सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ७ ]
अरुचि, श्वास, वमन, लोमहर्ष ये संज्ञेप में लक्षण होते हैं। विस्तार से सुनो।
वि० मन्तव्य—ग्रन्थयः—श्लैष्मिक ग्रन्थियों का शोथ शोफ-दष्ट स्थान पर शोथ अथवा व्रणशोथ की उत्पत्ति। कर्णिका कमल के बीज कोश का सा शोथ। लक्षणों पर ध्यान देने से “प्लेग” जिसको “प्रन्थिक ज्वर” कहते हैं, का आभास होता है। यद्यपि एलोपेयी का कथन है कि चूहों का विष-पिस्तुओं द्वारा मानव पर आक्रान्त होता है। जो कुछ होता है तो मूसा का ही विष। प्लेग में ५० प्रतिघात वंक्षण सन्धि की ग्रन्थि का शोथ होता है इस ग्रन्थि का नाम लोहितान्नासमर्प है यथा “ऊरु-मूले लोहितार्शं च” सु० शा० अ० ६-२४। मर्मस्थल का शोथ होने के कारण ही प्लेग इतनी भीषण होती है। यह ग्रन्थिक ज्वर कभी २ मरक के रूप में फैलकर जनपद का विद्वंक्ष्वस कर देता है ॥८,६॥
लालासावो लालनेन हिक्का छर्दिश्च जायते ॥१०॥
तण्डुलीयककल्कं तु लिह्यात्तत्र समाश्रिकम्।
लालन चूहे के कारण लालासाव, हिक्की, वमन होती है। इसमें चौलाई के कल्क को मधु के साथ चाटे ॥१०॥
पुत्रकेणाङ्गसादृशं पाण्डुवर्णश्च जायते ॥११॥
चायते प्रन्थिभिक्षाङ्गमाखुगावकसन्निभैः।
शिरौषेङ्कुककल्कं तु लिह्यात्तत्र समाश्रिकम् ॥१२॥
पुत्रक चूहे से अंगों में शिथिलता, पीलापन, चूहे के बच्चे के समान गांठों से अंग भर जाता है। इसमें शिरस और हिगोट का कल्क मधु के साथ चाटे ॥११,१२॥
कृष्णेन दंशे शोफोऽसुकछर्दिः प्रायश्च दुर्दिने।
शिरौषफलकृष्टं तु पिबेत् किशुकभस्मना ॥१३॥
कृष्ण चूहे से काटने पर शोफ और प्रायः करके बादल आने पर रक्त का वमन होता है। इसमें शिरौष के फल और कूट को ढाक के फूल की भस्म के पानी में घोलकर उसके साथ पिये ॥१३॥
हंसिरेणात्रविद्देषो जम्भा रोम्यां च हर्षणम्।
पिवेदारग्वघादिं तु सुवान्तस्तत्र मानवः ॥१४॥
हंसिर चूहे से अन्न में विद्देष, जम्भाई आना, रोमांच होता है। इसमें भली प्रकार वमन करके आरग्वघादि गण को पिये ॥
चिकि (क्कि) रेण शिरोदुःखं शोफो हिक्का वमिस्तथा।
जालिनीमदनाङ्कोठकषायैर्वाभयेत्तु तम् ॥१५॥
यवनालर्षभीक्षारं बृहत्त्योश्चात्र दापयेत्।
चिकिरि से शिर में वेदना, शोफ, हिक्का, वमन होता है। इसमें कडुईतौरी, मेनफल, अंकोट, इनके कषाय से वमन कराये। इसमें जो के नाल (यवक्षार), कौंच और बड़ी कटेरी का खार मिला देवे ॥१५॥
लुन्तुन्दरेण तृट् छर्दिज्वरो दौर्बल्यमेव च ॥१६॥
ग्रीवास्तम्भः प्रुष्टशोफो गन्धार्धानं विस्मृचिका।
चतस्रं हरीतको शुण्टो विडङ्कं पिप्पली मधु ॥१७॥
अङ्कोठबीजं च तथा पिबेदत्र विषापहम्।
लुन्तुन्दर से प्यास, वमन, ज्वर, दुर्बलता, ग्रीवास्तम्भ, पीठ में सूजन, गन्ध का ज्ञान न होना, विस्मृचिका, होती है। इसमें चव्य, हरड, सोंठ, वायविडंग, पिप्पली, अंकोट के बीज, और मधु पिये। यह विष नाशक है ॥१६,१७॥
ग्रीवास्तम्भोऽलसेनोर्ध्ववायुदंशे रुजाः ज्वरः ॥१८॥
महागदं ससर्पिष्वकं लिह्यात्तत्र समाश्रिकम्।
निद्रा कषायदन्तेन हृच्छोषः काश्यमेव च ॥१९॥
क्षौद्रोपेताः शिरौषस्थ लिह्यात् सारफलत्वचः।
कुलिङ्गेन रुजः शोफो राज्यश्च दंशमण्डले ॥२०॥
सहै ससिन्धुवारे च लिह्यात्तत्र समाश्रिके।
अलस से ग्रीवास्तम्भ ऊर्ध्ववायु, दंश में वेदना, ज्वर होता है। इसमें घी और मधु के साथ महागद को चाटे। कषायदन्त चूहे से नींद का आना, हृदयशोष, कुशता, होती है। इसमें शिरस के सार, फल, छाठ को मधु के साथ चाटे। कुलिङ्ग चूहे से वेदना सूजन एवं दंश स्थान पर रेखायें होती हैं। इसमें मुद्रापणी, माषपणी, सिन्धुवार को मधु के साथ चाटे।
अजितेनाङ्गकृष्णत्वं छर्दिर्मूर्च्छा च हृदग्रहः ॥२१॥
स्तुकक्षीरपिष्टां पालिन्दीं मक्षिष्टां मधुना लिहैत्।
अजित से अङ्ग में कालापन, वमन, मूर्च्छा, हृदग्रह होता है। इसमें थोरके दूध में निशोथ, मजीठ को पीसकर मधु से चाटे ॥२१॥
चपलेन भवेच्छर्दिर्मूर्च्छा च सह तृष्णया ॥२२॥
क्षौद्रेण त्रिफलां लिह्याद्ब्रह्मकाष्ठजटांनविताम्।
चपल से वमन, मूर्च्छा और प्यास होती है। इसमें त्रिफला, देवदारु, जटामांसी को मधु के साथ चाटे ॥२२॥
कपिलेन व्रणे कोथो ज्वरो प्रन्थ्युदमः सतृट् ॥२३॥
लिह्यान्मधुयुतां श्वेतां श्वेतां चापि पुनर्नवाम्।
प्रन्थयः कोकिलेनोष्मा ज्वरो दाहश्च दारुणः ॥२४॥
वर्षाभूनोलिनीकवाथकल्कसिद्धं घृतं पिबेत्।
कपिल से व्रण में सड़ना, ज्वर, गांठों का उत्पन्न होना और प्यास होती है। इसमें श्वेत कोयल और श्वेत पुनर्नवा को चाटे। कोकिल से गांठें, तीब्रज्वर, भयानक दाह होता है। इनमें पुनर्नवा, नीलिनी इसके कवाथ और कल्क से सिद्ध घृत पीये ॥२३,२४॥
अरुणेनात्तिलः कृद्दो वातजान् कुस्ते गदात् ॥२५॥
महाकृष्णेन पित्तं च श्वेतैन कफ एव च।