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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० ७ ]

कल्पस्थानम्

५८७

महता कपिलेनासूक् कपोतेन चतुष्टयम् ॥२६॥

भवन्ति चैषां दंशेषु प्रनियमण्डलकर्णिकाः ।

पिडकोपचयश्रोमः ओफ्फ्ध भुञ्जदारुणः ॥२७॥

दधिक्षीरघृतप्रस्थाद्ययः प्रत्येकशो मताः ।

करञ्जारन्धकशोषवृहत्प्युमतीस्थिराः ॥२८॥

निष्कवाध्य चैषां क्वाथस्य चतुर्थोऽंशः पुतर्भवेत् ।

त्रिवृद्गोत्र्यमृतावक्रमसर्पगन्धाः समृत्तिकाः ॥२९॥

कपित्थदाडिमत्स्वक् च श्लक्ष्णपिष्टाः प्रदापयेत् ।

तत् सर्वमेकतः कृत्वा शनैर्भुङ्गिन्तन्ना पचेत् ॥३०॥

पञ्चानामरुणादीनां विषमेतद्वचपोहति ।

काकादनीकाकमाच्योः स्वरसेष्वथवा कृतम् ॥३१॥

सिराश्च स्वावयेत् प्राप्ताः कुर्यात् संशोधनानि च ।

अरुण से कुपितवायु वातजन्य रोगों को करती है । महा-कृष्ण से पित्त और महाश्वेत से कफ कुपित होता है । महा कपिल से रक्त और कपोत से चारों दोष कुपित होते हैं । इसके दंशस्थान में ग्रन्थियाँ, चकत्ते, कर्णिकायें होती हैं । भयानक फुन्सियों की वृद्धि और अतिशय शोफ होता है । इसके लिये-दही, दूध और घी प्रत्येक एक-एक प्रस्थ, करंज, अमलतास, मरिच, पिप्पली, कटेरी, पुरनपर्णी, शालपर्णी इनका क्वाथ करें । इस क्वाथ में क्वाथ का चौथाई—निशोध, गाजवां गिलोय, तगर, सर्पगन्धा, काली मिट्टी, कैथ की छाल और अनार की छाल बारीक पीसकर पिलाये । इन सबको मधु अग्नि से पकाये । अरुण आदि पांचों चूहों के विष को यह नष्ट करता है । अथवा ककादनी (सफेद घेऊँची) और मकोय के स्वरस में घृत को सिद्ध करें । मर्मस्थान की सिराओं को छोड़कर योग्य स्थानों पर सिरामोक्षण करें, वमन-विरेचन आदि संशोधन देवे ॥

सर्वेषां च विधिः कार्या मूषिकाणां विषेष्वयम् ॥३२॥

सब मूषिकाओं के विष में यह विधि (सिरावेषन, संशोधन) करनी चाहिये ॥३२॥

दग्ध्वा विस्त्रावयेदंशं प्रच्छितं च प्रलेपयेत् ।

शिरीषरजनीकुष्ठकुडकुमैरमृतायुतैः ॥३३॥

अग्नि में गरम क्रिये घी से दंश को जलाये, पाछकर दंश में से रक्त निकाले । दंश पर शिरीष, हल्दी, कुष्ठ, कैसर और गिलोय इनसे लेप करें ॥३३॥

छर्दनं जालिनीक्वाथैः शुकाख्याङ्कोठयोरपि ।

शुकाख्याकोषवत्योश्च मूलं मदन एव च ॥३४॥

जालिनी (कड़ई तुरई जिससे पेर रगड़ते हैं), शुकाख्य (शिरीष या श्योनाक) और अंकोट इनके क्वाथ से वमन कराये ॥३४॥

देवदालीफलं चैव दंशना पीत्वा विषं वसेत् ।

सर्वमूषिकदृष्टानामेष योगः सुखावहः ॥३५॥

फलं चन्ना देवदाली कुष्ठं गोमूत्रपेषितम् ।

पूर्वकल्पेन योज्याः स्युः सर्वान्दुहविषच्छिदः ॥३६॥

शिरीष, कड़ई तुरई, इनकी जड़, मैनफल, कुकड़लता का फल इनको दही के साथ पीकर वमन करें । सब चूहों के दंश में यह योग सुखदायक है । मैनफल, बच्च, कुकड़लता, कूठ इनको गोमूत्र में पीसकर दही के साथ पीना चाहिये । सब चूहों के विष को नष्ट करता है ॥३५, ३६॥

विरेचने त्रिवृद्दन्तीत्रिफलाकल्क इष्यते ।

शिरोविरेचने सारः शिरीषस्य फलानि च ॥३७॥

हितक्षिकदुकाव्यश्च गोमयस्वरसोऽञ्जन ।

विरेचन के लिये निशोध, दन्ती (जमालगोटा) और त्रिफला का कल्क बरता जाता है । शिरोविरेचन के लिये शिरस का सार भाग (मध्य भाग), और फल बरते । सौठ, मरिच, पीपल मिलाकर गोबर के स्वरस का अजन करें ॥३७॥

कपित्थगोमयरसौ लिह्यानमाक्षिकसंयुतौ ॥३८॥

रसाञ्जनहरिद्रेन्द्रयवकटवीषु वा कृतम् ।

प्रातः वातिर्बिर्णं कल्कं लिह्यानमाक्षिकसंयुतम् ॥३९॥

तण्डुलीयकमूलेषु सर्पिः सिद्धं विवेन्नर ।

आस्फोटमूलसिद्धं वा पञ्चकापित्थमेव वा ॥४०॥

कैथ का स्वरस या गोबर के रस को मधु के साथ चाटे । रसौत, हल्दी, इन्द्रजो, कट्टाहिणी इनके कल्क को मधु के साथ खाये । अतोस के कल्क को मधु के साथ प्रातःकाल खाये । चौलाई के मूल से सिद्ध हिथा घृत पीये । सारिवा के मूल में या कैथ के पत्ते, फल, मूल, पुष्प और छाल इनके क्वाथ और क्वाथ में सिद्ध घृत पीये ॥३९-४०॥

मूषिकाणां विषं प्रायः कुधृत्यश्रेष्ठनिर्हृतम् ।

तत्राप्येष विधिः कार्या यश्च दूषीविषापहः ॥४१॥

न निकला हुआ चूहों का विष प्रायः करके बादल आनेपर कुपित होता है । वहाँ पर यही वमन विरेचन, शिरोविरेचन आदि विधि और दूषीविष नाशक उपचार बरतना चाहिये ।

वि० मन्तव्य—प्लेग के ४-५ प्रकोपों में देखा गया कि बादल छाने पर इस रोग से अधिक मानव आक्रान्त होते हैं और माघ, फागुन, एवं चैत्र में जब २ प्लेग का प्रकोप अधिक बढ़ा तब २ बादल, वर्षा, बून्दबान्दी आदि अवश्य हुए थे ॥

स्थिराणां सजतां वाडपि व्रणानां कर्णिकां सिषक् ।

पाटयित्वा यथादोषं व्रणवच्छ्वापि ओषयेत् ॥४२॥

स्थिर (न भरनेवाले) अथवा भरते हुए व्रणों की कर्णिका को वैद्य चौरकर दोष के अनुसार एवं व्रण की अवस्थानुसार चिकित्सा करें ।

वि० मन्तव्य—प्लेग की कर्णिका फोड़ा के समान पकती फूटती है, कभी २ चौरा भी लगाना पड़ता है इस व्रण में सब