सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 639, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ६ ]
कल्पस्थानम्
४८३
काचामर्कोथान् पटलांश्वरोथान्
पुष्पं च हन्त्यञ्जननस्ययोगैः ॥८०॥
गिले बाँस की छाल, आँवला, कैथ, सोंठ, मरिच, पीपल, वच, कूठ, करंज के बीज, तगर, शिरीष के फूल, इनको गाय के पित्त में मिलाये । इसका लेप, अंजन और नस्त्र करने पर मक्की, चूहे, साँप और कीटों का विष नष्ट हो जाता है । वृत्ति, अंजन, नामिलेप से यह मल-मूत्र-वायु के तथा गन्ध के अवरोध की नष्ट करता है । आँख के काच, अर्म्, सडाँद, पटल के भयानक रोगों को और पुष्प को यह अंजन एवं नस्त्र में बरतने से नष्ट करता है ॥७८-८०॥
समूलपुष्पाङ्कुरवल्कबीजात्
क्वाथः शिरीषात् त्रिकदुग्मगाढः ।
सलावणः क्षौद्रयुतोऽथ पीतो
विशेषतः कीटविषं निहन्ति ॥८१॥
शिरीष के मूल, फूल, कोमल पत्ते, लाल, बीज, इनका क्वाथ करके उसमें प्रचुर मात्रा में सोंठ, मरिच, पीपल, मधु और लवण मिलाकर पीने से, यह क्वाथ कीट विषों को विशेष करके नष्ट करता है ॥८१॥
कुष्ठं त्रिकदुक् दावीं मधुकं लवणद्वयम् ।
माळती नागपुष्पं च सर्वाणि मधुराणि च ॥८२॥
कपित्थरसपिष्टोऽयं शर्कराक्षौद्रसंयुतः ।
विषं हन्त्यगदः सर्वं मूषकाणां विशेषतः ॥८३॥
कूठ, त्रिकदु, दारुहल्दी, मुलेहटी, सैन्धव, सौवर्चल, चमेली, नागकेसर, काकोल्यादि मधुराण इनको कैथ के रस के साथ पीसकर शर्करा और मधु में मिलाकर बरतने से यह अगद सब विषों को विशेषकर चूहों के विषों को नष्ट करता है ॥
सोमराजीफलं पुष्पं कटभी सिन्धुवारकः ।
चौरको वरुणः कुष्ठं सर्पगन्धा ससतला ॥८४॥
पुनर्नवा शिरीषस्य पुष्पमारुवर्धार्कजम् ।
स्यामाऽम्बद्याविद्वज्ज्ञानि तथाऽऽम्रासन्तकानि च ॥
भूमौ कुरवकश्चैव गण एकसरः स्मृतः ।
एकजो द्वित्रिशो वाऽपि प्रयोक्तव्यो विषापहः ॥८६॥
बावची, बावची का फूल, श्वेतकोयल, निर्गुण्डी, चौरक, वरणा, कूठ, सर्पगन्धा, ससला (यवतिका), पुनर्नवा, शिरीष का फूल, अमलतास का फूल, आक का फूल, निशोथ, पाठा, विडंग, आम, अश्वमन्तक, वल्मीक की काली मिट्टी, कुरवक (लाल कटसरेया) —इस समूह का नाम एकसर गण है । ये औषध समूह अकेले अकेले या दो दो या तीन तीन मिलाकर बरतने पर भी विष नाशक हैं ॥८४-८६॥
इति सुश्रुतसंहितायां कल्पस्थाने सर्पदण्डविषविकिसितं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥१५॥
षष्ठोऽध्यायः
अथातो दुन्दुभिस्वनीयं कल्पं व्याख्यास्यामः ॥१॥ यथोवाच धन्वन्तरिः ॥२॥
इसके आगे दुन्दुभिस्वनीय कल्प का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥१,२॥
धवाश्रकणं शिरीषतिनशपलाशपिचुमर्दपाटलिपारि - भद्रकाश्रोदुम्बरकरहटकाजुनककुभसर्जकपीतनरुलेष्मात - काङ्क्रेठामलकप्रग्रहकुटजशमीकपित्थासन्तकार्कचिरित्व- महावृक्षारुणकारालुमधुकमधुग्रिधुशकगोर्जुमूर्वाभूर्जति - ल्वकेलुरुकगोपघोण्टारिमेदानां भस्मान्याहृत्य गवां मूत्रेण क्षारकल्पेन परिस्रांय विपचेत् दवाश्चात्र पिपळी- मूलतण्डुलीयकवराङ्गचोचमल्लिघाकरल्लिघाहस्तिपिपळी - मरिचविडंगगृह्यमानन्तासोमसरलाबाह्नीकुगुहाकोशाम्र - श्वेतसर्पवरुणलवणपल्लक्षनिचुलकवज्जलकालवर्धमान - पुत्रश्रेणीसप्तपण्डुकेल्लवालुकनागदन्त्यतिविषाभया - भद्रदारुकुष्ठहरिद्रावचाचूर्णाणि लोहानां च समभागानि, ततः क्षारवदागतपाकमवताय लोहकुम्भे निदध्यात् ॥३॥
धावड़ी, अश्वकणं, शिरीष, साँदन, डाक, नीम, पाटला, फरहद, आम, गूलर, मेनफल, अजुन, ककुभ, सर्ज (राख), कपीतन (पारस पीपल) लसूडा, अंकोट, आँवला, करंज, कूडा, शमी कैथ, अश्वमन्तक, आक, नाटकरंज, सेहण्ड, मिलावा, श्योनाक, मुलेहटी, मीठा सहजन, सागीन, गाजवां, मूर्वा, मूजपत्र, तिल्वक, तालमखाना, गोपण्डा (झनझनिया), अरि- मेद (विटखदिर), इनकी भस्म को लेकर गोमूत्र में क्षार विधि से इक्कीस बार नितारकर पकाये । पकाते समय इनमें—पिप्पलीमूल, चौलाई, दालचीनी, चोच (तज-मोटे छिलके की) मंजीठ, करंज, गजपिपळी, मरिच, विडंग, घर का धुँवासा, सारिवा, कटफल, चौड़, जलबैतस, वेंत, केसर, साल्पणी, कोशाम्र, श्वेतसरसों, वरणा, नमक, पिल्लवन, तगर, हरताल, एरण्ड, द्रवन्ती, (मोगलह एरण्ड), सप्तगण, श्योनाक, एल्लालुक, नागदन्ती (हन्दवारुणी या बड़ा जमाळगोठा), अतीष, हरड, देवदारु, कूठ, हल्दी वच इनको चूर्ण और लोहा-ताम्र आदि के चूर्ण जो मिल सकें, वे मिलाकर क्षार की भाँति पकाये । जब क्षार की भाँति बन जाये तो उतारकर लोहे के घड़े में रख देवे ॥३॥
अनेन दुन्दुभिं लिप्तेत् पताकां तोरणानि च । श्रवणाद्दशनात् स्पर्शात् विषात् संप्रतिमुच्यते ॥४॥
एष क्षारागदो नाम शर्करास्वरुमरीषु च । अश्वसु वातगुल्मेषु कासगुल्लोदरेषु च ॥५॥
अजीर्णं ग्रहणीदोषे भक्तद्वेषे च दारुणे । शोफे सर्वसरे चापि देयः श्वासे च दारुणे ॥६॥
सदा सर्वविषातीनां सर्वश्वेनोपयुज्यते । एष तक्षकमुख्यानामपि दपोङ्कशोडागदः ॥७॥