सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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कल्पस्थानम्
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वि० मन्तव्य—वैकरक्ष नामक सर्प—संकीर्ण जात अर्थात् वर्णसंकर हैं। भिन्न जाति की सर्पियों में भिन्न जाति के सर्प से उत्पन्न हैं। और वैकरक्षों से उत्पन्न सर्प विचित्र विचित्र मण्डलों तथा राजियोंवाले होते हैं ॥१६-१२॥
पादाभिष्टुष्टा दुष्टा वा कुट्टा ग्रासाधिनोऽपि वा ॥११॥ ते दशन्ति महाक्रोधास्त्रिविधं भीमदर्शनाः ॥
पेर से छूने पर, स्वभाव से दुष्ट, कूट्ट हुष्ट, ग्रास (भोजन) की इच्छा से, ये अतिशय क्रोधी, भीम दर्शनवाले सांप काटते हैं। इनका काटना तीन प्रकार का है-॥१३॥ यथा—
सर्पितं रदितं चापि तृतीयमथ निर्विषम् ॥
सर्पाङ्गाभिहतं केचिद्विच्छन्ति खलु तद्विदः ॥१४॥
पदानि यत्र दन्तानामेकं द्रे वा बहूनि वा ।
निमग्नान्यमरपत्तानि यान्यदुष्टुत्य करोति हि ॥१५॥
चञ्चुमालकयुक्तानि वैकृत्यकरणानि च ।
सङ्क्षिप्तानि सशोफानि विद्यान्तु सर्पितं भिषक् ॥१६
राज्यः सलोहिता यत्र नीलाः पीताः सितास्तथा ।
विजेष्यं रदितं तत्तु ज्ञेयमल्पविषं च तत् ॥१७॥
अशोफमल्पदुष्टासूक्तं प्रकृतिस्थस्य देहिनः ।
पदं पदानि वा विद्याद्विषं तस्त्रिक्तसकः ॥१८॥
सर्पसृष्टुष्टस्य भीरोहिं भयेन कुपितोऽनिलः ।
कस्यचित् कुरुते शोफं सर्पाङ्गाभिहतं तु तत् ॥१९॥
सर्पित, रदित और तीसरा निर्विष काटना। सांप के काटने के समझनेवाले कुछ व्यक्ति सर्पाङ्गाभिहत ( सांप का छू जाना ) भी गिनते हैं। जहाँ पर एक, दो या बहुत से दन्तों के चिह्न गहरे गये, थोड़े रक्तवाले होते हैं, जिन चिह्नों को सांप उलटकर करता है, चञ्चुमालक युक्त, विकार उत्पन्न करनेवाले सूक्ष्म, शोफयुक्त होते हैं, उनको वैद्य सर्पित दंश समझे। जहाँ पर रेखायें सुख या नीली या पीली अथवा श्वेत हों, उसे रदित जानना, यह अल्पविष होता है। जहाँ पर सूजन थोड़ा हो, रक्त थोड़ा दूषित हो, रोगी स्वस्थ रहे, वहाँ पर एक चिह्न या बहुत चिह्न होने पर भी वैद्य इसको निर्विष समझे। डरपोक व्यक्ति में सांप के छूने मात्र से कुपित हुई वायु किसी में सूजन उत्पन्न कर देती है, इसको सर्पाङ्गाभिहत कहते हैं।
वक्तव्य—साँप की दाढ़ ऊपर में दो, प्रत्येक पार्श्व में एक होती है। यह दाढ़ औरों से लम्बी होती है। इनका अग्रभाग कुछ झुका एवं नोकदार होता है। यही विषैला दांत होता है। इसके पीछे एक थैली रहती है। थैली का मुख इस दांत में खुलता है। नीचे की तरफ थैली ऊपर के जवाड़े में रहती है। इसलिये दांत के निशान भ्रण के दोनों ओर (०) (०) एक-एक होते हैं। यदि भ्रण के दोनों ओर दो दो निशान हों तो वह उतना विषैला नहीं होता। सर्पाङ्गाभिहत को चरक में—
