सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ६ ]
इस अगद से दुन्दुभि, पताका, तोरण पर ठेप करे । इनके सुनने, दर्शन, और स्पर्श करने पर विष से मुक्त हो जाता है । यह क्षार अगद शर्करा, अरमरी, अर्श, वातगुल्म, कास, शूल, उदर, अजीर्ण, ग्रह्यीरोग, और भोजन की भयानक अरुचि में, शोक में; सर्वस्वर शोक में; भयानक श्वास में उत्तम है । सब प्रकार के विषों से पीड़ित पुरुषों में पान, नस्य, अभ्यंग आदि सब में बरता जाता है । तक्षक जिनमें मुख्य है, ऐसे सपों के दर्प के लिये यह अगद अंकुश रूप में है ॥४-७॥
विडङ्गत्रिफलादन्तीभद्रदारुहरेणवः । तालीशपत्रमंडिजघाकेशरोत्पलपद्मकम् ॥८॥ दाडिमं मालतीपुष्पं रजन्मौ सारिवे स्थिरे । प्रियकुस्तगरं कुष्ठं बृहत्सौ चैलवालुकम् ॥९॥ सचन्दनगवाक्षीभिरैतैः सिद्धं विषापहम् । सर्पिः कल्याणकं ह्येतद्ग्रहपस्मारनाशनम् ॥१०॥ पाण्डुवामयगरश्वासमन्दानिञ्चवरकासनुत । ओषिणामल्पशुक्राणां वन्ध्यानां च प्रशस्यते ॥११॥
कल्याणकभूत—विडंग, त्रिफला, दन्ती, देवदारु, हरेण, तालीशपत्र, मंजीठ, केशर, उत्पल (कमल), पद्माख, दाडिमी, चमेली के फूल, हल्दी, दारुहल्दी, सारिवा, काली सारिवा, शालपर्णी, पुश्पिपर्णी, प्रियंगु, तगर, कूठ, बड़ी कटेरी, ऐलवालुक, चन्दन, इन्द्रायण इनसे सिद्ध किया यह कल्याणकभूत विषनाशक, ग्रहनाशक, एवं अपस्मार नाशक है । पाण्डुरोग, गर, श्वास, मन्दगनि, ज्वर, कास नाशक है । शोषरोगी, अलशुक्वाले और वन्याओं के लिये उत्तम है ॥
अपामार्गस्य बीजानि शिरोषस्थ च माषकान् । श्वेतै द्वे काकमाचीं च गवां मूत्रण पेययेत् ॥१२॥ सर्पिरैतैस्तु संसिद्धं विषसंशमनं परम् । अमृतं नाम विख्यातमपि संजोवयेन्मृतम् ॥१३॥ अपामार्गं (चिरचिते) के बीज, शिरीष के बीज, श्वेत और नीलीश्वेता (अपराजिता—कोयल), मकोय इनको गोमूत्र से पीसे । इनसे सिद्ध किया (गोमूत्र में) घृत-विष के नाश करने में श्रेष्ठ है । इस घृत का नाम अमृत घृत है, यह मृत मनुष्य को भी जीवित करता है ॥१३॥
चन्दनगुरूपी कुष्ठं तगरं तिलपर्णिकम् । प्रपौण्डरीकं नलदं सरलं देवदारु च ॥१४॥ भद्रश्रियं यवफलं भागीं नीलीं सुगन्धिकाम् । कालेयकं पद्मकं च मधुकं नागरं जटाम् ॥१५॥ पुन्नागैलैलवालूनि गैरिकं ध्यासकं बलाम् । तोयं सजैरसं मांसीं शतपुष्पां हरैणुकाम् ॥१६॥ तालीशपत्रं जुहूलां प्रियंगुं सकुट्टन्नटाम् । गिलापुष्पं सञ्जैलेयं पत्रं काठानुसारिवाम् ॥१७॥ कटुत्रिकं शीतशिवं कारस्यं कटुरोहिणीम् । सोमराबीमतिविषां, पृथ्विकामिन्द्रवारुणीम् ॥१८॥
