सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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मुश्रुतसंहिता
[ अ० ५ ]
एषोऽगदस्ताद्यर्थ इति प्रदिष्टो
विषं विह्न्यादापि तक्षकस्य ।
ताद्यर्थ अगद—प्रपोण्डरीक, देवदारु, मुस्ता, कालानुसारी, कुटकी, स्योणेयक, कच्छुण, गुगुलु, नागकेसर, इलायची, श्वेत निर्गुण्डी, तालीशपत्र, सुवर्चिका (हुलहुल), श्योनाक, शिला-रस, कुष्ठ, तगर, प्रियंगु, लोघ, वालक, स्वर्ण गैरिक, पिप्पली, चन्दन, सेन्धव, इनका बारीक चूर्ण बनाकर मधु में मिलाकर सींग में रख देवे । इस अगद का नाम ताद्यर्थ अगद है, यह अगद तक्षक के विष को भी नष्ट कर देता है ॥६५-६७॥
मांसीहरेणुत्रिफलासुरङ्गी-
रक्तालतायष्टिकपद्मकानि ॥६८॥
विडङ्गतालीशसुगन्धि कैला-
स्वकुकुष्ठपत्राणि सचन्दनानि ।
भागीं पटोलं किणिही सपाठा
सृगदनी कर्कटिका पुरश्च ॥६९॥
पालिन्द्यशोको कमुकं सुरस्याः
प्रसूतमारुण्करजं च पुष्पम् ।
सूक्ष्मानि चूर्णानि समानि श्रृङ्गे
न्यसेत् सपित्तानि समाक्षिकाणि ॥७०॥
बराहगोधाशिविशल्लकीनां
माजार्जजं पाषतनाकुले च ।
यस्यागदोऽयं सुकृतो गृहे स्या-
न्तान्तर्षभा नाम नरपभस्य ॥७१॥
न तत्र सपाः कृत एव कोटा-
स्त्यजन्ति वीर्याणि विषाणि चैव ।
एतेन भेयः पटहाश्च दिग्धा
नानद्यमाना विषमाशु हन्युः ॥७२॥
दिग्धाः पताकाश्च निरोक्ष्य सद्यो
विषाभिभूता ह्यविषा भवन्ति ।
श्रृषभ अगद—जटमांसी, हरेणु, त्रिफला, शोभांजन, मंजीठ, लता (प्रियंगु), मुलैहटी, पत्राख, विडंग, तालीशपत्र, सर्पगन्धा, इलायची, दालचीनी, कूट, तेजपत्र, चन्दन, भागीं परवल, चिरचिटा, पाठा, इन्द्रायण, कर्कटिका (कर्कटशृङ्गी), गुगुलु, निशोय, अशोक, सुपारी, तुलसी के फूल, इनका बारीक चूर्ण करके पित्त और मधु के साथ मिलाकर सींग में रख देवे । पित्त-सुअर, गोह, मोर, सेह, बिन्नी, चित्तलहरिण, नेवले का लेना चाहिये । जिस भाग्यवान् राजा के घर में यह श्रृषभ अगद रहता है, वहाँ पर न तो सर्प न कीट बीथं (शक्ति) या विष का त्याग नहीं करते । इस अगद से लेप किये भेरी और नगाड़े बजाने पर विष को शीघ्र नष्ट कर देते हैं । इस अगद से लिप्त पताकाओं को देखकर विष से पीड़ित मनुष्य तुरन्त निरोग हो जाते हैं ॥६८-७२॥
लाक्षा हरेणुनलदं प्रियङ्गः
अिम द्रव्यं यष्टिकगृध्रिकाश्च ॥७३॥
चूर्णांकृतोऽयं रजनीविमिश्रो
सर्पिर्मधुभ्यां सहितो निधेयः ।
श्रृङ्गे गवां पूर्ववदापिधान-
स्ततः प्रयोक्त्योऽञ्जननस्यपानैः ॥७४॥
संजीवनो नाम गतासुकल्पा-
नेषोऽगदो जीवयतीह मर्यान् ।
संजीवन अगद—लाक्षा, हरेणु, जटमांसी, प्रियंगु, मीठा सहजन, कडुआ सहजन, मुलैहटी, बड़ी इलायची, हरदी इनका चूर्ण करके घी और मधु में मिलाकर गाय के सींग में टॉपकर रख देना चाहिये । पन्द्रह दिन पीछे अंजन, नस्य, पान में बरता हुआ संजीवन अगद मृत तुल्य मनुष्यों को भी जीवित कर देता है ॥७३,७४॥
ऋक्षमातकीकटफलमातुलुङ्ग्यः
ऋवेता गिरिहा किणिही सिता च ॥७५॥
सतण्डुलीयोऽगद एष मुख्यो
विषेषु दर्वीकरराजितानाम् ।
लट्टा, कटफल, बिजौरा, कोयल श्वेत, चिरचिटा, शर्करा (सिता-श्वेतवच भी) इनको चौलाई से मिलाकर बनाया अगद, दर्वीकर और राजिमान् सर्पों के विषों में मुख्य है ॥७५॥
द्राक्षा सुगन्धा नगवृत्तिका च
ऋवेता समझा समभागयुक्ता ॥७६॥
देयो द्विभागः सुरसान्छदस्य
कपित्थबिरुवादिपि दाडिमान्च ।
तथाऽर्धभागः सितसिन्धुवारा-
दङ्कोठमूलादिपि गैरिकान्च ॥७७॥
एषोऽगदः क्षौद्रयुतो निहन्ति
विशेषतो मण्डलिनो विषाणि ।
द्राक्षा, सर्पगन्धा, नगवृत्तिका (शल्लकी, अथवा नगमृत्तिका पाठ में पहाड़ की मिट्टी) श्वेत कोयल, मजीठ ये प्रत्येक समान भाग, तुलसी के पत्ते, कैथ बिल्ब, अनार के पत्र-ये प्रत्येक दो दो भाग, श्वेत निर्गुण्डी, अंकोठ मूल और गेरु ये आधा आधा भाग मिलाये । इसमें मधु मिलाकर बनाया यह अगद मण्डलि सर्पों के विष को विशेष रूप में नष्ट करता है ॥७६,७७॥
वंशत्वगाद्रीऽऽमलकं कपित्थं
कटुत्रिकं हैमवती सकुष्ठा ॥७८॥
करञ्जबोजं तगरं शिरीष-
पुष्पं च गोपित्तयुतं निहन्ति ।
विषाणि लूतोन्दुरपन्नगानां
कैटं च लेपाञ्जननस्यपानैः ॥७९॥
पुरीषमृत्रानिलगर्भसङ्गा-
न्तिहन्ति वत्स्यञ्जनान्भिलेपैः ।