“दुर्नमकारे दष्टस्य केनचिद् विषशङ्क्या । विषोद्देगाज्ज्वरश्छर्दि- मृच्छां दाहोऽपि वा भवेत् ॥ ग्लानिमोहोऽतीक्षारो वा प्येतच्छङ्गा- विषं मतम् ॥१४-१६॥
व्याधितोद्दिग्मन्दधानि ज्ञेयान्यल्पविषाणि तु । तथाऽतिवृद्धवालाभिदष्टमल्पविषं स्मृतम् ॥२०॥ सुपर्णदेवब्रह्मर्षियक्षसिद्धनिषेविते । विषदन्तोपधियुक्तं च देशे न क्रमते विषम् ॥२१॥ रोगी या उद्विग्मन् ( घबराये ) हुये सांप से काटे हुष्ट पुरुषों में विष थोड़ा चढ़ता है। इसी प्रकार अति वृद्ध, बालक के काटने पर भी थोड़ा विष चढ़ता है। गरुड़, देवता, ब्रह्मर्षि, यक्ष, सिद्धों से सेवित एवं विषदन्त औषधियुक्त स्थान में विष का संचार नहीं होता ॥२०-२१॥
रथाङ्गलाङ्गलच्छत्रस्वस्तिकाङ्कगुप्धारिणः । ज्ञेया दर्वाकराः सर्पाः फणिनः शीघ्रगामिनः ॥२२॥ मण्डलेर्विषैर्वैश्वित्राः पृथवो मन्दरगामिनः । ज्ञेया मण्डलिनः सर्पा ज्वलनाकंसमप्रभाः ॥२३॥ स्तिग्धा विविधवर्णाभिसित्यर्गमूर्ध्वं च राजिमिः । चित्रिता इव ये भान्ति राजिमन्तस्तु ते स्मृताः ॥२४॥ चक्र, हल, छत्र, स्वस्तिक, अंकुश का चिह्न धारण करनेवाले, फणवाले और शीघ्रगामी सांप दर्वाकर हैं। नानाप्रकार के मण्डलों से चित्रित, चपड़े, धीमे चलनेवाले, अग्नि और सूर्य के समान कान्तिवाले सांप मण्डली हैं। चिकनी, नानाप्रकार के वर्णों की, तिरछी एवं ऊपर पड़ी रेखाओं से चित्रित जो शोभित होते हैं, वे साँप राजिमान् हैं ॥२२-२४॥
मुक्तारूप्यप्रभा ये च कपिला ये च पन्नगाः । सुगन्धयः सुवर्णाभास्ते जात्या ब्राह्मणाः स्मृताः ॥२५॥ क्षत्रियाः स्तिग्धवर्णास्तु पन्नगा भूशकोपनाः । सूर्यचन्द्राकृतिच्छत्रद्वयं तेषां यथाऽन्मुखम् ॥२६॥ कृष्णा वज्रनिभा ये च लोहिता वर्णतस्तथा । धूम्राः पारावताभाश्च वैश्यस्ते पन्नगाः स्मृताः ॥२७॥ महिषद्वीपिवर्णाभास्तथैव पशुवत्त्वचः । भिन्नवर्णाश्च ये केचिच्छूद्रास्ते परिकीर्तिताः ॥२८॥
जो साँप मोती, चाँदी की प्रभा के या जो कपिल वर्ण होते हैं, सुगन्धित होते हैं, सुवर्ण की कान्ति के होते हैं, वे साँप ब्राह्मण जाति के हैं। जो साँप स्तिग्धवर्ण, अतिशयक्रोधी, सूर्य, चन्द्र की आकृति के या छत्र के चिह्नवाले अथवा कमल के चिह्नवाले हैं, वे क्षत्रिय जाति के हैं। काले, वज्र के समान लाल वर्ण के धूम्रवर्ण या पारावत ( धरेलू कबूतर ) के होते हैं वे साँप वैश्य जाति के हैं, भैंस, चीता के वर्ण के, कठोर त्वचा के, नानाप्रकार के चितकबरे रंगों के जो होते हैं, वे साँप शूद्र जाति के हैं।
वक्तव्य— भारतीय संस्कृति में सब विभाग ब्राह्मण, क्षत्रिय,