उगीरं वरुणं मुस्तं कुस्तुम्बुरु नखं तथा । श्वेतै हरिद्रै स्त्रीण्यं लाक्षां च लवणानि च ॥१९॥ कुमुदोत्पन्नानि पुष्पं चापि तथाऽर्कजम् । चम्पकाशोककुसुमसस्तिल्वकप्रसवानि च ॥२०॥ पाटलीशालमलौशैलुगिरीषाणां तथैव च । कुसुमं तृणमूल्याश्च सुरभीसिन्धुवारजम् ॥२१॥ धवाश्चकर्णपार्थानां पुष्पाणि तिनित्तस्य च । गुग्गुलं कुड्कुमं बिम्बो सर्पाक्षीं गन्धनाकुलीम् ॥२२॥ एतत् संश्रुत्य संभारं सूदमचूर्णानि कारयेत् । गोपितमधुसर्पिभिर्मुक्तं शुक्ले निधापयेत् ॥२३॥ भग्नस्कन्धं विद्युत्ताक्षं मृत्योर्दृष्टान्तरं गतम् । अनेनागदमुख्येन मनुष्यं पुनराहरेत् ॥२४॥ एवोऽनिकल्पं दुर्वारं कुट्टस्यामिततेजसः । विषं नागपतेर्हन्त्यात् प्रसभं वासुकेरपि ॥२५॥ महासुगन्धिनामाऽयं पञ्चचारतीयङ्गसंयुतः । राजाऽगदानां सर्वेषां राज्ञो हस्ते भवेत् सदा ॥२६॥ स्नातानुलिप्तम् नृपो भवेत् सर्वजनप्रियः । श्राजिण्वृत्तां च लभते शत्रुमध्यगतोऽपि सन् ॥२७॥ महासुगन्धि अगद—चन्दन, अगद, कुष्ठ, तगर, हुल्हुल्, प्रपौण्डरीक, उशीरमेद, चीड़, देवदारु, श्वेत चन्दन, यवफला, भागीं, नीली, सर्वगन्धा, कालेयक (पीलाचन्दन), पद्माल, सुलेहटी, सौठ, जटामांसी, नागकेसर, इलायची, ऐलवालुक, गेरु, कस्तूण, बला, बालक, राल, लैलछडीला, सौफ, हरेण, तालीशपत्र, छोटी इलायची, प्रियंगु, केवड़ी मोथा, शिला (मैनसिल), पुष्प (पुष्प कासीस), शिलारस, तेजपत्र, काठानु, सारिवा, निकटु, शितशिव (कर्पूर), गम्भारी, कुटकी, बावची, अतीश, मोटा जीरा, इन्द्रायण, खस, वरणा, मुस्ता, धनिया, नख, श्वेत और नीली अपराजिता, हल्दी, दारुहल्दी, स्त्रीण्य, लाख, पाँचों नमक, कुमुद, उत्पल, नीलाकमल, आक का फूल, चम्पक और अशोक के फूल, तिल्वक के फूल, पाटली-सिम्बल-लसुडा शिरीष इनके भी फूल, केवड़ा, सुरभी (रास्ना या शल्लुकी) और निर्गुण्डी के फल, धव, अश्चकर्ण, अर्जुन और सौंदन के पत्ते, गुग्गुलु, केसर, कन्दूरी, सर्पाक्षी, गन्धनाकुली (सुगन्ध मूल, रास्ना), इन सबको एकत्रित करके इनका सूक्ष्म चूर्ण बनाये । इस चूर्ण को गाय के पिच्छे, मधु और घी में मिलाकर गाय के सींग में रख देवे । कन्धे तिर जाने पर, आँखें खुली रह जाने पर, मृत्यु के पंजे में फँसे हुए मनुष्य को भी इस मुख्य अगद से वापिस खींच लाये । यह अगद अग्नि के समान अप्रतिहतशक्ति कुट्ट के समान महान् तेजस्वी, सपों के राजा वासुकी के विष को नष्ट कर देता है । इसका नाम महासुगन्धि है, इसमें पच्चासी औषधियाँ हैं । यह सब अगदों का राजा है । राजा को सदा हाथ में धारण करना चाहिये । स्नान करके इसका ठेप करने से राजा सब