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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० ७ ७४

कल्पस्थानम्

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जनों का प्रिय होता है। शत्रुओं के बीच में फंसा हुआ भी तेजस्वी रहता है ॥२७॥

उष्णवज्रयो विधिः कार्यों विषार्तानां विजानात।

मुक्त्वा कीटविषं तद्धि शोतेनाभिप्रवर्धते ॥२८॥

विष से पीड़ित व्यक्तियों में उष्ण को छोड़कर सब विधि वरतनी चाहिये। कीटविष में उष्ण विधि वरते, क्योंकि यह कीटविष शीत से बढ़ता है ॥२८॥

अन्नपानविधातुक्तमुपधायं शुभाशुभम्।

शुभं देयं विषार्तभ्यो विरुद्धंभ्यश्च वारयेत् ॥२९॥

फागिर्तं ज़िग्युसौवीरमजीर्णध्यजन् तथा।

वज्रयेच्च समासेन नवधान्यादिकं गणम् ॥३०॥

दिवास्वप्नं न्यवार्यं च न्यायाम् क्रोधमातपम्।

सुरातिलकुल्लथाश्च वज्रयेद्धि विधातुरः ॥३१॥

अन्नपान विधि में कहा हुआ हित-अहित विचार करके विषपीड़ित व्यक्तियों को हितकारी अन्न दे। और विरोधि हानि-कारक वस्तुओं से रोके। रात्रि, सुहाजन, कांजी, अजीर्ण, अध्य-शन, एवं संज्ञेप से नवधान्यादिगण इनसे बचाये। दिन में सोना, मेषुन, व्यायाम, क्रोध, धूप, सुरा, तिल, कुलस्थी इनको विष से पीड़ित व्यक्ति छोड़ देवे ॥२९-३१॥

प्रसन्नदोषं प्रकृतिस्थधातुमन्नाभिकाङ्क्षं समसूत्रजिह्वम्।

प्रसन्नवर्णन्द्रियचित्तचेष्टैवैद्योऽवगच्छेदविषं मनुष्यम् ३२

अविष मनुष्य—स्वभाव में स्थित वातादि दोष, होने पर रसादि धातु और मल अपने स्वभाव में आने पर, अन्न की रूचि होने पर, मन के साथ उचितरूप में रस को ग्रहण करने-वाली जिह्वा के होने पर, वर्ण-इन्द्रिय-चित्त और चेष्टा के प्रसन्न (स्वाभाविक) हो जाने पर, वैद्य मनुष्य को विषरहित जानें ॥

वक्तव्य—विषयुक्त मनुष्य के लक्षण—प्रवृद्धदोषविकृति-स्थधातुमनन्नकाङ्क्षं क्षतसूत्रजिह्वम्। विरुद्धवर्णन्द्रियचित्तचेष्टैवैद्योऽवगच्छेत् सविषं मनुष्यम् ॥ समसूत्रजिह्वम् के स्थान पर “समसूत्रवित्कम्” पाठ हैं वह ठीक है, मल मूत्रमौक रूप में ही।

इति सुश्रुतसंहितायां कल्पस्थाने दुन्दुभिस्त्वनीयकल्प्यो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥६॥

सप्तमोऽध्यायः

अथातो मूषिककल्पं न्याख्यास्यासमः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अब इसके आगे मूषिक कल्प का न्याख्यान करेंगे—जैसा भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥१,२॥

