोदरः, श्वेतकपोतों, महाकपोतों, बलाहक, महासपः, गङ्गकपालों, लोहितताक्षों, गवेधुकः, परिसर्पः, खण्डफणाः, ककुदः पक्षों, महापक्षों, दुर्भपुष्पों, दधिमुखः, पुण्डरीको, भ्रुकुटीमुखों, विष्किरः, पुष्पाभिकीणों, गिरिसर्पः, श्रुजुसर्पः, श्वेतोदरो, महाशिरो, अलगदः, आशीविष इति ( १ ),
मण्डलितस्तु—आदर्शमण्डलः, श्वेतमण्डलो, रक्तमण्डलः चित्रमण्डलः, पृषतो, रोध्रपुष्पों, मिलिन्दको, गोनसों, वृद्धगोनसः पनसों, महापनसों, वेणुपत्रकः, शिशुको, मदनः, पालिन्दिरः, पिङ्गलः, तन्तुकः, पुष्पपाण्डुः, षडङ्गों, अनिकों, बभ्रुः, कषायः, कलुषः पारावतो, हस्ताभरणः, चित्रकः एणीपद इति ( २ );
राजिमन्तस्तु—पुण्डरीको राजिचित्रो, अङ्गुलराजिः, बिन्दुराजिः, कर्दमकः, तृणशोषकः, सर्पपकः, श्वेतहतुः, दुर्भपुष्पश्रक्तको गोधूमकः, किंकिसाद इति ( ३ ),
निर्विषास्तु—गलगोली, शूकपत्रों, अजगरों, दिव्यकों, वर्षाहिकः, पुष्पशकली, ज्योतीरथः, क्षीरिकापुष्पकों, अहिपताकों, अन्धाहिकों, गौराहिकों, वृत्तेशय इति ( ४ ),
वैकरञ्जास्तु त्रयाणां दर्वीकरादीनां व्यतिकराजजाताः तद्यथा—माकुलिः, पोटागलः, स्निग्धराजिरिति। तत्र, कृष्णसर्पण गोनस्यां वैपरीत्येन वा जातो माकुलिः, राजिलेन गोनस्यां वपरीत्येन वा जातः पाटागलः, कृष्णसर्पण राजिमस्यां वैपरीत्येन वा जातः स्निग्धराजिरिति। तेषामाद्यस्य पितृवद्विषोत्कर्षो, द्वयोर्मातृवदित्येके ( ५ );
इनमें ( दर्वीकर सॉप )—कृष्णसर्प, महाकृष्ण, कृष्णोदर, श्वेतकपोत, महाकपोत, बलाहक, महासप, शंखकपाल, लोहितताक्ष, गवेधुक, परिसर्प, खण्डफणा, ककुद, पक्ष, महापक्ष, दम्पुष्प, दधिमुख, पुण्डरीक, भ्रुकुटीमुख, विष्किर, पुष्पाभिकीण, गिरिसर्प, श्रुजुसर्प, श्वेतोदर, महाशिरो, अलगद आशीविष। ( मण्डलि सर्प )—आदर्शमण्डल, श्वेतमण्डल, रक्तमण्डल, चित्रमण्डल, पृषत, रोध्रपुष्प, मिलिन्दक, गोनस, वृद्धगोनस, पनस, महापनस, वेणुपत्रक, शिशुको, मदन, पालिन्दिर, पिङ्गल, तन्तुक, पुष्पपाण्डु, षडङ्ग, अनिक, बभ्रु, कषाय, कलुष, पारावत, हस्ताभरण, चित्रक, एणीपद। राजिमान् सर्प—पुण्डरीक, राजिचित्र, अंगुलराजि, बिन्दुराजि, कर्दमक, तृणशोषक, सर्पपक, श्वेतहतु, दुर्भपुष्प, चित्रक, गोधूमक, किंकिसाद। निर्विषसर्प—गलगोली, शूकपत्रक, अजगर, दिव्यक, वर्षाहिक, पुष्पशकली, ज्योतिरथ, क्षीरिका पुष्पक, अहिपताक, अन्धाहिक, वृत्तेशय। वैकरञ्जसॉप—दर्वीकर आदि तीनों प्रकार के सर्पों में विपरीत जाति से उत्पन्न सॉप यथा—माकुली, पोटागल, स्निग्धराजी। इनमें काले सॉप द्वारा गोनस में विपरीत जाति से या विपरीतता से माकुली उत्पन्न होता है। पोटागल सॉप राजिमान् सॉप से गोनस में या विपरीतता से उत्पन्न होता है। स्निग्धराजी सॉप कृष्ण सर्प से राजिमान् में विपरीतता से उत्पन्न होता है। इनसे पहला सॉप पिता की भाँति तेजस्वी होता है, और शेष दो माता के समान तेजस्वी होते हैं।
वक्तव्य—गोह को भी सर्प जाति में गिना है। सॉप की जीभ बीच में चोरी होने से इसको दिजिहा कहा जाता है। गोह की जीभ भी इसी प्रकार बीच से चिरी होती है, यह भी दिजिहा होने से सर्प में गिनी है ॥१-५॥
त्रयाणां वैकरञ्जानां पुनर्दिन्येलकरोध्रपुष्पकराजिचित्रकपोटागलपुष्पाभिकीणदुर्भपुष्पवेखितकाः सप्तः तेषामाद्याद्यो राजिलवत्, शेषा मण्डलिवत्, एवमेतेषां सर्पाणामशीतिन्याख्याता ॥३४॥
तीनों वैकरञ्ज सॉपों के मेद सात हैं, यथा—दिव्यलक, रोध्रपुष्पक, राजिचित्रक, कपोटागल, पुष्पाभिकीण,