पूर्वं मुक्त्रविषा उक्ता मूषिका ये समासतः।

नामलक्षणभेषज्यैरष्टादश निबोध मे ॥३॥

लालनः पुत्रकः कृष्णो हंसिरश्मिक्वि (क्वि) रस्तथा।

लुच्छन्दुरोऽलसश्चैव कषायदशनोऽपि च ॥४॥

कुलिङ्गश्चाजितश्चैव चपलः कपिलस्तथा।

कोकिलोऽरुणसंज्ञश्च महाकृष्णस्तथोन्दुरः ॥५॥

श्वेतैन महता साधं कपिलेनाखुना तथा।

सूषिकश्च कपोताभस्तथैवाष्टादश स्मृताः ॥६॥

शुक्रविषवाले जो चूहे पहिले संज्ञेप में कहे हैं, वे अठारह हैं। उनके नाम, लक्षण और औषध मुझसे सुनो! लालन, पुत्रक, कृष्ण, हंसिर, चिकिर, लुच्छन्दुर, अलस, कषाय दशन, कुलिंग, अजित, चपल, कपिल, कोकिल, अरुण, महाकृष्ण, उन्दुर, महाश्वेत, कपिल, कपोताभ-ये अठारह चूहे हैं।

वि० मन्तव्य—लालन-स्यात् लालन नामक चूहे वे हैं जो पालतू होते हैं। पुत्रक-स्यात् वे हैं जो बहुत छोटे छोटे होते हैं। यह अन्य चूहों की अपेक्षा छोटे रहते हैं। लुच्छन्दुर-इसी नाम से प्रसिद्ध है, इससे अप्रिय गन्ध आती है। महाकृष्ण-इसे पञ्चाव में “धीस” कहते हैं। यह मिट्टी बहुत खोदता है रात्रिभर में ढेर लगा देता है। चपल-बहुत चञ्चल होता है। महाश्वेत-खरगोश जितना बड़ा होता है, किसी २ बड़े घरों में पाला जाता है और श्वेत वर्ण का, कोमल बालोंवाला, लाल आंखों वाला होता है ॥३-६॥

शुक्रं पतति यत्रैषां शुक्रस्पृष्टैः शृण्वन्ति वा।

नखदन्तनादिभिरस्तस्मिन् गात्रे रक्तं प्रदुष्यति ॥७॥

इन चूहों का शुक्र जहां पर गिर जाता है, शुक्रवाली वस्तु का जहां स्पर्श होता है तथा इनके नख, दांत आदि से उस अंग में रक्त दूषित हो जाता है।

तन्नान्तर में—“शुक्रेणाय पुरीषेण मूत्रेणपि नखैस्तथा। दध्वाभिर्वाक्षिपन्तीह मूषिका पञ्चधा विषम्।

वि० मन्तव्य—चूहे-प्रधानतः शुक्र विष होते हैं परन्तु इनके नख एवं दन्त में भी विष होता है, कुछ चूहे निर्विष भी होते हैं। श्री इल्लन ने किसी तन्त्र का वचन उद्धृत किया है—यथा—“गर्भिण्या मूषिकया दधे अम्लादिबोहवः ऋतुमत्या दधे रक्त मेहनं आध्मानं रतिशीलता च” इत्यादि अर्थात् गर्भ-वती चूही द्वारा काटने पर अम्ल आदि द्रव्यों के सेवन की अभिलाषा, ऋतुमती—रजस्वला चूही द्वारा काटने पर मूत्र में रक्त जाना (नारी का रजस्वला होना) अफरा तथा मेषुन की इच्छा होना आदि २ ॥७॥

जायन्ते प्रन्थयः शोफाः कर्णिका मण्डलानि च।

पीडकोपचयश्चोम्रो विसर्पाः किटिभानि च ॥८॥

पूर्वभेदो रजस्तीत्रा मूर्च्छाऽङ्गसदनं ज्वरः।

दौर्बल्यमरुचिः श्वासो वमयुर्लोमहर्षणम् ॥९॥

दण्डरूपं समासोक्तमेवद्वयासमतः शृणु।

इनके काटने से, गांठें, सूजन, कर्णिका (उभार), मण्डल (चंकुरे), फुसियां उत्पन्न होना, भयानक विसर्प, किटिभ, पूर्वभेद, तीवपीडा, मूर्च्छा, अज्ञों की स्थिलता, ज्वर, दुर्बलता,